गुलाम रसूल देहलवी
हर साल बसंत के मौसम में लखनऊ से करीब 25 किलोमीटर दूर बाराबंकी जिले का छोटा सा कस्बा देवा रंगों और खुशियों से भर उठता है। यहां 19वीं सदी के महान सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की दरगाह पर मनाई जाने वाली होली एक खास आध्यात्मिक महत्व रखती है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं है बल्कि प्रेम, भाईचारे और धार्मिक सद्भाव का प्रतीक है।

यहां होली को ईद-ए-गुलाबी कहा जाता है। इस मौके पर हजारों हिंदू और मुसलमान एक साथ इकट्ठा होकर रंगों और फूलों के बीच प्रेम और आस्था का उत्सव मनाते हैं। यह परंपरा भारत की उस सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है जिसमें अलग-अलग धर्मों के लोग मिलकर खुशियां बांटते हैं।
देवा शरीफ में मनाई जाने वाली होली को सूफी परंपरा की एक खूबसूरत मिसाल माना जाता है। यहां रंगों का खेल केवल आनंद के लिए नहीं होता बल्कि इसके पीछे गहरी आध्यात्मिक भावना छिपी होती है। कुरआन में भी अल्लाह के रंग का जिक्र मिलता है। कुरआन कहता है कि अल्लाह का रंग अपनाओ और उससे बेहतर रंग किसी का नहीं हो सकता।
इस आयत का मतलब यह है कि इंसान को अपने दिल और जीवन को ईश्वर की राह में रंगना चाहिए। देवा शरीफ की होली इसी विचार को दर्शाती है जिसे सिबगतुल्लाह यानी अल्लाह का रंग कहा जाता है।

जैसे रंग कपड़े में पूरी तरह समा जाता है, उसी तरह ईश्वर का प्रेम इंसान के दिल और उसके व्यवहार में उतर जाना चाहिए। जब लोग यहां गुलाल और अबीर उड़ाते हैं तो वह केवल रंगों से नहीं खेलते बल्कि आध्यात्मिक आनंद और प्रेम का अनुभव करते हैं।
देवा शरीफ भारत की उन चुनिंदा सूफी दरगाहों में से एक है जहां होली खेली जाती है। यह स्थान लंबे समय से हिंदू मुस्लिम एकता और आपसी भाईचारे के लिए जाना जाता है। यहां के सज्जादानशीन पीले रंग के वस्त्र पहनते हैं जिन्हें पीतांबर कहा जाता है।دیوا شریف میں ہولی۔ جب رنگ مذاہب سے بالاتر ہو کر دلوں کو جوڑ دیتے ہیں#holi #devasharif pic.twitter.com/6rM5pi5Swc
— Awaz-The Voice URDU اردو (@AwazTheVoiceUrd) March 5, 2026
श्रद्धालु एक दूसरे पर गुलाल, अबीर और गुलाब की पंखुड़ियां डालते हैं। पूरा माहौल रंगों, खुशबू और भक्ति से भर जाता है। लोग नाचते गाते हैं, कव्वालियां गूंजती हैं और हर तरफ प्रेम और आनंद का वातावरण दिखाई देता है। माना जाता है कि देवा शरीफ की यह परंपरा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है। यह सूफी संतों की उस परंपरा को जीवित रखती है जिसमें धर्म से ज्यादा महत्व इंसानियत और प्रेम को दिया जाता है।

इस अवसर पर एक विशेष जुलूस भी निकाला जाता है जिसे होली जुलूस कहा जाता है। यह जुलूस कौमी एकता द्वार से शुरू होता है। जुलूस में शामिल लोग ढोल नगाड़ों, भजनों और कव्वालियों के बीच आगे बढ़ते हैं। रास्ते भर लोग एक दूसरे पर फूल और रंग डालते हैं।
यह जुलूस धीरे-धीरे पूरे कस्बे से गुजरते हुए हाजी वारिस अली शाह की दरगाह तक पहुंचता है। दोपहर के समय जब यह जुलूस दरगाह के परिसर में पहुंचता है तो वहां का दृश्य बेहद मनमोहक हो जाता है। गुलाब की पंखुड़ियां, गुलाल और अबीर हवा में उड़ते दिखाई देते हैं और हर तरफ खुशी का माहौल बन जाता है। इस दृश्य को देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।
देवा शरीफ की इस परंपरा के पीछे हाजी वारिस अली शाह की शिक्षाएं और विचारधारा है। हाजी वारिस अली शाह एक महान सूफी संत थे और वारसी सिलसिले के संस्थापक माने जाते हैं। कहा जाता है कि वह इमाम हुसैन की 26वीं पीढ़ी से जुड़े थे।
उनका जीवन आध्यात्मिकता, प्रेम और मानवता की सेवा के लिए समर्पित था। उन्होंने भारत के अलावा कई देशों की यात्राएं कीं और कई बार हज किया। वह यूरोप भी गए और वहां कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों से मिले। बताया जाता है कि उन्होंने तुर्की के सुल्तान, जर्मनी के बिस्मार्क और ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया से भी मुलाकात की थी। लेकिन उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह था कि प्रेम और भक्ति किसी एक धर्म की सीमाओं में नहीं बंधते।
हाजी वारिस अली शाह ने अपने जीवन में हर धर्म और समुदाय के लोगों को अपनाया। उनके शिष्यों में हिंदू राजा, जमींदार, विद्वान और साधु भी शामिल थे। मुस्लिम अधिकारी और विद्वान भी उनके अनुयायी थे। वह सभी को समान दृष्टि से देखते थे और कहते थे कि सच्चा धर्म प्रेम और इंसानियत है।
यही कारण है कि उनके अनुयायी आज भी होली जैसे त्योहार को प्रेम और एकता के रूप में मनाते हैं। उन्होंने महिलाओं को भी आध्यात्मिक जीवन में भाग लेने की अनुमति दी थी। उस समय यह बहुत प्रगतिशील विचार माना जाता था। यह दिखाता है कि सूफी संत समाज में समानता और सम्मान का संदेश देते थे।
आज के समय में जब दुनिया के कई हिस्सों में धर्म के नाम पर संघर्ष और नफरत देखने को मिलती है, देवा शरीफ की होली एक अलग ही संदेश देती है। यह हमें याद दिलाती है कि भारत की संस्कृति विविधता में एकता की मिसाल है। यहां अलग-अलग धर्मों और परंपराओं के लोग मिलकर त्योहार मनाते हैं। भारत की यही परंपरा उसे खास बनाती है। यहां लोग रंगों से होली खेलते हैं, खून से नहीं। यह संदेश दुनिया के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है।
सूफी संतों की शिक्षाएं हमेशा प्रेम, शांति और भाईचारे पर आधारित रही हैं। उन्होंने हमेशा लोगों को नफरत से दूर रहने और एक दूसरे का सम्मान करने की सलाह दी। देवा शरीफ की ईद-ए-गुलाबी भी उसी परंपरा का हिस्सा है। यहां रंग केवल खेल नहीं बल्कि दिलों को जोड़ने का माध्यम बन जाते हैं। जब लोग एक दूसरे पर रंग डालते हैं तो उनके बीच की दूरियां भी मिट जाती हैं।

इंसानियत तभी जीवित रह सकती है जब लोगों के जीवन में खुशी, प्रेम और उत्सव बने रहें। भारत के त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का माध्यम भी होते हैं। देवा शरीफ की होली इसी भावना का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि प्रेम और सम्मान किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
कुरआन में भी इंसानों के बीच भाईचारे और आपसी पहचान की बात कही गई है। कुरआन कहता है कि ईमान वाले आपस में भाई हैं। एक दूसरी आयत में कहा गया है कि हमने तुम्हें अलग-अलग जातियों और कबीलों में इसलिए बनाया ताकि तुम एक दूसरे को पहचानो और समझो। देवा शरीफ में मनाई जाने वाली होली इन शिक्षाओं को जीवंत रूप में दिखाती है। यहां लोग अपने धर्म और पहचान के साथ आते हैं लेकिन उत्सव के समय सब एक हो जाते हैं।

जब गुलाल और गुलाब की पंखुड़ियां हवा में उड़ती हैं तो ऐसा लगता है जैसे प्रेम का संदेश चारों ओर फैल रहा हो। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि ईश्वर का प्रेम इंसान के दिल को रंग देता है। यही रंग इंसानियत को सुंदर बनाता है। देवा शरीफ की होली हमें यह सिखाती है कि खुशी और प्रेम साझा करने से बढ़ते हैं। यही सूफी परंपरा का सबसे बड़ा संदेश है।
इस तरह देवा शरीफ की ईद-ए-गुलाबी केवल एक त्योहार नहीं बल्कि आत्मा का उत्सव है। यहां इंसानी दिल रंगों की तरह मिलकर प्रेम और भक्ति की एक सुंदर तस्वीर बनाते हैं। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, प्रेम और इंसानियत का रंग हमेशा सबसे गहरा और स्थायी रहेगा।





