नीलम गुप्ता
पूरा परिवार एक शादी में गया। वहां मेरी दादी ने मेरी सगाई करवा दी। मैं उस समय मात्र तीसरी क्लास में पढ़ रही थी। जयपुर के सेंट जोस स्कूल में। पिता लेक्चरार थे। उन्हें और मां दोनों को ही सही नहीं लगा पर दादी के सामने वे कुछ बोले नहीं। उनकी खामोशी ने मेरी जिंदगी को एकदम घुटनों पर ला दिया। लड़का पापा के दोस्त का बेटा था और हमारी गली में ही रहता था। ससुराल वालों ने कहा अब यह स्कर्ट नहीं पहनेगी। मेरा स्कूल बदल दिया गया। वह था तो इंगलिश मीडियम ही। पर उसमें यूनिफार्म सलवार कुर्ता थी। अभी तक बुद्ध के बारे में कुछ पता नहीं था।
पर अब स्कूल बुर्का पहन कर जाना पड़ता। दम घुटता। कई बार रास्ते में गिर भी जाती। स्कूल खत्म हुआ तो महारानी कॉलेज में एडमिशन लिया। एम ए उर्दू में ही किया। असल में पापा से बचपन में सुना करती थी कि अपनी जुबान से प्यार करो वरना यह मर जाती है। यह बात मेरे जहन में बैठ चुकी थी। एम ए के बाद एम फिल और फिर पीएचसी भी की। विषय था क्रिटिकल एनालिसस ऑफ उर्दू नॉयल्स ऑन कल्बर ऑफ इंडिया। मैं चाहती तो तभी लेक्चरार बन सकती थी।
पर नहीं। क्योंकि मुझे यह प्रोफेशन बहुत उल लगता था। मैं घर से बाहर निकल कर कुछ चिलिंग भरे प्रोफेशन में जाना चाहती थी। इसलिए दिल्ली के एक प्राईवेट इंस्टीच्यूट से पत्रकारिता का एक साल का डिप्लामा किया। और कई पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखने लगी। नज्में और कहानियां तो पहले से ही छप रहे थे।
मेरी पहली कहानी दसवीं क्लास में छपी थी। स्टेज पर नज्म पढ़ने की मुझे इजाजत नहीं थी। पापा का कहना था शायर लड़कियों को सही नजर से नहीं देखते। स्कूल-कॉलेज के फंक्शनों में नज्में पढ़ती थी। कॉलेज में आने के बाद ऑल इंडिया रेडियो में भी जाने लगी और टीवी के मुशायरों में भी मुझे बुलाया जाने लगा। पापा खुद मुशायरों में नज्म पढ़ने जाते थे। तो अगर किसी मुशायरे में हम दोनों को ही बुलाया जाता तो मैं उनके साथ चली जाती थी। फिर जब वे कारोबार के लिए सिंगापुर में रहने लगे तो अकेले भी चली जाती।
जीनत कहती हैं कि पत्रकारिता कोर्स करते हुए ही उन्होंने गृहशोभा, सरिता, मुक्ता मनोहर कहानियों जैसी देश की विभिन्न पत्रिकाओं में लिखना शुरू कर दिया था। फिर नवभारत टाइम्स अखबार में जाकर बैठने लगी। दो तीन घंटे बैठती। जो काम बताया जाता कर देती। मेरे घर वाले नहीं चाहते थे कि मैं जर्नलिज्म में आऊं। पर जब मैंने तय कर लिया तो किसी ने विरोध भी नहीं किया। नवभारत टाइम्स में एक दिन मुझसे कहा गया दिलीप कुमार जयपुर में हैं आप उनका इंटरव्यू करके लाइए।
उन्हें पता था कि इससे पहले मैं शहरुख खान, सलमान खान का इंटरव्यू कर चुकी हूं। ये पत्रिकाओं में छपे थे। बतौर फ्रीलांसर अपने आप ही लिए थे। तो मैं दिलीप साहब से टाइम लेकर उनके पास पहुंच गई। उन्होंने कहा-लड़की। मैं तुम्हें इस फिल्म के बारे में कुछ भी नहीं बताने वाला। कोई और बात करनी है तो करो। मैं एकदम सकपका गई। कुछ समझ नहीं आया क्या बोलूं। मेरी ओर देखते हुए वे फिर बोले- होम वर्क नहीं किया न। जाओ पहले होमवर्क करो। तीन दिन बाद आना। उस दिन मैने जर्नलिज्म का पहला पाठ सीखा। कहीं भी जाओ-होम वर्क करके जाओ। दिन-रात एक कर दिलीप साहब के बारे में जो कुछ भीअखबार के दफ्तर या लाइब्रेरी में मुझे मिला मैने सब छान डाला।
तीन दिन बाद मैं गई। 11 बजे हमारी बात शुरू हुई और शाम हो गई। पूरे एक पेज का इंटरव्यू नवभारत टाइम्स में छया। मेरे नाम से। इससे पत्रकारों व लोगों के बीच मेरा नाम गया। मुझे उम्मीद बंधी कि अब नवभारत टाइम्स में मुझे काम मिल जाएगा। पर ऐसा नहीं हो सका।
कारण, दिलीप साब का इंटरव्यू छपने के बाद फिल्म बीट का रिपोर्टर मुझ से खुदक खाने लगा और वह इस हद तक बढ़ी कि मैने वहां से हट जाने में ही अपनी भलाई समझी। इस बीच एक दिन में आकाशवाणी में एक प्रोग्राम देने गई तो वहां उर्दू सेवा के प्रोड्यूसर ने बताया कि दिल्ली से राष्ट्रीय सहारा उर्दू में अखबार निकालने जा रहा है। तुम जयपुर से रिपोर्टर के लिए बात करो। मैंने की और मुझे बतौर रिपोर्टर काम मिल भी गया। अब मैं जयपुर में सहारा के ऑफिस में बैठेने लगी।
पहली बार पूरे अधिकार के साथ। इससे मेरे भीतर एक अलग तरह के आत्मविश्वास ने जन्म लिया। अखबार क्योंकि साप्ताहिक था तो स्टोरीज के लिए समय काफी मिल जाता था। मेरी कोशिश होती कि मैं कोई ऑफबीट स्टोरी ही दूं। इससे लोगों के बीच तो मेरी पहचान बनी ही, राजनेताओं और ब्यूरोक्रेसी में भी मुझे जाना जाने लगा। मैंने कई घेटालों को एक्सपोज किया।
चाइल्ड लेबर की मेरी स्टोरी पर कार्रवाई हुई। एक समय ऐसा भी आया कि मुझे स्टारी के पास नहीं जाना होता। स्टोरी खुद ही मेरे घात चलकर आने लगी। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सम्मेलन को मुझे बुर्का पहनकर कवर करना पड़ा क्योंकि अध्यक्ष मुझ से बात करने को तैयार नहीं था। ऐसा कई बार हुआ कि स्टोरी की जगह तक पहुंचने और भीतर घुसने के लिए मुझे बुर्के का इस्तेमाल करना पड़ा। मै, राजस्थान के पत्रकारिता जगत में पहली मुस्लिम महिला थी। इसलिए मुझे शोहरत बहुत मिली। काम भी बेखॉफ बिंदास और पूरे जज्बे के साथ किया।
पर क्या आपको अपने दफ्तर में बतौर महिला कोई समस्याएं नहीं आई?
जीनत कहती हैं- नौएडा में बैठे अखबार के संपादक अक्सर मेरी अच्छी स्टोरी को रीराइट कर उसपर अपना नाम लगा दिया करते। मेरे पूछने पर कहते तुम अच्छा नहीं लिखती इसलिए मैं ऐसा करता हूं। पर आप मेरा भी नाम तो दिवा करिए इस पर वे चुप रहते।
वे जब भी किसी काम से जयपुर आते तो मुझे पूरा दिन उनके साथ रहना होता। फिर चाहे मेरा कोई काम हो या न हो। किसी दफ्तर में जाते तो मुझे बाहर बिठा देते। यहां तक भी ठीक था। शुरू में तो ये चाहते थे कि जब ये आएं तो उनकी कार का दरवाजा खोल कर मैं उन्हें रिसीव करूं। मैंने इसके लिए मना कर दिया। उनकी इसी तरह की अपेक्षाओं को नकारते जाने का नतीजा यह हुआ कि उन्होंने मेरी स्टोरीज को छापना ही बंद कर दिया।
तब यहां हिंदी के मेरे साथियों ने कहा कि आप हमारे लिए कर दिया करिए। पहले भी मेरी कई अच्छी स्टोरीज हिंदी सहारा में मेरे ही नाम से छपती रहीं थी। कई बार लगा कि छोड़ दूं। क्योंकि वे मुझे एक भी प्रमोशन नहीं दे रहे थे। आए दिन कोई न कोई नई ऐसी समस्या मेरे लिए खड़ी कर दी जाती जिससे मेरा काम करना कठिन से कठिनतर होता जा रहा था।
पर मैंने हिम्मत नहीं हारी। काम इतनी आसानी से मिलता कहां है। यह भी पसंद का। सो करती रही। उस संपादक के चले जाने के बाद जब दूसरे आए तो मुझे प्रमोशन मिला। पर 2018 में जब सहारा समूह संकट में आ गया और छह महीने तक सेलरी नहीं मिली तो छोड़ दिया।
अपने काम के लिए जीनत को कई अवार्ड भी मिले। पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर ने 2002 में उन्हें लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड से पुरस्कृत किया। राजस्थान उर्दू अकादमी ने भी सम्मनित किया। इसी तरह उर्दू में लिखी कहानियों और शायरी के लिए भी उन्हें कई पुरस्कार मिले। कई बार विदेशों में मुशायरों में हिस्सा लिया। दिल्ली स्थित अमेरिका की उर्दू अकादमी की नजर जब पत्रिकाओं में छपी नज्मों पर पड़ी तो उसने मुझे अमरिका भेजा। पूरा ट्रपे था। हम दस शहरों में गए।
एक सफल पत्रकार बनने में जीनत के सामने कुछ कठिनाइयां आई पर क्योंकि परिवार शिक्षित था इसलिए उधर से कोई खास बाधा उपस्थित नहीं हुई और हुई भी तो जीनत को उसकी परवाह कहां। उसके बिंदासपने का अंदाज तो इसी से लगाया जा सकता है कि बचपन में गली के जिस लड़के से सगाई हुई कॉलेज में आने पर खुद ही मिलने के लिए उत्ते जयपुर के एक रेस्टोरेंट में बुला लिया। लड़के ने बैठते ही जसे लाइटर पकड़ाया, सिगरेट मुंह में रखी और कहा इसे जलाओ। जीनत के दो बार मना करने पर भी जब वह नहीं माना तो उसके मुंह पर पानी का गिलास फेंका और उठकर चली आई। वह कहती है मेरे आ जाने के बाद न जाने कैसे पुलिस आई और वहां बैठे सभी जोड़ों को पकड़ कर ले गई। इसे भी। ससुराल वालों ने माता पिता से शिकायत की। किसी को भी जीनत से इसकी उम्मीद नहीं थी। पूछने पर जीनत ने माता-पिता से कहा-आपको बता कर मिलती तो यह पता नहीं लगता जो अब लगा है।

वह काला और मोटा तो है ही दिमाग से भी खाली है। मुझे उससे शादी नहीं करनी। सगाई तोड़ दो। मांता-पिता इसके पक्ष में नहीं थे क्योंकि उन्हें लगता था दुबारा लड़का मिलना मुश्किल हो जाएगा। बहर हाल अंततः लड़के बालो ने ही सगाई तोड़ दी। मां ने बताया तो मैने कहा लड्डू बटवाओ। इसके बाद दो बार सगाई हुई और वह भी टूट गई। कारण, सगाई के बाद दबाव आता कि यह बुर्का पहने। मुशायरों में न जाए। यह अब हो नहीं सकता था। फिर एक बार सहारा टीवी के एक पत्रकार अजमेर में उर्स कवर करने नौएडा से आए। मैं भी जयपुर से गई। हम करीब 10 दिन साथ रहे।
लगा हम जीवन साथी बन सकते हैं। और सगाई हो गई। पर भाग्य में कुछ और ही लिखा था। हमारी करीब-करीब रोज ही बात होती। पर एक बार आफिशिल मिटिंग के लिए नौएडा आफिस में गई तो देखा जनाब के वहीं दफ्तर में अपनी एक सहयोगी से धनिष्ठ प्रेम संबंध है। घर में बात की और वह सगाई भी स्वाहा हो गई। अब जो शादी का प्रस्ताव आया वह मेरे बचपन के एक दोस्त की तरफ से था। सेंट जॉस स्कूल में हम एक साथ पढ़ते थे। सेंट जोस स्कूल छोड़ देने के बाद हमारी कभी मुलाकात नहीं हुई।
अब तक उसकी शादी हो चुकी थी और चार बच्चे थे। मना कर दिया। पर जयपुर में हम बत्तौर दोस्त मिलते रहे। इस बीच में अपने मम्मी-पापा के साथ हज पर गई। बहां मदीना में एक व्यक्ति मेरे लिए बुके लेकर आया। उसमें एक खत भी था। यह खत मेरे उसी दोस्त की ओर से था जिसमें लिखा था-मैं तुम्हें बहुत खुश रखूंगा।
तुम्हारे पर मेरा कोई प्रतिबंध नहीं होगा। तुम जैसे भी रहना चाहोगी, रहना। मम्मी-पापा ने भी वह खत पढ़ा। काफी विचार के बाद अंततः सारा परिवार सहमत हो गया और हमारी शादी हो गई। आज मेरे पास पास एक बेटा है। पति दोनों परिवारों को साथ लेकर चल रहा है। जिंदगी खुशहाल थी। पर 2022 में तीन बहनों में से एक का इंतकाल हो गया। जीनत उसक विछोह को बर्दाश्त नहीं कर पाई और डिप्रेशन में चली गई। करीब साल भर की कोशिशों के बाद बेटे ने उसे बाहर निकाला और अब फिर पत्रकारिता की चुनौतियां का सामना करने के लिए वह तैयार है।