अगर पदक नहीं जीतता, तो मैराथन में जाने का फैसला समय की बर्बादी होता: बरवाल

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 26-09-2026
If I hadn't won a medal, the decision to go for marathon would have been a waste of time: Barwal
If I hadn't won a medal, the decision to go for marathon would have been a waste of time: Barwal

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
सावन बरवाल के लिए इस साल की शुरुआत में मैराथन में जाने का फैसला महत्वपूर्ण साबित हुआ क्योंकि उन्होंने शनिवार को यहां एशियाई खेलों में रजत पदक जीता और इसके बाद कहा कि अगर वह यह उपलब्धि हासिल नहीं करते तो यह ‘‘समय की बर्बादी’’ होती।
 
बरवाल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए मैराथन में भारत को अप्रत्याशित रजत पदक दिलाया और इस दौरान अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा। उन्होंने 42.195 किलोमीटर की दूरी दो घंटे, 11 मिनट और 37 सेकंड में पूरी की।
 
यह मैराथन में उनका लगातार दूसरा राष्ट्रीय रिकॉर्ड था। इसी साल अप्रैल में रॉटरडैम में उन्होंने अपने करियर की पहली मैराथन दौड़ में ही 2:11:58 के समय के साथ शिवनाथ सिंह का 48 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया था।
 
सेना में कार्यरत इस 28 वर्षीय एथलीट ने पीटीआई से कहा, ‘‘यह पदक मेरे लिए बहुत मायने रखता है। मैं 15-16 साल से अभ्यास और प्रतिस्पर्धा कर रहा हूं। अगर मुझे यह पदक नहीं मिलता तो यह सब व्यर्थ जाता और समय की बर्बादी होती। यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।’’
 
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जोगिंदर नगर के रहने वाले बरवाल के पिता कुलदीप नयी दिल्ली में ड्राइवर के रूप में काम करते थे, जबकि उनकी मां सुभद्रा देवी गृहिणी हैं।
 
बरवाल पिछले एक दशक से भी अधिक समय से लंबी दूरी की दौड़ में भाग ले रहे हैं। उन्हें अपने भाई से प्रेरणा मिली जो स्कूल की एथलेटिक्स टीम में शामिल थे। एक दिन वह अपने भाई के साथ गए और ट्रैक के किनारे दौड़ने लगे। इसके बाद उन्हें 14 साल की उम्र में 1500 मीटर की दौड़ के लिए स्कूल की टीम में शामिल कर लिया गया।
 
राष्ट्रीय स्तर पर वह पहली बार 2015 में अंडर-18 वर्ग में 3000 मीटर की दौड़ में शामिल हुए। उनका पहला सीनियर स्तर का मुकाबला 2021 में फेडरेशन कप में 5000 मीटर की दौड़ थी। उन्होंने देहरादून में 2025 के राष्ट्रीय खेलों में 5,000 मीटर और 10,000 मीटर दोनों में स्वर्ण पदक जीता। वह 2019 में खेल कोटा के तहत अपने बड़े भाई के साथ सेना में भर्ती हो गए थे।
 
अपने खेल में आए बदलाव के बारे में कोहली ने कहा, ‘‘जो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव आया है, वह यह है कि मैंने खुद से वादा किया है कि मैं और अधिक खुलकर खेलूंगा। लोगों की मुझसे क्या उम्मीदें हैं मैं उनकी चिंता नहीं करूंगा। लंबे समय से मेरी भूमिका यही रही है कि मैं चीजों को स्थिर बनाए रखूं।’’
 
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे पता है कि मैं अच्छा प्रदर्शन कर सकता हूं। मैं जानता हूं कि मैं शॉट लगा सकता हूं। लेकिन परिस्थितियां अनुकल न हों और आप किसी मुश्किल पिच पर खेल रहे हों, तो फिर आप ऐसी स्थिति में आ जाते हैं जहां आप सोचते हैं कि मैं शॉट तो लगा सकता हूं, लेकिन मुझे एक विशेष भूमिका निभानी होगी।’’
 
बरवाल ने शानदार प्रदर्शन करते हुए मैराथन में भारत को अप्रत्याशित रजत पदक दिलाया और इस दौरान अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा। उन्होंने 42.195 किलोमीटर की दूरी दो घंटे, 11 मिनट और 37 सेकंड में पूरी की।
 
यह मैराथन में उनका लगातार दूसरा राष्ट्रीय रिकॉर्ड था। इसी साल अप्रैल में रॉटरडैम में उन्होंने अपने करियर की पहली मैराथन दौड़ में ही 2:11:58 के समय के साथ शिवनाथ सिंह का 48 साल पुराना राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ दिया था।
 
सेना में कार्यरत इस 28 वर्षीय एथलीट ने पीटीआई से कहा, ‘‘यह पदक मेरे लिए बहुत मायने रखता है। मैं 15-16 साल से अभ्यास और प्रतिस्पर्धा कर रहा हूं। अगर मुझे यह पदक नहीं मिलता तो यह सब व्यर्थ जाता और समय की बर्बादी होती। यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।’’
 
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जोगिंदर नगर के रहने वाले बरवाल के पिता कुलदीप नयी दिल्ली में ड्राइवर के रूप में काम करते थे, जबकि उनकी मां सुभद्रा देवी गृहिणी हैं।
 
बरवाल पिछले एक दशक से भी अधिक समय से लंबी दूरी की दौड़ में भाग ले रहे हैं। उन्हें अपने भाई से प्रेरणा मिली जो स्कूल की एथलेटिक्स टीम में शामिल थे। एक दिन वह अपने भाई के साथ गए और ट्रैक के किनारे दौड़ने लगे। इसके बाद उन्हें 14 साल की उम्र में 1500 मीटर की दौड़ के लिए स्कूल की टीम में शामिल कर लिया गया।
 
राष्ट्रीय स्तर पर वह पहली बार 2015 में अंडर-18 वर्ग में 3000 मीटर की दौड़ में शामिल हुए। उनका पहला सीनियर स्तर का मुकाबला 2021 में फेडरेशन कप में 5000 मीटर की दौड़ थी। उन्होंने देहरादून में 2025 के राष्ट्रीय खेलों में 5,000 मीटर और 10,000 मीटर दोनों में स्वर्ण पदक जीता। वह 2019 में खेल कोटा के तहत अपने बड़े भाई के साथ सेना में भर्ती हो गए थे।
 
अपने खेल में आए बदलाव के बारे में कोहली ने कहा, ‘‘जो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव आया है, वह यह है कि मैंने खुद से वादा किया है कि मैं और अधिक खुलकर खेलूंगा। लोगों की मुझसे क्या उम्मीदें हैं मैं उनकी चिंता नहीं करूंगा। लंबे समय से मेरी भूमिका यही रही है कि मैं चीजों को स्थिर बनाए रखूं।’’
 
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे पता है कि मैं अच्छा प्रदर्शन कर सकता हूं। मैं जानता हूं कि मैं शॉट लगा सकता हूं। लेकिन परिस्थितियां अनुकल न हों और आप किसी मुश्किल पिच पर खेल रहे हों, तो फिर आप ऐसी स्थिति में आ जाते हैं जहां आप सोचते हैं कि मैं शॉट तो लगा सकता हूं, लेकिन मुझे एक विशेष भूमिका निभानी होगी।’’