तानें और बंदिशें झेलकर ऐसे बनीं शाही मुमताज कश्मीर की आवाज

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 07-07-2026
Enduring taunts and restrictions, this is how Shahi Mumtaz Kashmir became a voice of the region
Enduring taunts and restrictions, this is how Shahi Mumtaz Kashmir became a voice of the region

 

ओनिका माहेश्वरी

घाटी की खूबसूरत वादियों में कभी बंदिशों का शोर गूँजता था। आज वहाँ एक ऐसी आवाज़ गूँज रही है जिसने रूढ़ियों की हर दीवार को ढहा दिया है। यह कहानी शाही मुमताज़ की है। आज पूरा संगीत जगत और उनके प्रशंसक उन्हें बेहद सम्मान से "कश्मीर की लता मंगेशकर" कहते हैं। उन्होंने अपनी मखमली और सुरीली गायकी के दम पर कश्मीरी लोक संगीत और सूफियाना कलाम को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया है। इसके साथ ही उन्होंने उस रूढ़िवादी ढर्रे को भी तोड़ा जो महिलाओं को संगीत से दूर रखता था।
 

सामाजिक विरोध और शुरुआती संघर्ष

जब शाही मुमताज़ ने संगीत को पेशेवर करियर के रूप में चुनने का फैसला किया तो समाज का एक क्रूर चेहरा सामने आया। उस दौर के कश्मीरी समाज में किसी महिला का मंच पर आकर गाना बहुत से लोगों को पसंद नहीं था। शाही मुमताज़ ने इस बारे में खुलकर बात की है। उन्होंने बताया कि उन्हें समाज, रिश्तेदारों और अपने करीबियों के तीखे विरोध का सामना करना पड़ा। स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि कुछ करीबी रिश्तेदारों ने उनसे बातचीत करना भी बंद कर दिया था। अपनी कला को जिंदा रखने के लिए उन्हें अपनों से ही एक लंबी मानसिक और भावनात्मक लड़ाई लड़नी पड़ी।
 
कलाकारों को अक्सर अपने हुनर को छुपकर संवारना पड़ता था। एक महिला होने के नाते मुमताज़ के लिए यह संघर्ष दोगुना था। लेकिन वे पीछे नहीं हटीं। उन्होंने समाज के तानों को अपनी साधना का हिस्सा बना लिया। मुस्लिम समुदाय और विशेष रूप से कश्मीर के पारंपरिक परिवेश में महिलाओं के लिए संगीत को अपनाना कभी आसान नहीं रहा है। शाही मुमताज़ के परिवार या पूरे खानदान में दूर-दूर तक संगीत का कोई नामोनिशान नहीं था। घर में न तो कोई सिखाने वाला था और न ही संगीत के अनुकूल कोई माहौल था।
 
 
बचपन का सपना और लता जी से प्रेरणा

कुदरत ने शाही मुमताज़ को एक ऐसी अनमोल आवाज़ दी थी जिसे छुपना मंजूर नहीं था। बचपन में वे संगीत की तकनीकी बारीकियों से बिल्कुल अनजान थीं। इसके बावजूद भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर उनके दिल में बसती थीं। मुमताज़ घंटों अपने घर के वॉशरूम में बंद हो जाती थीं। वे हाथ में स्टील का गिलास थामकर उसे माइक समझ लेती थीं। फिर वे लता जी के गानों को गुनगुनाती रहती थीं। स्कूल के दिनों में जब वे दोस्तों के साथ अंताक्षरी खेलती थीं तो उनकी सहेलियाँ हैरान रह जाती थीं। सहेलियाँ अक्सर कहती थीं कि तुम्हारी आवाज़ साधारण नहीं है और तुम्हें मुंबई जाना चाहिए। सहेलियों की इसी बात से मुमताज़ के भीतर एक बड़ा सपना अंकुरित हुआ। यही सपना आगे चलकर उनकी जिंदगी का मकसद बन गया।
 
शादी और जीवन का सबसे खूबसूरत मोड़

मुमताज़ के जीवन में सबसे खूबसूरत और सकारात्मक मोड़ तब आया जब उनकी शादी हुई। उनकी शादी कश्मीर के मशहूर संगीतकार और म्यूजिक डायरेक्टर राजा बिलाल से हुई। शादी से पहले मुमताज़ अक्सर मज़ाक में कहती थीं कि उन्होंने संगीत से ही शादी कर ली है। वे कहती थीं कि वे कभी किसी इंसान से विवाह नहीं करेंगी। लेकिन किस्मत उन्हें उनके सबसे बड़े संबल के पास ले आई। विवाह के बाद उनका ससुराल ही उनकी "म्यूजिक फैमिली" बन गया। राजा बिलाल ने न केवल एक पति बल्कि एक सच्चे गुरु का फर्ज निभाया। जब भी सामाजिक दबाव से टूटकर मुमताज़ गायन छोड़ने का विचार करती थीं तब राजा बिलाल उनकी ढाल बन जाते थे। वे हमेशा मुमताज़ का हौसला बढ़ाते थे। वे कहते थे कि तुम बेहद पाकीजगी और दिल की सच्चाई से गाती हो। यह खुदा की दी हुई नियामत है और इसे तुम्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
 
"कश्मीर की लता मंगेशकर" उपाधि के पीछे की कहानी

शाही मुमताज़ को "कश्मीर की लता मंगेशकर" की यह प्रतिष्ठित उपाधि ऐसे ही नहीं मिली है। इसके पीछे एक बेहद भावुक किस्सा जुड़ा है। रेडियो कश्मीर के वरिष्ठ अधिकारी और दिवंगत दिग्गज संगीतकार मरहूम गुलाम नबी शेख साहब ने जब पहली बार मुमताज़ की गायकी को सुना तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। वे बेहद भावुक हो गए थे। उन्होंने कहा था कि कश्मीर में तुम्हें गाते हुए देखकर ऐसा महसूस होता है मानो स्वयं लता मंगेशकर ने कश्मीर की वादियों में दूसरा जन्म ले लिया हो। इस सम्मान को याद करते हुए आज भी मुमताज़ भावुक हो जाती हैं। आज भी जब वे लता जी का कालजयी गीत "तेरा साथ है तो मुझे क्या कमी है" गाती हैं तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
 
ALSO WATCH:

 
 
कश्मीरी लोरी और कलात्मक सफलताएँ

शाही मुमताज़ कश्मीर की पहली ऐसी व्यावसायिक महिला कलाकार बनीं जिन्होंने बच्चों के लिए पारंपरिक और आधुनिक कश्मीरी लोरियों को रिकॉर्ड किया। प्रसिद्ध कश्मीरी कवि सागर नजीर की लिखी एक लोरी को जब मुमताज़ ने अपनी ममतामयी आवाज़ दी तो वह पूरे कश्मीर की धड़कन बन गई। आज भी घाटी में जब कोई दुखद घटना या सड़क दुर्घटना होती है तो लोग सोशल मीडिया पर पृष्ठभूमि संगीत के रूप में इसी लोरी का इस्तेमाल करते हैं। इस लोरी में एक माँ का गहरा दर्द और तड़प समाहित है जो लोगों के दिलों को छू लेती है।
 
इसके अलावा राजा बिलाल के साथ गाया उनका गीत "रावण यशोदन" और शहीद शबनम की कविताओं पर आधारित उनके गीत सोशल मीडिया पर लगातार ट्रेंड कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने अपनी पहचान बनाई है। अमेरिका के लेखक सैयद अमीर जाफर के उर्दू गज़ल एल्बम "बहरे तरन" में उनकी आवाज़ को बहुत पसंद किया गया। इसके साथ ही कश्मीर के पहले रिमिक्स एल्बम "सदा" में भी उनकी आवाज़ ने धूम मचा दी।
 
 
सादगी और भविष्य की उड़ान

एक बेहद निजी इंसान होने के नाते शाही मुमताज़ अपनी जन्मतिथि या शैक्षणिक योग्यताओं जैसी व्यक्तिगत जानकारियों को लाइमलाइट से दूर रखती हैं। उनका पूरा ध्यान सिर्फ और सिर्फ अपनी कला पर केंद्रित रहता है। आज उनके दोनों बच्चे उनके सबसे बड़े प्रशंसक हैं। उनका बेटा रोज़ रात को अपनी माँ की आवाज़ में लोरी सुनकर सोता है। मुमताज़ इस पल को दुनिया के किसी भी बड़े पुरस्कार से बढ़कर मानती हैं।
 
आने वाले समय में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बशर जोगियारी, डॉ. अमीन ताबिश और सागर नजीर जैसे दिग्गज शायरों के कलाम मुमताज़ की आवाज़ में रिलीज होने के लिए तैयार हैं। शाही मुमताज़ की यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे बुलंद हों तो समाज की रूढ़िवादिता के अंधेरे को सुरों की रोशनी से मिटाया जा सकता है। उनकी यह यात्रा कश्मीर की आने वाली पीढ़ियों और महिला कलाकारों के लिए एक बड़ा मार्गदर्शक बनेगी।