कांशीराम जयंती को पीडीए दिवस के रूप में मनाना सपा की 'विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाज़ी' : मायावती

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 26-02-2026
Celebrating Kanshi Ram's birth anniversary as PDA Day is 'pure political theatrics' by SP: Mayawati
Celebrating Kanshi Ram's birth anniversary as PDA Day is 'pure political theatrics' by SP: Mayawati

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा बसपा संस्थापक कांशीराम की जयंती को 'पीडीए दिवस' के तौर मनाये जाने को 'विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाज़ी' करार देते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि यह केवल वोट के लिए किया जा रहा छलावा और दिखावा है।

मायावती ने बृहस्पतिवार को सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर एक लंबे पोस्ट में कहा, "जैसा कि सर्वविदित है कि सपा का चाल, चरित्र और चेहरा हमेशा से ही दलित, अन्य पिछड़ा वर्ग एवं बसपा विरोधी तथा ’बहुजन समाज’ में जन्मे महान संतों, गुरुओं व महापुरुषों के अनादर, अपमान व तिरस्कार का रहा है। यह, मीडिया सहित इनका पीडीए (पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग) भी अच्छी तरह से जानता है।"
 
मायावती ने कहा कि बसपा केसंस्थापक कांशीराम की जयंती को सपा पीडीए दिवस के तौर पर मनायेगी’, जो सपा की समय-समय पर की जाने वाली विशुद्ध राजनीतिक नाटकबाज़ी के सिवाय कुछ भी नहीं है।
 
उन्होंने कहा, "सपा का यह आचरण इन उपेक्षित वर्गों के वोटों का स्वार्थ के लिए केवल छलावा व दिखावा है, जैसा कि अन्य विरोधी पार्टियाँ भी इन वर्गों के वोटों के स्वार्थ की ख़ातिर करती नज़र आती हैं।"
 
उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि दरअसल, सपा के दलित विरोधी रवैये, बहुजन समाज के नेताओं का अनादर करने और बहुजनों के शोषण, अत्याचार व जुल्म-ज़्यादती आदि का लम्बा इतिहास है, जिसे भुलाया जाना असंभव लगता है।
 
बसपा प्रमुख ने वर्ष 1995 में 'दलितों पर अत्याचार नहीं रोके जाने' पर सपा नीत सरकार से बसपा के समर्थन वापस ले लेने और फिर दो जून 1995 को लखनऊ में हुए गेस्ट हाउस काण्ड का जिक्र किया और कहा कि यह क्रूरता सरकारी रिकार्ड के साथ-साथ इतिहास के पन्नों में भी दर्ज है।
 
उन्होंने कहा कि जब बसपा की सरकार ने कासगंज को ज़िला मुख्यालय का दर्जा व सम्मान देते हुये कांशीराम नगर नाम से नया ज़िला बनाया, तो उसके बाद सत्ता में लौटी सपा सरकार ने अपनी घोर जातिवादी व द्वेषपूर्ण नीति एवं दलित विरोधी रवैया अपनाते हुए अन्य ज़िलों व संस्थानों आदि के नामों की तरह इसका नाम भी बदल दिया, जो कि बहुजन समाज के साथ विश्वासघात है।