आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
संयुक्त राष्ट्र की संस्था अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (आईएफएडी) भारत में पहली बार कृषि स्टार्टअप कंपनियों में सीधे निवेश करने की तैयारी कर रहा है और इसका अगले एक साल में तीन-चार सौदों को अंतिम रूप देने का इरादा है।
इसके साथ ही आईएफएडी अब अपने वित्तपोषण मॉडल को बदलकर अनुदान पर कम और निजी निवेश पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।
आईएफएडी के सह उपाध्यक्ष (कंट्री ऑपरेशंस) डोनल ब्राउन ने यहां पीटीआई-भाषा से बातचीत में कहा कि संगठन अब भारत की उभरती कृषि-उद्यमिता पारिस्थितिकी में सक्रिय रूप से अवसर तलाश रहा है।
उन्होंने कहा कि हाल ही में संस्था के निजी क्षेत्र प्रकोष्ठ की टीम भारत आई थी और विभिन्न प्रस्तावों का आकलन किया। एजेंसी को अब तक चार से पांच प्रस्ताव मिले हैं, जिनमें कृषि स्टार्टअप, ग्रामीण वित्त और डिजिटल मंच शामिल हैं।
आईएफएडी और भारत सरकार ने 12 मई को देश के लिए नई आठ-वर्षीय रणनीति शुरू की, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में जलवायु और आर्थिक मजबूती बढ़ाना है। वित्त और कृषि मंत्रालयों के साथ मिलकर तैयार इस रणनीति के केंद्र में 110 आकांक्षी जिले और गरीब राज्य हैं।
भारत में आईएफएडी का मौजूदा पोर्टफोलियो लगभग 1.2 अरब डॉलर का है, जिसमें करीब 35 करोड़ डॉलर का प्रत्यक्ष वित्तपोषण शामिल है। अगले तीन वर्षों के लिए लगभग 16 करोड़ डॉलर का प्रावधान किया गया है।
ब्राउन ने कहा कि आईएफएडी अब खुद को ‘वित्त का संयोजक’ बना रहा है, जो अपने बही-खाते के जरिये निजी निवेश आकर्षित करता है। वैश्विक स्तर पर एजेंसी एक लाख से अधिक कंपनियों में करीब 1.5 अरब डॉलर की निजी पूंजी जुटा चुकी है।
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी ने नाबार्ड के साथ सह-निवेश के लिए एक आशय पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसे भारत में विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आईएफएडी का मुख्य ध्यान छोटे किसानों को उत्पादन, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन की पूरी मूल्य शृंखला से जोड़ना रहेगा, ताकि उन्हें बेहतर कीमत मिल सके।
ब्राउन ने कहा कि जलवायु परिवर्तन छोटे और वर्षा-आधारित किसानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में उन्होंने बाजरा और ज्वार जैसी कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देने पर जोर दिया।