आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
सिनेमा जाना सिर्फ फिल्म देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा संपूर्ण अनुभव है जिसमें बड़ी स्क्रीन, शानदार ध्वनि और स्वादिष्ट अल्पाहार का अपना अलग आनंद होता है। किसी शानदान फिल्म का असली आनंद विशाल पर्दे, गूंजती ध्वनि और टॉफियों बड़े-बड़े डिब्बों और ढेर सारे पॉपकॉर्न के साथ ही आता है, जिनका स्वाद घर पर कभी वैसा नहीं लगता।
हालांकि, सिनेमा के इतिहास में पॉपकॉर्न को कभी गंदगी फैलाने वाले आम लोगों के अल्पाहार के रूप में नापसंद किया गया, तो कभी संकट से जूझते फिल्म उद्योग के लिए मुनाफा कमाने वाले सहारे के रूप में सराहा गया।
प्राचीन काल से पॉपकॉर्न का अल्पाहार के रूप में इतिहास
पॉपकॉर्न उन सबसे पुराने खाद्य पदार्थों में शामिल है, जिन्हें आज भी लोग अल्पाहार के रूप में खाते हैं। पेरू में मिले पुरातात्विक प्रमाणों से पता चलता है कि करीब 6,700 साल पहले भी इसका सेवन किया जाता था।
पेरू में 17वीं सदी की शुरुआत में रहने वाले जेसुइट मिशनरी बर्नाबे कोबो ने स्थानीय लोगों को पॉपकॉर्न बनाते देखा था। वे मक्के के दानों को तब तक सेंकते थे, जब तक वे फूटकर खिल नहीं जाते थे। इसके बाद इसे ‘पिसानकल्ला’ नामक व्यंजन के रूप में खाया जाता था।
उत्तरी अमेरिका के ग्रेट लेक्स क्षेत्र में 1612 में पहुंचे फ्रांस के खोजकर्ताओं ने देखा कि इरोक्वॉय समुदाय के लोग मिट्टी के बर्तन में गर्म रेत भरकर उसमें मक्के के दानों को गर्म करते थे, जिससे वे फूटकर खिल जाते थे। बाद में वे इन्हें सूप में मिलाकर खाते थे।
अमेरिका में आए उपनिवेशवादियों ने भी यह तरीका अपना लिया। वे या तो आग पर जाली वाली बंद टोकरी का इस्तेमाल करते थे या फिर हाथ से घुमाए जाने वाले पतले धातु के बेलनाकार बर्तन को चूल्हे के सामने रखकर मक्के के दाने भूनते थे।
मेले से सिनेमा हॉल तक का सफर
शिकागो के चार्ल्स क्रेटर्स ने 1885 में भाप से चलने वाली एक नयी स्वचालित पॉपकॉर्न मशीन का आविष्कार किया, जिसमें वनस्पति तेल और पशु वसा के मिश्रण में मक्के के दाने पकाए जाते थे।
उन्होंने 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व मेले में इस मशीन का प्रदर्शन किया। वर्ष 1900 तक उन्होंने इसे बिजली से चलने वाली मशीन में बदल दिया और पॉपकॉर्न की मशीनें सड़क किनारे लगने वाली ठेलियों से निकलकर दुकानों तक पहुंच गईं।
जब चलचित्रों ने मेलों में उपलब्ध मनोरंजन के साधनों में अपनी जगह बनानी शुरू की, तब तक पॉपकॉर्न और मूंगफली मेले में काफी लोकप्रिय हो चुके थे। इसके बाद ये अल्पाहार भी दर्शकों के साथ सिनेमाघरों तक पहुंच गए।