AI के बढ़ते दौर में मानवीय मूल्यों को बचाने पर जोर

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 16-09-2026
Emphasis on preserving human values ​​in the growing era of AI.
Emphasis on preserving human values ​​in the growing era of AI.

 

नई दिल्ली।

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के महिला विभाग की ओर से “डिजिटल युग में जीवन : तकनीक, मानवीय पहचान और मूल्यों के बीच संतुलन” विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें मनोविज्ञान, काउंसलिंग, डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। परिचर्चा का मुख्य उद्देश्य मानवीय पहचान, रिश्तों, भावनात्मक स्वास्थ्य और मूल्यों पर तकनीक के बढ़ते प्रभाव को लेकर विचारों का आदान-प्रदान करना था।

अध्यक्षीय संबोधन में जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की राष्ट्रीय सचिव शाइस्ता रफ़त ने तकनीक के प्रति संतुलित, जागरूक और जिम्मेदार रवैया अपनाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, संचार और सूचनाओं तक पहुंच बढ़ाने में तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करते हुए इसके अत्यधिक और अनियंत्रित इस्तेमाल के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक पर अस्वस्थ निर्भरता के कारण ईमानदारी, सच्चाई, आत्मसम्मान, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता और सार्थक रिश्तों जैसे मानवीय मूल्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

उन्होंने विशेष रूप से कहा कि बच्चों को केवल तकनीक का इस्तेमाल करना ही नहीं सिखाया जाना चाहिए, बल्कि यह भी समझाया जाना चाहिए कि तकनीक का उपयोग करते हुए वे अपने मानवीय मूल्यों को कैसे बनाए रखें। उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर भी चेतावनी दी और कहा कि इससे व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से सोचने, विश्लेषण करने, नई चीजें खोजने और रचनात्मक कार्य करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

उद्घाटन भाषण में जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की राष्ट्रीय सहायक सचिव राबिया बसरी ने तकनीक के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या तकनीकी प्रगति इंसानों को बेहतर इंसान बनने में भी मदद कर रही है। उन्होंने मानवीय रिश्तों और भावनात्मक जुड़ाव पर तकनीक के प्रभाव की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि आज सैकड़ों ऑनलाइन संपर्क होने के बावजूद वास्तविक जीवन में ऐसे लोगों की संख्या कम होती जा रही है, जिनसे व्यक्ति दिल की बात और अपनी परेशानियां साझा कर सके।

मनोवैज्ञानिक और काउंसलर रचना श्रीवास्तव ने मानवीय पहचान और रिश्तों पर तकनीक के दोहरे प्रभाव की चर्चा की। उन्होंने कहा कि डिजिटल कनेक्टिविटी बढ़ने का अर्थ हमेशा भावनात्मक नजदीकी बढ़ना नहीं है। आमने-सामने की बातचीत और परिवार के साथ सार्थक संवाद में कमी आती जा रही है।

डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन और बिजनेस लीडर जेब ख्वाजा ने युवा पीढ़ी पर तकनीक के प्रभाव को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि तकनीक ने युवाओं की जानकारी, विचारों और विभिन्न समुदायों तक पहुंच बढ़ाई है, लेकिन लगातार डिजिटल उत्तेजना के कारण तुरंत परिणाम पाने की अपेक्षा बढ़ी है और देरी के प्रति धैर्य कम हुआ है। उन्होंने डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन सुरक्षा और निजता के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ परिवार के सदस्यों के बीच आमने-सामने बातचीत के लिए पर्याप्त समय और स्थान सुनिश्चित करने की जरूरत बताई।

कंसल्टेंट साइकोलॉजिस्ट और काउंसलर डॉ. रहीला खान ने अत्यधिक स्क्रीन टाइम के भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर चर्चा की। उन्होंने अपने शोध का हवाला देते हुए कहा कि भावनाओं को व्यक्त करने के पारंपरिक तरीकों की जगह अब मैसेज, रील्स, व्हाट्सऐप स्टेटस और इमोजी लेते जा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अपनी अहमियत साबित करने के लिए लाइक्स, फॉलोअर्स और कमेंट्स पर निर्भरता से बेचैनी, असुरक्षा, जलन, ईर्ष्या और FOMO जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं और इससे आत्मसम्मान भी प्रभावित हो सकता है।

साइकोलॉजिस्ट और करियर काउंसलर डॉ. ओंकुश वर्मा ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच मानवीय गुणों को बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि AI जानकारी और सुझाव उपलब्ध करा सकता है, लेकिन सहानुभूति, साथ, भावनात्मक सुकून और मानवीय स्पर्श का स्थान नहीं ले सकता।

डॉ. हुमैरा नूरैन के संचालन में हुई पैनल चर्चा में इस बात पर जोर दिया गया कि तकनीक के साथ स्वस्थ संबंध बनाए रखना केवल किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें व्यक्ति के साथ माता-पिता, शिक्षक, मेंटर, काउंसलर, समुदाय और संस्थानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

कार्यक्रम का समापन इस संदेश के साथ हुआ कि तकनीक के फायदों को अपनाना जरूरी है, लेकिन उसे मानवीय मूल्यों, रिश्तों और भावनात्मक स्वास्थ्य का विकल्प नहीं बनने देना चाहिए। भविष्य की पहचान केवल स्मार्ट मशीनों और तेज तकनीक से नहीं, बल्कि जिम्मेदार, विचारशील, संवेदनशील और मानवीय बने रहने की क्षमता से तय होगी।