एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज, न कोई कलाम रहा, न हामिद अंसारी और न दिलीप कुमार

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 26-02-2026
Mahmood and Ayaz stood in the same row, there was no Kalam, no Hamid Ansari and no Dilip Kumar.AI photo
Mahmood and Ayaz stood in the same row, there was no Kalam, no Hamid Ansari and no Dilip Kumar.AI photo

 

मलिक असगर हाशमी/ नई दिल्ली

मशहूर शायर अल्लामा इकबाल ने जब यह शेर लिखा था- “एक ही सफ में खड़े हो गए महमूद-ओ-अयाज़, न कोई बंदा रहा और न ही कोई बंदा नवाज़” तो शायद उनके जेहन में इस्लाम का वही बुनियादी फलसफा रहा होगा, जहाँ खुदा के दरबार में सुल्तान और फकीर की हैसियत बराबर हो जाती है। समय बदला, समाज बदला और कई जगहों पर ऊँच-नीच की दीवारें भी खड़ी हुईं, लेकिन आज भी जब मस्जिदों से रूहानी पुकार गूँजती है, तो सत्ता के शिखर पर बैठे लोग भी अपनी 'खास' पहचान छोड़कर एक आम नमाजी की तरह सजदे में गिर जाते हैं।

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हाल ही में समाजवादी पार्टी के सांसद मोहिबुल्ला नदवी ने एक पॉडकास्ट में कुछ ऐसे ही अनछुए किस्से साझा किए, जो भारत की साझी विरासत और सादगी की मिसाल पेश करते हैं। राजनीति के मैदान में उतरने से पहले नदवी दिल्ली में पार्लियामेंट वाली मस्जिद के इमाम हुआ करते थे। उनकी यादों के झरोखे से 'मिसाइल मैन' डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का एक ऐसा चेहरा सामने आया, जिसने न केवल उनकी इमामत को प्रभावित किया, बल्कि पूरे देश के लिए सादगी का एक मानक तय कर दिया।

नदवी याद करते हैं कि जब डॉ. कलाम राष्ट्रपति थे, तब उनके प्रेस सेक्रेटरी एस.एम. खान का फोन आया कि 'साहब' नमाज पढ़ना चाहते हैं। जब कलाम साहब मस्जिद पहुंचे, तो वहां नमाज शुरू होने वाली थी। वह बड़ी खामोशी से तीसरी सफ (पंक्ति) में जाकर बैठ गए। राष्ट्रपति को वहां बैठा देख आगे की सफ के दो लोग सम्मान में खड़े हो गए और उनसे आगे आने की गुजारिश की। लेकिन कलाम साहब ने जो कहा, वह आज के दौर के नेताओं के लिए एक बड़ा सबक है। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि मस्जिद का नियम है कि जहाँ जिसको जगह मिले, वह वहीं बैठेगा। आप अपनी जगह बैठिए, मैं अपनी जगह बैठता हूँ।

किस्सा यहीं खत्म नहीं होता। ईद की नमाज के बाद जब परंपरा के अनुसार लोग इमाम से गले मिलते हैं और मुसाफा (हाथ मिलाना) करते हैं, तो डॉ. कलाम ने फिर अपनी सादगी से सबको चौंका दिया। जैसे ही लोग राष्ट्रपति को कतार में खड़ा देख पीछे हटने लगे ताकि वह पहले इमाम से मिल सकें, कलाम साहब ने तुरंत टोका। उन्होंने कहा कि नहीं, जब मेरी बारी आएगी, मैं तभी मुसाफा करूँगा। वह आम नमाजियों के पीछे अपनी बारी का इंतजार करते रहे।

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इस्लाम की यही वह खूबसूरती है, जहाँ कोई भी ताकतवर इंसान किसी कमजोर या गरीब को उसकी जगह से हटा नहीं सकता। यह समानता ही भारत के लोकतांत्रिक और आध्यात्मिक मूल्यों को जोड़ती है। इस सादगी के गवाह सिर्फ मोहिबुल्ला नदवी ही नहीं हैं, बल्कि पुरानी दिल्ली के रहने वाले जावेद अख्तर भी एक दिलचस्प वाकया सुनाते हैं।

उनके अनुसार, एक बार फतेहपुरी मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान जब मस्जिद पूरी तरह भर गई, तो डॉ. कलाम ने किसी को परेशान किए बिना दरवाजे के पास ही अपनी मुसल्ला बिछाकर नमाज अदा की।

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इबादत में खुद को मिटा देने का यह जज्बा अन्य हस्तियों में भी दिखा। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी जब पार्लियामेंट के सामने वाली मस्जिद में नमाज के लिए आते थे, तो वह हमेशा सबसे पिछली सफ में बैठते थे ताकि उनकी वजह से किसी और को असुविधा न हो। लखनऊ के बुजुर्ग अकरम पठान एक पुराना किस्सा याद करते हुए बताते हैं कि पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद साहब ने तो एक बार लखनऊ में मस्जिद के बाहर जूते हटवाकर फर्श पर ही नमाज पढ़ ली थी, क्योंकि मस्जिद के अंदर तिल रखने की जगह नहीं थी।

सिर्फ राजनेता ही नहीं, सिनेमा के 'शहंशाह' कहे जाने वाले दिलीप कुमार ने भी नमाज की सफों में हमेशा एक आम इंसान की तरह मौजूदगी दर्ज कराई। मुंबई के नसीरुद्दीन बताते हैं कि उन्होंने कई बार दिलीप साहब को पिछली कतारों में नमाज पढ़ते देखा। वहीं, हरियाणा के गुरुग्राम का एक वाकया भी काबिल-ए-गौर है, जहाँ के एक तत्कालीन मुस्लिम पुलिस कमिश्नर ईद के दिन अपने बेटे के साथ नमाज पढ़ने निकले। मस्जिद पूरी तरह भर चुकी थी, लेकिन वीआईपी कल्चर को किनारे रखते हुए उस वरिष्ठ अधिकारी ने बेसमेंट के एक छोटे से कोने में अपने बेटे के साथ खड़े होकर इबादत पूरी की।

ये तमाम वाकये केवल धार्मिक क्रियाओं का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह उस भारत की तस्वीर हैं जहाँ पद, प्रतिष्ठा और ताकत खुदा के सामने बौनी हो जाती है। चाहे वह दिल्ली की ऐतिहासिक फतेहपुरी मस्जिद हो या गुरुग्राम की भीड़भाड़ वाली ईदगाह, जब नमाज की सफें बनती हैं, तो वहां केवल 'बंदे' होते हैं, कोई 'बंदानवाज़' नहीं। यह सादगी और बराबरी का संदेश ही समाज में बढ़ती दूरियों के लिए सबसे बड़ा मरहम है।

आज जब समाज में वीआईपी कल्चर और विशेषाधिकारों की होड़ लगी है, डॉ. कलाम, हामिद अंसारी और फखरुद्दीन अली अहमद जैसे व्यक्तित्वों के ये किस्से हमें याद दिलाते हैं कि बड़ा वह नहीं है जिसके पास सत्ता है, बल्कि बड़ा वह है जिसके भीतर दूसरों के लिए सम्मान और खुद के लिए विनम्रता है।