-डॉ. फ़िरदौस ख़ान
हर साल रमज़ान के आते ही कई सवाल उठ खड़े होते हैं, जैसे क्या रोज़े की हालत में ख़ुशबू, सुरमा और काजल लगाना जायज़ है? क्या ऐसा करने से रोज़ा टूट जाता है ? रोज़े की हालत में इत्र, सुरमा और काजल लगाने से रोज़ा नहीं टूटता। रोज़े में ख़ुशबू और सुरमा लगाना सुन्नत है और ये मुख़तलिफ़ हदीसों से साबित है।हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "तुम्हारी दुनिया में से मुझे औरतें और ख़ुशबू पसंद है और मेरी आँखों की ठंडक नमाज़ में रखी गई है।"(सुनन नसाई : 3939)

चूंकि अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इत्र पसंद फ़रमाते थे और किसी भी सहीह हदीस में रोज़े के दौरान इसे लगाने से मना नहीं किया गया है, इसलिए इसे जायज़ माना जाता है।अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जब तुममें से किसी को ख़ुशबू पेश की जाए तो उसे रद्द न करो, क्योंकि ये उठाने में हल्की और महक में उम्दा है।“(सहीह मुस्लिम : 5883, सुनन नसाई : 5261)
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है- “अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ख़ुशबू के तोहफ़े को कभी वापस नहीं करते थे।“(सहीह बुख़ारी : 2582)
दरअसल इस हदीस के ज़रिये अल्लाह के रसूल हज़रत मुहमम्द सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने सादगी, हुस्ने-अख़लाक़ और दिल आज़ारी से बचने की शिक्षा दी है। मामूली चीज़ को भी दिल से क़ुबूल करना चाहिए। ये इंसान के नरम दिल और शुक्रगुज़ार होने की अलामत है।
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- “जो शख़्स जुमे के दिन ग़ुस्ल करके ख़ूब अच्छी तरह से पाकी हासिल करे और तेल लगाए या घर में मयस्सर ख़ुशबू इस्तेमाल करे, फिर नमाज़ के लिए निकले और मस्जिद पहुंच कर दो आदमियों के दरमियान दाख़िल न हो, फिर जितनी हो सके नफ़िल नमाज़ पढ़े और जब इमाम ख़ुत्बा शुरू करे तो ख़ामोशी से सुनता रहे तो उसके उस जुमे से लेकर पिछले जुमे तक के सारे गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं।“(सहीह बुख़ारी : 883)
अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ात मुबारक ख़ुशबू से इतनी महकती थी कि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को अलग से इत्र लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, फिर भी आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सुन्नत के तौर पर इसे इस्तेमाल करते थे। इस बारे में बहुत-सी हदीसें मौजूद हैं।
हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं- "मैंने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की मुश्क और अम्बर से बढ़कर कोई और ख़ुशबू कभी नहीं महसूस की।"(सहीह बुख़ारी : 3561)
मुख़तलिफ़ हदीसों और रिवायतों में आता है कि जब अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम किसी रास्ते से गुज़रते थे, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जिस्मे-मुबारक से फूटने वाली ख़ुशबू की लपटें फ़ज़ाओं को मुअत्तर कर देतीं। रास्ते महक उठते और घरों में बैठे लोगों को भी हवा के झोंके ये पैग़ाम पहुंचा देते कि प्यारे आक़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम क़रीब से गुज़रे हैं।
हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है- “जब नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम चलते थे, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पसीने की बूंदें मोतियों की तरह चमकती थीं, और जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम किसी रास्ते से गुज़रते, तो आपके जिस्म की ख़ुशबू से पूरा रास्ता महक उठता था।“ (सहीह मुस्लिम : 2330)
क़ाबिले ग़ौर है कि रोज़े की हालत में अगर ख़ुशबू अगरबत्ती या लोबान के धुएं की शक्ल में है, तो उसे जानबूझकर नाक या मुंह के ज़रिये अंदर खींचने से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना हुक़्क़ा पीने जैसा होगा और इससे रोज़ा मकरूह हो सकता है।
सुरमा
इस्लाम में ख़ुशबू की तरह सुरमे की भी बहुत अहमियत है। अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को सुरमा लगाना पसंद था और आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम सुरमा लगाया करते थे। इसलिए सुरमा लगाना भी सुन्नत है। हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायत है- "अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रमज़ान में रोज़े की हालत में आँखों में सुरमा लगाया करते थे।" (इब्ने माजा : 1678)
इससे साबित होता है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रोज़े की हालत में भी सुरमा लगाया करते थे। इसलिए रोज़े की हालत में सुरमा लगाना सुन्नत है और इससे रोज़ा नहीं टूटता। हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु रोज़े में सुरमा लगाते थे और नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें इससे मना नहीं किया।
हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया- "तुम्हें इस्मिद (सुरमा) इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि यह आँखों की रौशनी को तेज़ करता है और पलकों के बालों को घना करता है।" (सुनन इब्न माजा : 3496)
हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है- “नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम हर रात सोने से पहले तीन मर्तबा इस्मिद सुरमा लगाया करते थे।”(मुस्तदरक हाकिम : 8249)
हज़रत इमरान बिन अबी अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है- “अल्लाह के रसूल हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस्मिद सुरमा लगाया करते थे। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम दाईं आँख में तीन सलाइयां सुरमा लगाते थे और बाईं आँख में दो सलाइयां सुरमा लगाते थे।“(इब्न अबी शायबाह : 23953)
सुरमा लगाने का सुन्नत तरीक़ा
बेशक सुरमा लगाना सुन्नत है। सुरमा लगाने के भी अपने आदाब हुआ करते हैं। रात में सोने से पहले सुरमा लगाना सबसे बेहतर माना गया है। सुरमा लगाने का सुन्नत तरीक़ा ये है कि सबसे पहले बिस्मिल्लाह के साथ सुरमा लगाने की दुआ पढ़ी जाए-اللَّهُمَّ مَتِّعْنِي بِالسَّمْعِ وَالْبَصَرِ
अल्लाहुम्मा मत्तिअनी बिस समी वल बसरी
यानी ऐ अल्लाह ! मुझे सुनने और देखने में फ़ायदा अता फ़रमा।दुआ पढ़ने के बाद दाईं आँख में तीन बार और बाईं आँख में दो बार सुरमा लगाया जाता है।सलाई को सुरमे में डुबोकर, आँख की निचली पलक की भीतरी सतह पर लगाया जाता है। सलाई को आँख के कोने से शुरू करके बाहर की तरफ़ फेरा जाता है।
सुन्नत के मुताबिक़ इस्मिद सुरमा सबसे बेहतर है। इस्मिद एक ख़ास पत्थर है, जो मुख्य रूप से पश्चिमी सऊदी अरब में लाल सागर के किनारे स्थित हिजाज़ और ईरान के शहर इस्फ़हान के पहाड़ों में पाया जाता है। यह काले रंग का होता है, जिसमें हल्की लालिमा होती है। इसे पीसकर बारीक पाउडर बनाया जाता है, जिसे आँखों में लगाया जाता है। हाजी व अन्य ज़ायरीन अरब से यह सुरमा अपने साथ लाते हैं।
दरअसल, सुरमा लगाना सिर्फ़ एक सुन्नत ही नहीं है, बल्कि यह आँखों के लिए बहुत ही फ़ायदेमंद है। इससे आँखें साफ़ हो जाती हैं। इससे थकान दूर होती है। आँखों को ठंडक मिलती है। आँखों की रौशनी तेज़ होती है और पलकों के बाल घने होते हैं, जिससे आँखों की ख़ूबसूरती में इज़ाफ़ा होता है।
(लेखिका आलिमा हैं और उन्होंने फ़हम अल क़ुरआन लिखा है)