कीरनूर जाकिरराजा तमिल साहित्य की दुनिया में वह नाम हैं, जिन्हें नज़रअंदाज़ करना संभव नहीं है। उनकी लेखनी ने उन आवाज़ों को शब्द दिए हैं, जो अक्सर समाज के हाशिए पर दबा दी जाती हैं। तमिलनाडु और कभी-कभी केरल के मुस्लिम समुदाय के साधारण पुरुष, महिलाएँ और बच्चे उनके उपन्यासों के पन्नों में सांस लेते दिखाई देते हैं, जैसे साहित्य उन्हें नई ज़िंदगी दे रहा हो। जाकिरराजा की कलम साहसी है, बेबाक है और अपनी ईमानदारी के कारण अक्सर मुस्लिम समाज के रूढ़िवादी और कट्टरपंथी वर्गों की तीखी आलोचना का सामना करती है। नमिलनाडू के कीरनूर से आवाज द वाॅयस की विशेष सीरिज द चेंज मेकर्स केलिए हमारी वरिष्ठ सहयोगी श्रीलता एम ने जाकिरराजा पर यह विशेष रिपोर्ट तैयार की है।
वे स्वयं को, कुछ हद तक, तमिलनाडु का सलमान रुश्दी कहते हैं, हालांकि तुरंत ही स्पष्ट कर देते हैं कि वे लेखन के स्तर पर उनकी तुलना नहीं कर रहे। उनके अनुसार, समानता लेखन शैली में नहीं, बल्कि उस नफ़रत और गुस्से में है, जिसका सामना दोनों को करना पड़ा है। जाकिरराजा कहते हैं कि लोगों ने उन्हें पीटने की कोशिश तक की है और कई बार उन्हें ‘रुश्दी’ कहकर पुकारा गया। यह तुलना उनके लिए गौरव नहीं, बल्कि उस सामाजिक असहिष्णुता का प्रतीक है, जिससे वे वर्षों से जूझते आ रहे हैं।
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उनकी कहानियों के केंद्र में हमेशा समाज के कमजोर और दबे-कुचले लोग रहते हैं, विशेषकर महिलाएँ। वे मुस्लिम समुदाय के भीतर मौजूद पितृसत्तात्मक सोच, लैंगिक असमानता और नैतिक पहरेदारी को बिना किसी डर के उजागर करते हैं।
जीवन के उनके यथार्थवादी और कभी-कभी तीखे चित्रण को कट्टरपंथी वर्गों ने कभी सहजता से स्वीकार नहीं किया। इसके बावजूद, जाकिरराजा अपने लेखन से पीछे नहीं हटे।
अपने नवीनतम उपन्यास में वे एक नई स्त्री पात्र को गढ़ रहे हैं—ख़तीजा, जो ‘नेल्ली’ नाम से लिखती है।
जाकिरराजा बताते हैं कि ‘नेल्ली’ का नाम उन्हें दोस्तोएव्स्की के उपन्यास The Insulted and the Injured की एक दस वर्षीय बच्ची से प्रेरित होकर सूझा। लेकिन उनकी नेल्ली समय के साथ एक सशक्त, साहसी और स्वतंत्र महिला में बदल जाती है।
वह एक या उससे अधिक तलाक़ झेल चुकी है, सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर लिखना चाहती है और अंततः एक प्रसिद्ध लेखिका बनती है। उपन्यास की संरचना भी अनोखी है, जिसमें नेल्ली द्वारा लिखी गई कहानियाँ, कविताएँ और उपन्यासों के अंश शामिल हैं।
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जाकिरराजा अपने लेखन को उत्तर-आधुनिक मानते हैं। उनकी साहित्यिक चेतना पर मलयालम के महान लेखक वैकॉम मुहम्मद बशीर, थकज़ी शिवशंकर पिल्लै और एम.टी. वासुदेवन नायर का गहरा प्रभाव है।
वैश्विक स्तर पर वे दोस्तोएव्स्की, काफ़्का और बोर्खेस से प्रेरणा लेते हैं। तमिल साहित्य में वे पुदुमैपित्थन, अशोकमित्रन और जेयमोहन् को अपना आदर्श मानते हैं। यह विविध साहित्यिक प्रभाव उनकी रचनाओं को गहराई और बहुस्तरीयता प्रदान करता है।
उनकी लेखनी में कमला दास जैसी निस्संकोच ईमानदारी दिखाई देती है। कमला दास, जो बाद में कमला सुरैया के नाम से जानी गईं, स्त्री के आंतरिक संसार, उसकी इच्छाओं और संघर्षों पर बेबाक लेखन के लिए प्रसिद्ध थीं। जाकिरराजा स्वीकार करते हैं कि उनकी पात्र नेल्ली भी उसी परंपरा की प्रतिनिधि है,एक ऐसी स्त्री जो आत्म-सेंसरशिप को अस्वीकार करती है।
जाकिरराजा के उपन्यासों में महिलाएँ जीवन के हर पहलू पर खुलकर बात करती हैं। यौनिकता को वे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा मानते हैं, इसलिए वह उनके लेखन में भी मौजूद है। यही तत्व कट्टरपंथी सोच को असहज करता है और उनकी आलोचना का कारण बनता है।
उनकी प्रिय स्त्री पात्रों में से एक है वडक्केमुरी हलीमा की हलीमा। यह उपन्यास केरल के कोच्चि में आधारित है। हलीमा 25 वर्ष की युवती है, जो घर छोड़कर अभिनेत्री बनने का फैसला करती है। वह कविता, सिनेमा और कला में असाधारण प्रतिभा रखती है, लेकिन चेन्नई में एक कलाकार के रूप में मानसिक संघर्षों और असुरक्षाओं से जूझती है। जाकिरराजा इसे पूरी तरह उत्तर-आधुनिक शैली का उपन्यास बताते हैं।

उनकी लेखनी को प्रेरणा मिलती है तमिलनाडु की साधारण मुस्लिम जनता, विशेषकर महिलाओं की दशा से। वे बताते हैं कि 1950 और 60 के दशक में मुस्लिम महिलाएँ अत्यंत रूढ़िवादी समाज में कैद थीं—चारदीवारी के भीतर, शिक्षा और स्वतंत्रता से वंचित। हालांकि अब परिस्थितियाँ बदल रही हैं और अधिक महिलाएँ अपनी क्षमताओं को पहचान रही हैं।
जाकिरराजा ने हमेशा कट्टरपंथ और आतंकवाद का खुलकर विरोध किया है। कोयंबटूर जैसे आतंकी हमलों पर उनका मानना है कि इस तरह की घटनाएँ पूरे समुदाय को बदनाम करती हैं। उनकी यही स्पष्टवादिता उनके लिए मुश्किलें भी लेकर आई।
उनकी बेबाक लेखनी का परिणाम यह हुआ कि उन्हें अपनी ही जमात से बाहर कर दिया गया। वे कहते हैं कि यह फतवे से भी अधिक कठोर अनुभव था। उनके पहले उपन्यास मीनकारा तेरु के प्रकाशन के बाद उन्हें जमात से निष्कासित कर दिया गया, हालांकि वे आज भी दान देना जारी रखते हैं।
आर्थिक स्वतंत्रता के लिए उन्होंने स्वयं प्रकाशक बनने का रास्ता चुना, क्योंकि तमिलनाडु में लेखकों को बहुत कम रॉयल्टी मिलती है। आज वे तंजावुर में रहते हैं और पूरी तरह लेखन को समर्पित हैं। उनकी पत्नी सलमा बानो भी अब लेखन की दुनिया में कदम रख चुकी हैं।
उनका उपन्यास इद्दत इस्लामिक सामाजिक नियमों के तहत महिलाओं पर थोपे गए प्रतिबंधों की पीड़ा को उजागर करता है, जबकि मीनकारा तेरु ग़रीब मुस्लिम मछुआरों के संघर्षों की कहानी कहता है।जाकिरराजा का मानना है कि वे कट्टरता के विरुद्ध हैं, लेकिन धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में पूरी मजबूती से खड़े हैं। उनके अनुसार, हर नागरिक को अपनी आस्था, पहनावे और पूजा-पद्धति को स्वतंत्र रूप से अपनाने का अधिकार है। यही समाज का मूल ताना-बाना है, जिसे किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं पड़ने देना चाहिए।
वडक्केमुरी हलीमा के एक दृश्य में वे लिखते हैं कि जब हलीमा किसी कस्बे में कदम रखती है, तो यह संकेत होता है कि रमज़ान करीब है। पिछले दस वर्षों से वह रमज़ान के पहले दिन पुलियाकुलम पहुँचती है—कंधे पर बैग और चाल में विद्रोह। कुत्ते उसकी गंध पहचानकर पूरे शहर में उसके आगमन की घोषणा कर देते हैं। इस अनोखे स्वागत पर हलीमा को गर्व महसूस होता है।जाकिरराजा की यही लेखनी है—जो हाशिए पर पड़े जीवन को न सिर्फ़ देखती है, बल्कि उसे गरिमा, आवाज़ और शक्ति भी प्रदान करती है।