आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार को यहां कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था भारत के लिए कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह पुराने ज्ञान को देखने का एक नया नजरिया और उन मूल्यों का आधुनिकीकरण है जिन्होंने पीढ़ियों से समाज को लाभ पहुंचाया है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री ने 10वें विश्व चक्रीय अर्थव्यवस्था मंच (डब्ल्यूसीईएफ 2026) के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि चक्रीय अर्थव्यवस्था एक सहयोगात्मक प्रयास है जिसके लिए ज्ञान, प्रौद्योगिकी और वित्त को सीमाओं से परे जाने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा, ''भारत ने पुनर्चक्रण के बुनियादी ढांचे के विस्तार, नई पुनर्चक्रण प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करने, पुनर्चक्रित सामग्रियों के बाजारों को मजबूत करने और पर्यावरण-अनुकूल डिजाइन तथा चक्रीय खरीद तौर-तरीकों को बढ़ावा देने की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है।''
यादव ने रेखांकित किया कि चक्रीय अर्थव्यवस्था का वास्तविक पैमाना यह नहीं होगा कि कितना कचरा पुनर्चक्रित किया गया, बल्कि यह होगा कि हमने मूल्य (संसाधनों की उपयोगिता) को कितना कम बर्बाद होने दिया।
उन्होंने कहा, ''हमारे सामने विकल्प विकास और पर्यावरण के बीच का नहीं है। वास्तविक अवसर खुद विकास को अधिक संसाधन-कुशल, अधिक लचीला और अधिक टिकाऊ बनाने का है, और डब्ल्यूसीई वास्तव में यही करता है।''
यादव ने कहा कि भारत चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में अपनी यात्रा के अनुभवों और सीखों को साझा करने के लिए हमेशा तैयार रहा है।
उन्होंने कहा कि जिसे अब नीतिगत भाषा में 'चक्रीयता' कहा जाता है, वह कभी भारतीय जीवन में सहज सामान्य समझ का हिस्सा थी - किसी चीज को बदलने से पहले मरम्मत करना और फेंकने से पहले दोबारा इस्तेमाल करना। भारत में शायद ही कभी कुछ बर्बाद किया जाता था या फेंका जाता था। पड़ोस के मोची, दर्जी, घड़ी मैकेनिक और साइकिल मरम्मत करने वाले केवल सेवा प्रदाता नहीं थे। वे इस चक्रीय प्रणाली का एक अपरिहार्य हिस्सा थे।