आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बौद्धिक और विकास संबंधी अक्षमताओं से जूझ रही 23 वर्षीय एक महिला की ‘टोटल एब्डोमिनल हिस्टेरेक्टॉमी’ करने की अनुमति दे दी है और कहा कि यह प्रक्रिया महिला के कल्याण, स्वास्थ्य, गरिमा और उसके सर्वोत्तम हितों को ध्यान में रखकर की जा रही है।
‘टोटल एब्डॉमिनल हिस्टेरेक्टॉमी’ एक शल्य चिकित्सा है, जिसमें पेट पर चीरा लगाकर गर्भाशय और गर्भाशय ग्रीवा को पूरी तरह निकाल दिया जाता है।
न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने 17 जून को महिला के माता-पिता और प्राथमिक देखभाल करने वालों द्वारा दायर एक याचिका को स्वीकार करते हुए यह आदेश पारित किया।
अपने आदेश में न्यायालय ने कहा, “अभिभावक संरक्षक क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते समय इस न्यायालय के लिए सर्वोपरि विचार संबंधित व्यक्ति का सर्वोत्तम हित होता है।”
न्यायालय ने कहा, “चिकित्सा बोर्ड के निष्कर्षों, मरीज की बौद्धिक और विकासात्मक अक्षमताओं की प्रकृति एवं गंभीरता, मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता का स्वतंत्र रूप से प्रबंधन करने में उसकी असमर्थता, याचिकाकर्ताओं द्वारा बताई गई बार-बार उत्पन्न होने वाली चिकित्सीय जटिलताओं तथा चिकित्सा बोर्ड की सर्वसम्मत अनुशंसा को ध्यान में रखते हुए न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि प्रस्तावित शल्य प्रक्रिया का उद्देश्य (महिला) के कल्याण, स्वास्थ्य, गरिमा और उसके सर्वोत्तम हितों को आगे बढ़ाना है।”
न्यायालय ने कहा, “इसलिए न्यायालय का मत है कि याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई अनुमति प्रदान की जानी चाहिए।”
याचिका को स्वीकार करते हुए न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ताओं को बेंगलुरु के वाणीविलास अस्पताल में अपनी बेटी का ‘टोटल एब्डोमिनल हिस्टेरेक्टॉमी’ कराने की अनुमति दी जाती है।