वुड कार्विंग में राष्ट्रीय पहचान बना चुके जहीर अब गुरु बनने की राह पर

Story by  दयाराम वशिष्ठ | Published by  [email protected] | Date 13-02-2026
Zaheer, who has earned national recognition in wood carving, is now on his way to becoming a guru.
Zaheer, who has earned national recognition in wood carving, is now on his way to becoming a guru.

 

दयाराम वशिष्ठ

सपने उम्र नहीं देखते, हालात नहीं देखते और न ही संसाधनों की कमी से घबराते हैं। वे बस एक जिद मांगते हैं-हार न मानने की। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के रहने वाले शिल्पकार जहीर की कहानी इसी जिद, मेहनत और धैर्य का जीवंत उदाहरण है। जिस बच्चे ने सात साल की उम्र में पिता को पेड़ काटते देखा, वही बच्चा आज 63वर्ष की आयु में लकड़ी पर ऐसी बारीक नक्काशी करता है कि उसकी कारीगरी राष्ट्रीय स्तर पर सराही जा चुकी है। नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित हो चुके जहीर अब अपने जीवन के सबसे बड़े लक्ष्य, शिल्पगुरु अवॉर्डकी ओर पूरे आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ा रहे हैं।

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जहीर की कहानी को समझने से पहले यह जानना जरूरी है कि शिल्पगुरु अवॉर्ड आखिर है क्या?शिल्पगुरु अवॉर्ड भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला हस्तशिल्प क्षेत्र का सर्वोच्च सम्मान है, जिसे कपड़ा मंत्रालय के अंतर्गत डेवलपमेंट कमिश्नर (हैंडीक्राफ्ट्स) द्वारा वर्ष 2002में शुरू किया गया।

यह अवॉर्ड उन मास्टर क्राफ्ट्सपर्सन को दिया जाता है, जिन्होंने न केवल अपने हुनर को वर्षों तक साधा हो, बल्कि पारंपरिक भारतीय शिल्प को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में भी अहम भूमिका निभाई हो। इस सम्मान के तहत शिल्पकार को नकद पुरस्कार, सोने का सिक्का, शॉल, ताम्रपत्र और प्रमाण पत्र दिया जाता हैI साथ ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने हुनर को प्रदर्शित करने का अवसर भी मिलता है।

जहीर का मानना है कि सफलता किसी चमत्कार का नतीजा नहीं होती। यह निरंतर परिश्रम, आत्मविश्वास और धैर्य से गढ़ी जाती है। वे कहते हैं, “अपनी किस्मत बदलने के लिए इंसान को खुद ही संघर्ष करना पड़ता है। मेहनत ही वह चाबी है, जो भाग्य का दरवाज़ा खोलती है।”

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सहारनपुर के एक साधारण परिवार में जन्मे जहीर की जिंदगी आसान नहीं थी। महज सात साल की उम्र में उन्होंने वुड कार्विंग का काम सीखना शुरू कर दिया था। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। पिता पेड़ काटने का काम करते थे और परिवार में छह बहनें और छह भाई थे। इतने बड़े परिवार का खर्च उठाना आसान नहीं था। ऐसे हालात में जहीर ने पढ़ाई छोड़कर अपने पिता का हाथ बंटाने के लिए लकड़ी की नक्काशी सीखनी शुरू कर दी।

वे दिन जहीर आज भी नहीं भूले हैं। शुरुआती दौर में उन्हें महीने भर की मजदूरी के तौर पर सिर्फ 20रुपये मिलते थे। यह रकम आज सुनने में भले ही मामूली लगे, लेकिन उस समय भी इससे घर चलाना बेहद मुश्किल था। समय के साथ मजदूरी थोड़ी बढ़ी, लेकिन हालात नहीं सुधरे। पिता की मृत्यु के बाद जिम्मेदारियों का बोझ और बढ़ गया। करीब 20साल तक जहीर ने मजदूरी करते हुए जीवन गुजारा। जब भी वे अपना खुद का काम शुरू करने की बात करते, लोग उन्हें हतोत्साहित करते हुए कहते कि “अपने काम में कुछ नहीं रखा, मजदूरी ही बेहतर है।”

लेकिन जहीर के भीतर कुछ अलग ही चल रहा था। वे चुपचाप अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे। वुड कार्विंग में लगातार निखार लाते हुए आखिरकार वर्ष 1990में उन्होंने यह ठान लिया कि अब वे अपना खुद का काम करेंगे। उन्होंने 100 रुपये महीने के किराए पर एक छोटी सी दुकान ली और सहारनपुर से 1000 रुपये की लकड़ी खरीदकर छोटे-छोटे बॉक्स बनाने शुरू किए।

यहीं से उनकी जिंदगी ने करवट ली। सहारनपुर के एक एक्सपोर्टर मिगलानी के जरिए उनके हाथ से बना सामान विदेशों तक पहुंचने लगा। पहला बड़ा ऑर्डर मिलते ही जहीर और उनके परिवार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। इस काम से वे सप्ताह में लगभग 1500 रुपये कमाने लगे, जो उस समय एक बड़ी रकम थी। धीरे-धीरे बाजार में उनकी पहचान बनने लगी और उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

बाजार में पहचान बनने के बाद जहीर के संपर्क कई एक्सपोर्टर्स से हो गए। इसी दौरान उन्हें यह जानकारी मिली कि सरकार शिल्पकारों को प्रोत्साहित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार देती है। यह जानकर उन्होंने और भी अधिक मेहनत शुरू कर दी। उन्होंने एक 30इंच की गोल टेबल तैयार की, जिस पर बारीक और उत्कृष्ट नक्काशी की गई थी। इस कलाकृति को उन्होंने लखनऊ में नेशनल अवॉर्ड के लिए प्रस्तुत किया।

उनकी वर्षों की मेहनत रंग लाई और वर्ष 2007 में जहीर को वुडन आर्ट के लिए नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। यह पल उनके जीवन का सबसे गौरवपूर्ण क्षण था। इस सम्मान ने न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ाया, बल्कि उन्हें और ऊंचे लक्ष्य देखने की प्रेरणा भी दी।

आज जहीर का अगला सपना शिल्पगुरु अवॉर्ड हासिल करना है। इसके लिए उन्होंने चार फुट की एक भव्य डाइनिंग टेबल तैयार की है, जिसे बनाने में पूरे 13महीने का समय लगा। इस टेबल पर की गई नक्काशी उनकी अब तक की सबसे बेहतरीन कृतियों में से एक है। जहीर को पूरा विश्वास है कि उनकी यह मेहनत उन्हें शिल्पगुरु अवॉर्ड तक जरूर पहुंचाएगी।

सिर्फ खुद तक सीमित न रहते हुए जहीर अब अपने हुनर को आगे बढ़ाने में भी जुटे हैं। वे युवाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें कुशल शिल्पकार बनाने का काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि यदि कारीगरी बेहतरीन हो तो इस क्षेत्र में अच्छी कमाई की जा सकती है। ग्राहक आज अपनी पसंद के डिजाइन के लिए अच्छा भुगतान करने को तैयार हैं। लकड़ी पर जितनी बारीक और आकर्षक नक्काशी होगी, उतनी ही उसकी कीमत बढ़ जाती है।

जहीर का 12 वर्षीय बेटा उमर फारूख भी इन दिनों इस पारंपरिक हस्तकला को सीख रहा है। पिता की तरह वह भी पसीना बहाकर हुनर को साधने में जुटा है, ताकि यह विरासत आगे बढ़ती रहे। बाजार के बदलते रुझानों पर बात करते हुए जहीर बताते हैं कि पहले ग्राहक शीशम की लकड़ी से बने भारी भरकम आइटम ज्यादा पसंद करते थे।

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लेकिन अब समय बदल गया है। खासकर विदेशी ग्राहक हल्के वजन वाले उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं। इसी कारण अब बाजार में 25प्रतिशत शीशम, 25प्रतिशत सागवान और 50प्रतिशत आम की लकड़ी से बने आइटम ज्यादा पसंद किए जा रहे हैं।

जहीर की कहानी सिर्फ एक शिल्पकार की सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस जज्बे की मिसाल है जो अभावों में भी हार नहीं मानता। यह कहानी बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों, तो लकड़ी के एक टुकड़े से भी किस्मत तराशी जा सकती है।