रैप के जरिए पसमांदा समाज का दर्द बयां करते सिड नियाज़

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 08-01-2026
Sid Niaz expresses the pain of the Pasmanda community through rap.
Sid Niaz expresses the pain of the Pasmanda community through rap.

 

मलिक असर हाशमी | नई दिल्ली

रैप संगीत को अक्सर सिर्फ तुकबंदी या हल्के-फुल्के मनोरंजन के तौर पर देखा जाता है, लेकिन बनारस के बुनकर परिवार से निकले युवा कलाकार सिड नियाज़ इस धारणा को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उनके लिए रैप महज़ संगीत नहीं, बल्कि अपने समाज की पीड़ा, संघर्ष और सच्चाई को बयान करने का माध्यम है। सिड नियाज़ अपने गीतों के जरिए न केवल बुनकर और पसमांदा समुदाय की हालत को सामने लाते हैं, बल्कि यह भी सवाल उठाते हैं कि जब इस समाज का कोई बच्चा समय के साथ आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे अक्सर धर्म, परंपरा और ‘ईमान’ के नाम पर क्यों रोका जाता है।
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बनारस के अंसारी बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले सिड नियाज़ ने महज़ छह महीने पहले रैप की दुनिया में कदम रखा है। इस छोटे से समय में उन्होंने यूट्यूब पर करीब 15 गाने रिलीज़ किए हैं। भले ही उनकी लोकप्रियता अभी सीमित दायरे में हो, लेकिन उनके हर गीत में बुनकर समाज और पसमांदा परिवारों के संघर्ष की गूंज साफ सुनाई देती है।

शुरुआत में लोगों ने उनके गीतों की गंभीरता को नजरअंदाज किया, क्योंकि आमतौर पर रैप को हल्की या गैर-गंभीर विधा माना जाता है। लेकिन जैसे-जैसे उनके एक के बाद एक गीत सामने आए, वैसे-वैसे श्रोताओं को समझ में आने लगा कि सिड नियाज़ रैप के जरिए कुछ बड़ा और गहरा कहने की कोशिश कर रहे हैं।

दरअसल, रैप केवल गाने का रूप नहीं है, बल्कि यह बोली जाने वाली कविता है, जिसमें कलाकार लय और बीट के साथ अपने विचारों को प्रभावशाली ढंग से रखता है। सिड नियाज़ इसी शैली का इस्तेमाल कर अपने समाज की सच्चाइयों को सामने ला रहे हैं। उनके फेसबुक प्रोफाइल के अनुसार, वे बुनकर परिवार से आते हैं और खुद को संगीतकार, गायक और अभिनेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। खास बात यह है कि वे अपने गीतों के एल्बम में खुद अभिनय भी करते हैं, जबकि कैमरा और एडिटिंग की जिम्मेदारी इमरान सिद्दीकी निभाते हैं।

तीन दिन पहले रिलीज़ हुआ उनका ताज़ा रैप सांग ‘दुआएं देता रहा’ भले ही सतह पर एक रोमांटिक गीत लगता हो, लेकिन इसके भीतर एक बुनकर परिवार से आने वाले युवा का संघर्ष छुपा है। इससे पहले उनका चर्चित गीत ‘भुमर जोत देने’ बनारस, मुगलसराय, सूरत और बेंगलुरु के बुनकर समुदाय को समर्पित है।

इस गाने में सिड नियाज़ और राइडर अबरार अंसारी ने झुलाहा संस्कृति को मजेदार, देसी और बनारसी अंदाज में पेश किया है। बनारसी स्लैंग, हिप-हॉप और कॉमेडी के मेल ने इस गीत को खास बना दिया है, लेकिन इसके पीछे बुनकरों की मेहनत और उनकी जिंदगी की झलक भी मौजूद है।

सिड नियाज़ का एक और अहम गीत ‘अंसारी खानदान’ है, जिसमें उन्होंने अपने परिवार की निजी कहानी को सामने रखा है। इस गीत में वे बताते हैं कि कैसे उनके माता-पिता को कभी घर से निकाल दिया गया था और हालात इतने खराब हो गए थे कि प्लास्टिक बिछाकर रात गुजारनी पड़ती थी।

उनकी मां घरों में काम करती थीं और पिता लूम पर मेहनत करते थे। समय के साथ हालात कुछ सुधरे, लेकिन संघर्ष खत्म नहीं हुआ। परिवार की इच्छा पर उनके एक भाई को हाफ़िज़-ए-कुरान बनाया गया, लेकिन उसकी असमय मृत्यु ने पूरे परिवार को तोड़ कर रख दिया।

‘अंसारी

खानदान’ रैप सांग में सिड नियाज़ ने अपने परिवार और समाज के भीतर चलने वाले सुन्नी-वहाबी मतभेद, और इस्लाम के नाम पर उन्हें रैप गाने से रोके जाने वाली दलीलों का भी जिक्र किया है। वे यह सवाल उठाते हैं कि मेहनत करके रोटी कमाने वाले बुनकरों को क्यों बार-बार शक की नजर से देखा जाता है। गीत में लूम के विलुप्त होते कारोबार का दर्द भी झलकता है, जो आज लाखों बुनकर परिवारों की सच्चाई है।

चार सप्ताह पहले रिलीज़ हुआ उनका गीत ‘तेरी सोच पर खरोंच’ समाज में मौजूद मानसिक टकराव और सोच की संकीर्णता पर सीधा प्रहार करता है। वहीं, ‘मां’ पर आधारित उनका एक अलग रैप सांग है, जिसमें उन्होंने अपनी मां के संघर्ष, त्याग और मजबूती को बेहद भावनात्मक ढंग से पेश किया है। ‘अंसारी खानदान’ गीत के वीडियो में पावर लूम और उसके कारीगरों को दिखाया गया है, जो इस संगीत को जमीन से जोड़ देता है।

फिलहाल सिड

नियाज़ के गीत बड़े पैमाने पर लोकप्रिय नहीं हैं। फेसबुक पर उनके करीब साढ़े नौ हजार फॉलोअर्स हैं और यूट्यूब पर उनके गानों को तीन से साढ़े तीन हजार के आसपास ही व्यूज़ मिल रहे हैं। लेकिन जिस तरह से पसमांदा समाज और बुनकर समुदाय के बीच उनके गीतों को सराहा जा रहा है, उससे यह साफ है कि वे एक सशक्त आवाज बनकर उभर रहे हैं।
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सिड नियाज़ का रैप यह साबित करता है कि कला का माध्यम चाहे कोई भी हो, अगर उसमें सच्चाई और जमीन से जुड़ा दर्द हो, तो वह देर-सबेर लोगों तक जरूर पहुंचता है। उनकी कोशिश सिर्फ लोकप्रिय होने की नहीं, बल्कि अपने समाज की कहानी खुद अपने शब्दों में कहने की है। यही वजह है कि भले ही उनकी आवाज अभी सीमित दायरे में सुनी जा रही हो, लेकिन आने वाले समय में यह आवाज और तेज़ होने की पूरी संभावना रखती है।