32 साल में हजारों महिलाओं की जिंदगी बदलने की कोशिश करती निशात हुसैन

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 31-07-2026
Nishat Hussain has been striving to transform the lives of thousands of women over the past 32 years.
Nishat Hussain has been striving to transform the lives of thousands of women over the past 32 years.

 

फरहान इसराइली/ जयपुर

जयपुर के जौहरी बाजार में एक छोटा सा दफ्तर है, जहां रोज सुबह से महिलाएं अपनी परेशानियां लेकर पहुंचने लगती हैं। कोई तलाक के विवाद में फंसी होती है, कोई घरेलू हिंसा से परेशान होती है, तो कोई अपने टूटते घर को बचाने की उम्मीद लेकर आती है। पिछले 32वर्षों से निशात हुसैन इसी दफ्तर से महिलाओं की काउंसलिंग, पारिवारिक विवादों के समाधान और सामाजिक मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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निशात हुसैन का जन्म राजस्थान के करौली जिले के सीताबाड़ी मोहल्ले में हुआ था। उनका परिवार उस इलाके का इकलौता मुस्लिम परिवार था, जो तीन मंदिरों के बीच रहता था। वह बचपन को याद करते हुए कहती हैं कि उस वक़्त हमें नहीं पता था कि कौन हिंदू है और कौन मुसलमान, हम सब एक जैसे थे।

उस दौर में करौली जैसे पिछड़े इलाके में लड़कियों की शिक्षा लगभग न के बराबर थी। लेकिन निशात ने तमाम सामाजिक बंदिशों के बावजूद पढ़ाई जारी रखी और करौली जिले से दसवीं कक्षा पास करने वाली पहली मुस्लिम लड़की बनीं। पूरे स्कूल में करीब 1200 छात्राओं के बीच वह अकेली मुस्लिम छात्रा थीं। उनके पिता करौली राजघराने के प्रमुख दर्जी थे।

उनकी शादी जयपुर के मोहम्मद हुसैन से हुई, जो राजपत्रित अधिकारी होने के साथ प्रगतिशील सोच रखने वाले व्यक्ति थे। निशात कहती हैं कि उनके पति ने हमेशा उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। शादी के बाद उन्होंने “निशात एकेडमी” नाम का स्कूल शुरू किया, जहां करीब 350जरूरतमंद बच्चों को शिक्षा दी जाती थी।

इनमें अधिकांश बच्चे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से थे। लेकिन 1989के जयपुर दंगों ने उनकी जिंदगी को नई दिशा दी। सांप्रदायिक हिंसा के दौरान उनका स्कूल भी खतरे में आ गया था, लेकिन बच्चों और अभिभावकों ने स्कूल की रक्षा करते हुए कहा कि यह शिक्षा का मंदिर है।

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हमें नहीं पता कि यह हिंदू है या मुस्लिम, लेकिन यह हमारे बच्चों को शिक्षा दे रही हैं। निशात कहती हैं कि वही पल उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट था। इसके बाद उन्होंने समाज सुधार और महिलाओं के अधिकारों के लिए पूरी तरह काम शुरू कर दिया।

1992 में उन्होंने नेशनल मुस्लिम वूमेन वेलफेयर सोसाइटी को पंजीकृत कराया। वह बताती हैं कि संस्था के नाम में मुस्लिम शब्द इसलिए जोड़ा गया ताकि यह संदेश जाए कि मुस्लिम महिलाएं भी देश की प्रगति और सामाजिक बदलाव में बराबर की भागीदार हैं। संस्था ने सांप्रदायिक सौहार्द, महिला अधिकार, शिक्षा और सामाजिक सुधार जैसे मुद्दों पर लगातार काम किया।

निशात हुसैन पिछले कई वर्षों से ट्रिपल तलाक, बाल विवाह और महिलाओं के अधिकारों पर लगातार काम कर रही हैं। उनका कहना है कि इस्लाम ने महिलाओं को बहुत ऊंचा दर्जा दिया है, लेकिन लोगों ने कुरान को उसके सही अर्थ और समझ के साथ पढ़ने की कोशिश नहीं की। उनके मुताबिक ट्रिपल तलाक पर बना कानून कुरान की भावना के अनुरूप है। वह इसे कुरान की जीत मानती हैं।

निशात कहती हैं कि कुरान कहीं भी बिना वजह चार शादियों की इजाजत नहीं देता। उनके अनुसार इस्लाम में इंसाफ सबसे अहम है और नबी ने भी कहा था कि इंसान चाहकर भी एक से ज्यादा पत्नियों के बीच बराबरी का न्याय नहीं कर सकता।

इसलिए एक विवाह ही बेहतर माना गया है। वह बताती हैं कि रोज उनके पास ऐसी कई महिलाएं आती हैं जो पति की दूसरी शादी की वजह से मानसिक और सामाजिक पीड़ा झेल रही हैं।  हालांकि वह यह भी मानती हैं कि महिलाओं के लिए बने कानूनों का पूरी तरह प्रभावी तरीके से लागू होना अभी बाकी है।

उनके मुताबिक कई मामलों में पति गुस्से में पत्नी को तीन तलाक दे देता है, लेकिन बाद में कानून के डर से अदालत में जाकर इससे इनकार कर देता है। इसके बावजूद निशात हुसैन का मानना है कि इस कानून ने महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने और कानूनी सहारा लेने की ताकत जरूर दी है।

निशात हुसैन बताती हैं कि उनके ऑफिस में पिछले 32सालों से रोजाना तीन से चार काउंसलिंग के मामले पहुंचते हैं। इनमें घरेलू विवाद, तलाक, दूसरी शादी, पारिवारिक हिंसा और पति-पत्नी के बीच आपसी तनाव जैसे मामले शामिल होते हैं।

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उनका दावा है कि काउंसलिंग और बातचीत के जरिए अधिकांश मामलों में परिवारों को फिर से साथ रहने के लिए तैयार कर लिया जाता है। वह कहती हैं कि उन्होंने 32साल में हजारों घर टूटने से बचाए हैं। कई बार लोग तलाक के कागज तक तैयार करके आते हैं, लेकिन यहां बातचीत के बाद समझौता हो जाता है। उनके पास विदेशों से भी लोग काउंसलिंग के लिए पहुंचे। उन्होंने कई महिलाओं को घर, कानूनी मदद और सामाजिक सहारा दिलाने में मदद की।

आज वह राजस्थान सरकार के महिला सुरक्षा केंद्र में प्रभारी के रूप में भी काम कर रही हैं। उनका केंद्र जयपुर के महिला थाना उत्तर में संचालित होता है। वहां भी रोज बड़ी संख्या में महिलाएं अपने विवाद लेकर पहुंचती हैं।

निशात का कहना है कि पहले माना जाता था कि घरेलू हिंसा और महिलाओं पर अत्याचार अशिक्षित समाज में ज्यादा होते हैं, लेकिन अब डॉक्टर, इंजीनियर और राजनीतिक परिवारों तक से मामले आने लगे हैं। उनके मुताबिक महिलाओं पर हिंसा की मानसिकता हर वर्ग में मौजूद है।

बाल विवाह के खिलाफ भी उन्होंने कई अभियान चलाए। प्रशासन की मदद से कई नाबालिग लड़कियों की शादियां रुकवाईं। वह साफ कहती हैं कि इस्लाम में लड़की की सहमति जरूरी है और नाबालिग का निकाह गलत है।

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उन्होंने खाप पंचायतों और सामाजिक पंचायतों की भी आलोचना की। उनके अनुसार कई पंचायतें महिलाओं के हित में न्याय करने के बजाय केवल जुर्माना और समझौते तक सीमित रह जाती हैं। उन्होंने पंचायतों से कहा कि यदि किसी पुरुष पर जुर्माना लगाया जाए तो वह रकम पीड़ित महिला को मिलनी चाहिए।

 निशात हुसैन राजस्थान की पहली महिला काज़ियों में भी शामिल हैं। इसके लिए उन्होंने मुंबई में इस्लामी न्यायशास्त्र और भारतीय संविधान का पांच वर्षीय कोर्स किया। महिलाओं को काज़ी बनाए जाने के विचार का उस समय काफी विरोध हुआ, लेकिन निशात पीछे नहीं हटीं।

बाद में कई इस्लामी विद्वानों ने भी उनके काम का समर्थन किया।उन्होंने तीन तलाक के खिलाफ देशव्यापी अभियान में भी सक्रिय भूमिका निभाई। राजस्थान में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़कर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं और महिला जागरूकता अभियानों में हिस्सा लिया। निशात का दावा है कि ट्रिपल तलाक के मामलों में अब पहले की तुलना में काफी कमी आई है।

उनके सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा 1अगस्त 2025को दिल्ली के विज्ञान भवन में सम्मानित किया गया। इसके अलावा डॉ. अंबेडकर उत्थान परिषद, जिला प्रशासन, पुलिस विभाग और शांति समितियों द्वारा भी उन्हें कई बार सम्मानित किया जा चुका है। सांप्रदायिक सौहार्द और महिला अधिकारों पर काम करने के कारण उन्हें कई सामाजिक मंचों पर भी बुलाया जाता रहा है।

उनका परिवार भी सामाजिक कार्यों से जुड़ा हुआ है। उनकी बेटी अंदलीब फातिमा दुबई में इंडियन वूमेन एसोसिएशन से जुड़ी हैं और कई रेस्टोरेंट्स के मैनेजमेंट का काम भी संभालती हैं। उनके नवासे अब्दुल मुकीत, जो दुबई में रहते हैं, पेपर बैग बॉय के नाम से जाने जाते हैं।

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छोटी उम्र में उन्होंने प्लास्टिक बैग के खिलाफ अभियान चलाया और लोगों को पेपर बैग इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया। पर्यावरण संरक्षण के लिए उन्हें अबू धाबी अवॉर्ड मिल चुका है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात का अवसर भी मिला।

उम्र बढ़ने के बावजूद निशात हुसैन आज भी जयपुर के जौहरी बाजार के उसी छोटे से कार्यालय से महिलाओं की मदद और सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ रही हैं। उनका मानना है कि असली बदलाव किसी बड़े पद या सत्ता से नहीं, बल्कि इंसाफ और इंसानियत के लिए लगातार खड़े रहने से आता है।