आवाज द वाॅयस /नई दिल्ली
जब मुसीबत आती है तो अपनी पुरानी मिट्टी ही काम आती है। ऐसा ही कुछ देखने को मिल रहा है कतर की राजधानी दौहा में। जहां एक भारतीय मूल की महिला बीते 15 दिनों से हमद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर फंसी हुई हैं। महिला के पास वैध पासपोर्ट नहीं है। इस वजह से कतर के अधिकारी उन्हें हवाई अड्डे से बाहर शहर में जाने की इजाजत नहीं दे रहे हैं।
हैरान करने वाली बात यह है कि संकट की इस घड़ी में उस देश ने महिला से पल्ला झाड़ लिया जिसकी नागरिकता उन्होंने भारी-भरकम निवेश करके ली थी। वहीं दूसरी तरफ भारत सरकार ने दिल दिखाते हुए अपनी इस पूर्व नागरिक की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाया है।
यह पूरा मामला निवेश के बदले नागरिकता (सिटीजनशिप बाय इन्वेस्टमेंट) के खतरों और अपनी मातृभूमि की अहमियत को बयां करता है। लोग अक्सर सुनहरे भविष्य और विदेशों की चमक-दमक देखकर अपनी भारतीय नागरिकता छोड़ देते हैं। लेकिन संकट के समय उन्हें अहसास होता है कि कौन सा देश उनके साथ खड़ा है और कौन सा सिर्फ पैसों का सगा है।
क्या है पूरा मामला?
मूल रूप से महाराष्ट्र की रहने वाली करीब 50 वर्षीय नाज़नीन मोहम्मद के पास कतर का वैध रेजिडेंस परमिट (कतर आईडी) है। उनके पति इम्तियाज मलिक कतर एयरवेज में काम करते हैं। यह परिवार लंबे समय से दौहा में ही रह रहा है। साल 2002 में शादी के बंधन में बंधे इस दंपत्ति के तीन बेटे हैं—उजैर, ओमर और ओवैस। इनमें से दो बेटों के पास तुर्किए की नागरिकता है और एक बेटा अभी भी भारतीय नागरिक है।
सब कुछ ठीक चल रहा था। नाज़नीन और इम्तियाज ने कुछ साल पहले एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने अपनी भारतीय नागरिकता स्वेच्छा से छोड़ दी। नाज़नीन के पास पहले भारतीय पासपोर्ट नंबर Z3286473 था और उनके पति के पास भारतीय पासपोर्ट नंबर Y9170771 था। दोनों ने तुर्किए (तुर्की) में निवेश करके वहां की नागरिकता हासिल कर ली।
तुर्किए में निवेश पड़ा महंगा, शुरू हुई मुसीबत
साल 2022 में इस दंपत्ति ने तुर्किए में एक प्रॉपर्टी खरीदी थी। उनका दावा है कि उन्होंने इसके लिए वैध बैंकिंग चैनलों का इस्तेमाल किया था। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि वे एक बड़े फ्रॉड का शिकार हो चुके हैं। जिस प्रॉपर्टी को उन्होंने खरीदा था, उसका डेवलपर किसी आपराधिक जांच के दायरे में था। तुर्किए की पुलिस ने उस डेवलपर को गिरफ्तार कर लिया और उस संपत्ति को भी सरकार ने जब्त कर लिया।
इस कानूनी उलझन को सुलझाने के लिए नाज़नीन और उनके पति 16 जून को तुर्किए गए थे। उन्होंने वहां एक वकील भी किया ताकि वे अपने दस्तावेज पेश कर सकें और मामले को कानूनी रूप से साफ कर सकें। लेकिन इस्तांबुल पहुंचते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। तुर्किए के अधिकारियों ने बिना कोई स्पष्ट कारण बताए उन दोनों के पासपोर्ट जब्त कर लिए।
पति जेल में बंद, पत्नी को किया डिपोर्ट
पासपोर्ट छीनने के बाद तुर्किए प्रशासन ने पति-पत्नी को एक-दूसरे से अलग कर दिया। दोनों को दो अलग-अलग हिरासत केंद्रों (डिटेंशन सेंटर्स) में भेज दिया गया। इम्तियाज मलिक अभी भी तुर्किए की जेल में बंद हैं। वहीं नाज़नीन को 17 जून को बिना पासपोर्ट के ही दौहा के लिए डिपोर्ट यानी निष्कासित कर दिया गया। उनके पास कतर की आईडी थी, इसलिए उन्हें तुर्किए से कतर जाने वाले विमान में बैठने की अनुमति मिल गई।
लेकिन असली मुसीबत कतर पहुंचने पर शुरू हुई। 17 जून से नाज़नीन हमद इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर ही फंसी हुई हैं। कतर के नियमों के मुताबिक, शहर में प्रवेश करने के लिए वैध ट्रैवल डॉक्यूमेंट यानी पासपोर्ट का होना जरूरी है। पासपोर्ट न होने के कारण कतर अथॉरिटी उन्हें एयरपोर्ट से बाहर नहीं आने दे रही है।
तुर्किए सरकार का बेरुखा रवैया
इस पूरे मामले में तुर्किए सरकार का रवैया बेहद निराशाजनक रहा है। तुर्किए ने निवेश के नाम पर पैसे तो ले लिए और नागरिकता भी दे दी। लेकिन जब उनके नागरिकों पर कानूनी संकट आया, तो उन्होंने पूरी तरह से हाथ खींच लिए। तुर्किए सरकार ने अपने नागरिकों को कानूनी रूप से अपना पक्ष रखने का मौका तक नहीं दिया।
उन्होंने जल्दबाजी में कार्रवाई की और उन्हें सजा दे दी। यह साफ दिखाता है कि कुछ देशों के लिए नागरिकता सिर्फ एक बिजनेस डील है। उन्हें अपने नए नागरिकों के मानवाधिकारों या उनकी सुरक्षा से कोई सरोकार नहीं है।
गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही हैं नाज़नीन
एयरपोर्ट पर फंसी नाज़नीन की हालत दिन-पर-दिन बिगड़ती जा रही है। वह कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित हैं। हाल ही में उनकी पेट की सर्जरी हुई थी। इसके अलावा वह हाई ब्लड प्रेशर, थायराइड और डायबिटीज (मधुमेह) की मरीज हैं। इतने दिनों से एयरपोर्ट पर रहने के कारण उन्हें उचित चिकित्सा और देखभाल नहीं मिल पा रही है।
इसके साथ ही दौहा में रह रहे उनके बच्चों की स्थिति भी चिंताजनक है। उनके दो नाबालिग बच्चे इस समय दौहा में अकेले हैं। इनमें से एक बेटा ऑटिस्टिक है, जिसे लगातार थेरेपी और विशेष देखभाल की जरूरत होती है। दूसरा बेटा 12वीं कक्षा में पढ़ता है और इस पूरे मानसिक तनाव के कारण उसकी पढ़ाई पूरी तरह से बर्बाद हो रही है। माता-पिता के दूर होने से बच्चे गहरे सदमे में हैं।
भारतीय दूतावास बना संकटमोचक
जब तुर्किए की सरकार ने नाज़नीन की सुध नहीं ली, तो उन्होंने मानवीय आधार पर दौहा में स्थित भारतीय दूतावास (Embassy of India, Doha) से गुहार लगाई। नाज़नीन अब भारत की नागरिक नहीं हैं, कानूनी तौर पर वह एक विदेशी (तुर्किए की नागरिक) हैं। इसके बावजूद भारतीय दूतावास ने उनकी इस गंभीर स्थिति को समझा।
भारतीय दूतावास ने तुरंत इस संवेदनशील मामले को नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय (MEA) के सामने रखा। मानवीय आधार और महिला के गिरते स्वास्थ्य को देखते हुए भारत सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। सूत्रों के मुताबिक, विदेश मंत्रालय की कुछ जरूरी शर्तों और प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद भारतीय दूतावास नाज़नीन को इसी हफ्ते एक 'इमरजेंसी सर्टिफिकेट' (आपातकालीन प्रमाण पत्र) जारी करने पर विचार कर रहा है। यह एक अस्थाई ट्रैवल डॉक्यूमेंट होता है, जिसके जरिए वह दौहा एयरपोर्ट से बाहर निकलकर भारत की यात्रा कर सकेंगी।
नागरिकता बदलने से पहले सोचें
यह घटना उन सभी लोगों के लिए एक बड़ी सीख है जो बेहतर जिंदगी और सुविधाओं की चाह में अपनी मातृभूमि को छोड़ देते हैं। किसी भी देश की नागरिकता बदलने का फैसला बहुत सोच-समझकर लिया जाना चाहिए। संकट के समय केवल वही देश काम आता है जिसकी जड़ें आपसे जुड़ी होती हैं।
तुर्किए जैसे देश जो निवेश के बदले पासपोर्ट बांटते हैं, वे मुसीबत के समय जिम्मेदारी लेने से पीछे हट जाते हैं। भारत सरकार का यह कदम साबित करता है कि वह अपने पूर्व नागरिकों के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण रखती है। नाज़नीन को उम्मीद है कि जल्द ही वह इस प्रशासनिक चक्रव्यूह से बाहर निकलकर भारत सुरक्षित पहुंच पाएंगी।