हिमा खातून: मेहनत से बनीं भारतीय जूनियर टीम कोच

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 04-05-2026
From Flipkart Delivery Girl to the Indian Team: Coach Mahima Khatun's Untold Story
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शांति रॉय चौधरी

समाज में सफलता की कहानियाँ तो बहुत हैं। लेकिन कुछ कहानियाँ रूह को झकझोर देती हैं। ये कहानियाँ हमें सिखाती हैं कि अगर इरादे फौलादी हों, तो गरीबी और हालात कभी रास्ता नहीं रोक सकते। पश्चिम बंगाल के हावड़ा की रहने वाली महिमा खातून एक ऐसी ही शख्सियत हैं। वे आज न सिर्फ बंगाल की पहली महिला गोलकीपर कोच हैं, बल्कि भारतीय जूनियर महिला टीम के साथ जुड़कर देश का मान बढ़ा रही हैं। एक वक्त था जब महिमा भारी-भरकम अलमारियां और फ्रिज लोगों के घरों तक पहुँचाती थीं। आज वे भारतीय फुटबॉल के भविष्य को संवार रही हैं।

हावड़ा की तंग गलियों से ईस्ट बंगाल तक

महिमा खातून का जन्म हावड़ा के दानेश शेख लेन के एक बेहद साधारण परिवार में हुआ। घर की माली हालत ठीक नहीं थी। लेकिन महिमा की आँखों में एक बड़ा सपना पलता था। वे फुटबॉल के मैदान पर अपनी पहचान बनाना चाहती थीं। अभावों के बीच उन्होंने फुटबॉल को अपना साथी बनाया। मैदान पर उनकी फुर्ती और गोल पोस्ट को बचाने का जज्बा देख हर कोई हैरान रह जाता था।

कड़ी मेहनत और लगन के दम पर महिमा ने जल्द ही बंगाल के प्रथम श्रेणी क्लबों में जगह बना ली। उन्होंने तलताला दीप्ति, बेहाला ओइक्या, सेबयानी और बालिग्राम जोन जैसे क्लबों के लिए शानदार खेल दिखाया। लेकिन उनके करियर का सबसे सुनहरा पल तब आया जब उन्हें कोलकाता के ऐतिहासिक ईस्ट बंगाल क्लब की जर्सी पहनने का मौका मिला। साल 2019से 2020तक उन्होंने ईस्ट बंगाल की महिला टीम के मुख्य गोलकीपर के रूप में अपनी धाक जमाई।

महिमा खातून

जब मैदान छूटा, तो पीठ पर लादा बोझ

महिमा के करियर की सबसे प्रेरणादायक और भावुक कहानी साल 2020के लॉकडाउन से जुड़ी है। कोरोना महामारी की वजह से पूरी दुनिया थम गई थी। मैदानों पर ताले लग गए थे और खेल गतिविधियाँ पूरी तरह बंद थीं। एक तरफ खेल का मैदान छूट गया था और दूसरी तरफ परिवार की आर्थिक ज़रूरतें मुंह बाए खड़ी थीं। एक पेशेवर फुटबॉलर होने के बावजूद महिमा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने परिवार का पेट पालने के लिए फ्लिपकार्ट कंपनी में 'डिवरी गर्ल' का काम शुरू किया।

सोचिए, जिस खिलाड़ी के हाथों में ग्लव्स होने चाहिए थे, वह भारी-भरकम फ्रिज, वाशिंग मशीन और अलमारियां ढो रही थी। महिमा दिन-रात मेहनत करती थीं। वे भारी इलेक्ट्रॉनिक सामान लेकर ग्राहकों के घरों तक पहुँचती थीं। खेल जगत में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण मिले जहाँ एक नेशनल लेवल की खिलाड़ी ने घर चलाने के लिए इतनी कठोर मेहनत की हो। महिमा के लिए कोई काम छोटा नहीं था। उनका लक्ष्य बस इतना था कि उनका परिवार भूखा न सोए।

कोचिंग की दुनिया में रचा इतिहास

जैसे ही हालात सामान्य हुए, महिमा ने दोबारा अपने सपनों की ओर रुख किया। वे हमेशा से जानती थीं कि वे मैदान से दूर नहीं रह सकतीं। उन्होंने तय किया कि अब वे नई पीढ़ी के गोलकीपर तैयार करेंगी। साल 2021में उन्होंने मिनर्वा पंजाब फुटबॉल अकादमी से कोचिंग का डी-लाइसेंस प्राप्त किया। इसके साथ ही उनके कोच बनने का सफर शुरू हुआ।

महिमा ने 2021से 2023तक बड़ौदा फुटबॉल अकादमी में अपनी सेवाएं दीं। इसके बाद उन्होंने मुर्शिदाबाद के जियागंज में स्थित अदिति खेल संस्थान में लड़के और लड़कियों को फुटबॉल के गुर सिखाए। उनकी काबिलियत को देखते हुए उन्हें बंगाल की जूनियर गर्ल्स टीम और भवानीपुर के अंडर-13व अंडर-17लड़कों की टीम का कोच बनाया गया। इन्ही उपलब्धियों ने उन्हें पश्चिम बंगाल की पहली महिला गोलकीपर कोच होने का गौरव दिलाया।

       भारतीय टीम के साथ नया सफर

महिमा की मेहनत का फल उन्हें साल 2026में मिला। अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्हें फीफा टैलेंट अंडर-15टीम में गोलकीपरों को प्रशिक्षित करने की बड़ी जिम्मेदारी दी गई। यह उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। वर्तमान में वे हैदराबाद में आयोजित एआईएफएफ के नेशनल कोचिंग कैंप में भारतीय टीम के साथ काम कर रही हैं। जिस लड़की ने कभी गरीबी की मार झेली थी, आज वह देश के सबसे बेहतरीन टैलेंट को तराश रही है।

निजी जीवन और सुनहरे भविष्य की उम्मीद

महिमा खातून ने अब अपनी गृहस्थी भी बसा ली है। उनकी शादी फारूक शेख से हुई है। फारूक खुद भी एक बेहतरीन फुटबॉलर हैं और कोलकाता प्रीमियर डिवीजन में खेलते हैं। एक ही पेशे से होने के कारण फारूक अपनी पत्नी के सपनों को बखूबी समझते हैं और उनका पूरा साथ देते हैं।

महिमा का सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। उनकी आँखों में अब एक नया और बड़ा सपना है। वे चाहती हैं कि भविष्य में वे भारतीय सीनियर महिला फुटबॉल टीम की मुख्य गोलकीपर कोच बनें। वे चाहती हैं कि भारत की बेटियां अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का झंडा बुलंद करें।

महिमा खातून की कहानी हमें सिखाती है कि सफलता रातों-रात नहीं मिलती। इसके पीछे पसीने की बूंदें और कभी न टूटने वाला हौसला होता है। हावड़ा की सड़कों पर सामान पहुँचाने वाली वो लड़की आज भारतीय टीम की जर्सी में देश की सेवा कर रही है। महिमा खातून बंगाल की ही नहीं,बल्कि पूरे भारत की बेटियों के लिए एक मिसाल हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर आप मैदान पर डटे रहें, तो जीत आपकी ही होगी।