फरहान इसराइली/जयपुर
जयपुर में स्थित रामनिवास बाग के रवींद्र मंच पर कदम रखते ही एक अलग दुनिया का अहसास होता है। इसकी दूसरी मंजिल पर दी डागर आर्काइव बना हुआ है। यहां प्रवेश करते ही भारतीय शास्त्रीय संगीत का 500 साल पुराना इतिहास जीवंत हो उठता है। यहां रखे सदियों पुराने तानपुरे, दुर्लभ पांडुलिपियां, पुरानी तस्वीरें, सिर की पगड़ियां और ऐतिहासिक दस्तावेज सिर्फ पुरानी चीजें नहीं हैं। यह सब मिलकर ध्रुपद संगीत की एक महान और अटूट परंपरा की कहानी बयां करते हैं। इस अनमोल सांस्कृतिक खजाने को सहेजने का जिम्मा डागर घराने की 20वीं पीढ़ी संभाल रही है। शबाना डागर और उनके भाई इमरान डागर दिन-रात इस काम में लगे हैं।
20 पीढ़ियों का अटूट सफर और ध्रुपद का इतिहास
भारतीय शास्त्रीय संगीत में डागर घराना एक मिसाल की तरह है। इस घराने ने 20 पीढ़ियों से ध्रुपद गायकी की परंपरा को लगातार जीवित रखा है। ध्रुपद को भारतीय संगीत का सबसे प्राचीन रूप माना जाता है। इसकी शुरुआत सामवेद के दौर से मानी जाती है। पुराने समय में ध्रुपद की प्रस्तुति सिर्फ मंदिरों में होती थी। उस दौर में यह प्रदर्शन का जरिया नहीं बल्कि ईश्वर की आराधना और आत्मिक साधना का माध्यम था।

डाॅ एपीजे अब्दुल कलाम का स्वगत करतीं शबाना डागर
समय बीतने के साथ यह गायकी राजदरबारों तक पहुंची। राजाओं ने इसे सम्मान दिया और इसका संरक्षण किया। शबाना डागर का कहना है कि ध्रुपद असल में मन को शांत करने और ध्यान लगाने की विधा है। आज जिसे हम मेडिटेशन कहते हैं, ध्रुपद सदियों पहले से वही काम करता आया है।
बाबा गोपाल दास से बाबा बेहराम ख़ाँ तक का गौरवशाली सफर
डागर घराने का इतिहास बहुत विशाल है। इस घराने के वंशावली दस्तावेज बताते हैं कि प्रसिद्ध संगीत साधक बाबा बेहराम ख़ाँ के पिता का नाम बाबा गोपाल दास था। बाबा बेहराम ख़ाँ मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र के समय में दिल्ली दरबार से जुड़े हुए थे। जब अंग्रेजों ने सम्राट को रंगून भेज दिया, तब जयपुर के राजा सवाई राम सिंह बाबा बेहराम ख़ाँ को सम्मान के साथ जयपुर ले आए।
जयपुर दरबार में रहकर उन्होंने अनेक शिष्यों को संगीत की बारीकियां सिखाईं। उनका निधन लगभग 125 वर्ष की उम्र में जयपुर में ही हुआ था। वे केवल अपने घराने के ही नहीं बल्कि कई अन्य संगीत शैलियों के कलाकारों के भी गुरु रहे। उनके ज्ञान और साधना के कारण उन्हें बहुत आदर मिला।
बाद में उस्ताद अल्लाबंदे ख़ाँ और उस्ताद ज़ाकरुद्दीन ख़ाँ जैसे दिग्गजों ने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया। जयपुर में आज भी बाबा बेहराम ख़ाँ की यादें मौजूद हैं। रामगंज चौपड़ के पास एक रास्ते का नाम बाबा बेहराम ख़ाँ डागर मार्ग है। वहां उनका ऐतिहासिक मकान भी है। आकाशवाणी जयपुर के भवन में उनकी एक ऐतिहासिक ऑयल पेंटिंग और गगन विज द्वारा बनाई गई प्रतिमा स्थापित है।
शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में डागर परिवार का योगदान
शबाना डागर के दादा उस्ताद अल्लाबंदे इमामुद्दीन ख़ाँ डागर भी बड़े संगीतकार थे। वे उदयपुर के महाराणा भूपाल सिंह के दरबार में करीब चालिस सालों तक राजसंगीतज्ञ रहे। इस परिवार ने देश को एक से बढ़कर एक महान कलाकार दिए हैं। इनमें नसीरुद्दीन डागर, उस्ताद रहीमुद्दीन डागर, उस्ताद इमामुद्दीन ख़ाँ डागर, उस्ताद फहीमुद्दीन डागर, उस्ताद अमीनुद्दीन डागर और उस्ताद वासीफुद्दीन डागर जैसे नाम शामिल हैं।
गायन के साथ-साथ इस परिवार ने वादन में भी नए आयाम स्थापित किए। उस्ताद बंदे अली ख़ाँ भारत के बहुत बड़े बीनकार माने जाते हैं। वर्तमान में उस्ताद बहाउद्दीन डागर रुद्र वीणा की परंपरा को संभाले हुए हैं। उन्हें वर्ष 2012 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा गुंडेचा बंधु, ऋत्विक सान्याल और उदय भवालकर जैसे महान कलाकारों ने इसी घराने से सीख लेकर ध्रुपद को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है।

सामाजिक बंदिशों को तोड़कर आगे आईं शबाना डागर
डागर परिवार में लंबे समय तक पर्दा प्रथा का असर रहा। ध्रुपद को हमेशा पुरुषों की गायकी माना गया। परिवार की महिलाओं को कभी मंच पर गाने की अनुमति नहीं मिली। शबाना डागर ने कभी औपचारिक रूप से ध्रुपद गायन नहीं सीखा था। वे फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में काम कर रही थीं। उनके भाई इमरान डागर का रुझान क्रिकेट की तरफ था।
समय के साथ दोनों भाई-बहन को लगा कि अगर उन्होंने पहल नहीं की तो पूर्वजों का यह खजाना बिखर जाएगा। शबाना डागर अपने घराने की पहली महिला बनीं जिन्होंने गाने के बजाय इस महान विरासत के संरक्षण का जिम्मा संभाला। उन्होंने अपनी पुरानी राह छोड़कर पूरी तरह से कला के इस केंद्र को संभालने का फैसला किया।
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दी डागर आर्काइव की स्थापना और दुर्लभ संग्रह
विरासत को बचाने की शुरुआत वास्तव में 1978 में हुई थी। शबाना के पिता उस्ताद अलीमुद्दीन डागर ने एक समिति बनाई थी। बाद में वर्ष 2003 में शबाना और इमरान ने मिलकर उस्ताद इमामुद्दीन ख़ाँ डागर इंडियन म्यूजिक, आर्ट एंड कल्चर सोसायटी का गठन किया। इसके बाद नवंबर 2009 में दी डागर आर्काइव की नींव रखी गई।
रवींद्र मंच पर बनी इस आर्काइव में दो बड़ी गैलरियां हैं। यहां प्राचीन वाद्ययंत्र, पुरानी पगड़ियां, बुजुर्गों की इस्तेमाल की हुई चीजें, सम्मान पत्र, किताबें और वंश-वृक्ष रखे गए हैं। इस संग्रह का सबसे बड़ा आकर्षण 200 साल पुराने तानपुरे हैं। इन तानपुरों पर घराने की कई पीढ़ियों ने रियाज किया है।
इस आर्काइव में हर महीने सैकड़ों छात्र, शोधार्थी और संगीत प्रेमी पहुंचते हैं। आम लोगों और युवाओं को जोड़ने के उद्देश्य से यहां प्रवेश पूरी तरह मुफ्त रखा गया है। यहां रखे कई वाद्ययंत्र ऐतिहासिक महत्व के हैं और उनका कोई मोल नहीं लगाया जा सकता।

शोध का केंद्र और रुद्र वीणा का संरक्षण
यह आर्काइव सिर्फ पुरानी चीजों का संग्रहालय नहीं है। यह शोध करने वाले छात्रों के लिए एक बड़ा केंद्र बन चुका है। यहां कई दुर्लभ ऑडियो रिकॉर्डिंग्स रखी हुई हैं। इनमें गुरु-शिष्य परंपरा के तहत दी जाने वाली तालीम की असली आवाजें दर्ज हैं।
इसके साथ ही डागर परिवार का रुद्र वीणा से बहुत गहरा नाता रहा है। उस्ताद मोइनुद्दीन डागर ने रुद्र वीणा की बनावट में कई तकनीकी बदलाव किए थे। उनके इन सुधारों की वजह से इसे डागर वीणा भी कहा जाने लगा। आज रुद्र वीणा बजाने वाले कलाकार बहुत कम बचे हैं।
एक अच्छी रुद्र वीणा को बनाने में छह महीने से लेकर एक साल तक का समय लगता है। इसे कलाकार के शरीर के हिसाब से तैयार किया जाता है। उस्ताद बहाउद्दीन डागर पनवेल में अपने गुरुकुल के जरिए इस दुर्लभ वाद्य को बचाने का काम कर रहे हैं।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों से नई पीढ़ी को जोड़ने की कोशिश
संस्था की ओर से गुणीजन सभा का आयोजन नियमित रूप से किया जाता है। दिल्ली में इसके 80 से अधिक सफल कार्यक्रम हो चुके हैं। इस मंच पर कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज जैसी महान हस्तियों ने शिरकत की है।
पिछले 18 सालों से जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के सुबह के सत्रों का संचालन भी इसी संस्था द्वारा किया जाता है। इसके अलावा देश की बड़ी अकादमियों के साथ मिलकर ध्रुपद यात्रा और रुद्र वीणा फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है।
शबाना डागर का मानना है कि अगर युवा अपनी जड़ों को नहीं समझेंगे तो संस्कृति को बचाना नामुमकिन हो जाएगा। रवींद्र मंच की दूसरी मंजिल पर मौजूद यह संग्रह सिर्फ पुरानी यादों का डिब्बा नहीं है। यह भारत की उस अटूट साधना का जीवंत सुबूत है जिसकी गूंज आज भी साफ सुनाई देती है।