हुनर की ताकत: राणा अहमद ने बदली कारोबार की तस्वीर

Story by  दयाराम वशिष्ठ | Published by  [email protected] | Date 14-02-2026
The Power of Skill: Rana Ahmed Changes the Face of Business
The Power of Skill: Rana Ahmed Changes the Face of Business

 

दयाराम वशिष्ठ

लखनऊ की तहज़ीब, नफ़ासत और चिकनकारी की महीन कढ़ाई की बात हो और राणा अहमद का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। 55 वर्षीया राणा अहमद की कहानी केवल एक महिला शिल्पकार की सफलता की गाथा नहीं, बल्कि हुनर, हिम्मत और विरासत को पहचान दिलाने का जीवंत उदाहरण है। यह कहानी बताती है कि कला सचमुच इंसान का सबसे कीमती गहना होती है—जो न केवल सम्मान दिलाती है, बल्कि पहचान, प्रतिष्ठा और समृद्धि भी देती है।

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राणा अहमद का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ चिकनकारी केवल काम नहीं, बल्कि परंपरा और आत्मा का हिस्सा थी। उनकी माँ, खैरून निशा, लखनऊ की जानी-मानी चिकनकारी शिल्पकार थीं। कुर्तियाँ, दुपट्टे, सूट-सलवार,हर परिधान पर उनकी उंगलियाँ जैसे जादू बुन देती थीं।

बचपन से ही राणा अपनी माँ के पास बैठकर सुई-धागे का खेल देखतीं, टाँकों की बारीकियाँ समझतीं और धीरे-धीरे वही कला अपने हाथों में उतारती चली गईं। यह सीख केवल तकनीक की नहीं थी, धैर्य, सौंदर्य-बोध और गुणवत्ता के प्रति समर्पण की भी थी।

fविवाह के बाद जब राणा अहमद लखनऊ के ही प्रतिष्ठित व्यवसायी परवेज अहमद के घर आईं, तब उनके ससुराल का पुश्तैनी कारोबार बर्तनों का था। व्यापार अच्छा-खासा था, पर राणा के भीतर का कलाकार कुछ नया करने को आतुर था।

उन्होंने अपने हुनर को सीमित दायरे में न रखकर उसे एक पहचान देने का निर्णय लिया। निकाह के दो वर्ष बाद ही उन्होंने ससुराल में चिकनकारी का काम शुरू किया।

शुरुआत आसान नहीं थी। पहले उन्होंने अपनी माँ से ही ऑर्डर लेकर काम संभाला, ताकि गुणवत्ता और भरोसा दोनों कायम रहें। धीरे-धीरे उनके डिज़ाइनों की चर्चा फैलने लगी। उनकी कढ़ाई में पारंपरिक नज़ाकत के साथ आधुनिकता की झलक भी थी, जो ग्राहकों को बेहद पसंद आई।

राणा अहमद की मेहनत रंग लाई। उनका काम स्थानीय बाजार से निकलकर शहर और फिर देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँचने लगा। बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पूरे मनोयोग से अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाया।

उनके काम की सबसे बड़ी विशेषता थी,पूरी तरह हाथ से की गई महीन कढ़ाई। हर टाँका जैसे कहानी कहता था। सुई-धागे से तैयार किए गए उनके जेंट्स कुर्ते ने तो जैसे इतिहास ही रच दिया।

वर्ष 1997 में नई दिल्ली के आर.के. पुरम में आयोजित प्रदर्शनी में उनके हाथों से तैयार किया गया एक विशेष जेंट्स कुर्ता प्रदर्शित हुआ। इस उत्कृष्ट कृति ने निर्णायकों का दिल जीत लिया और उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया।

यह क्षण उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। राष्ट्रीय सम्मान मिलने के बाद राणा अहमद ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ गया और उनके हुनर को नई उड़ान मिल गई।

नेशनल अवार्ड ने उनके लिए अंतरराष्ट्रीय द्वार भी खोल दिए। वर्ष 2003 में उन्हें पेरिस में अपनी शिल्पकारी प्रदर्शित करने का अवसर मिला। वहाँ भारतीय चिकनकारी की बारीकियों ने विदेशी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

वर्ष 2007 में कोलंबो और 2013 में ऑस्ट्रेलिया में भी उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया। हर मंच पर उनकी कढ़ाई ने भारतीय संस्कृति की कोमलता और सौंदर्य को विश्व के सामने गर्व से प्रस्तुत किया। उनकी पहचान अब केवल लखनऊ या भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शिल्पकार के रूप में स्थापित हो गई।

राणा अहमद की इस सफलता यात्रा में उनका परिवार भी कंधे से कंधा मिलाकर साथ खड़ा रहा। उनका इकलौता बेटा, अहमद हसन, जो अब 22 वर्ष का है, अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद माँ के व्यवसाय में सक्रिय भूमिका निभा रहा है। वह अपनी माँ को ही अपना गुरु मानता है। उसका कहना है कि उसने व्यापार की बारीकियाँ, गुणवत्ता के प्रति सजगता और ग्राहकों की पसंद को समझने की कला अपनी माँ से सीखी है। वह इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए इसे एक ब्रांड का रूप देना चाहता है।

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अहमद हसन का लक्ष्य है कि जल्द ही एक आधुनिक फैक्ट्री स्थापित की जाए और होलसेल स्तर पर कारोबार को मजबूत किया जाए, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्थायी पहचान बन सके। वह मेलों और प्रदर्शनियों में जाकर ग्राहकों की रुचियों को समझता है, नए डिज़ाइनों पर काम करता है और भारतीय संस्कृति व प्रकृति से प्रेरित पैटर्न विकसित करने की कोशिश करता है। उसके अनुसार, कपड़े की गुणवत्ता, धागे की मजबूती और छपाई की विशिष्टता.ये तीनों बातें किसी भी परिधान की सफलता तय करती हैं। इसी सोच के साथ वह हर उत्पाद में उत्कृष्टता बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।

आज राणा अहमद के चिकनकारी व्यवसाय का सालाना टर्नओवर 25 से 30 लाख रुपये के बीच है, जो उनके पति के बर्तनों के कारोबार के लगभग बराबर है। परिवार दोनों व्यवसायों पर समान रूप से ध्यान दे रहा है और आने वाले समय में इसे और आगे बढ़ाने की योजना बना रहा है। मुंबई, पुणे, हैदराबाद, कोलकाता और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में उनके बनाए परिधानों की अच्छी मांग है। उनके मामा आरिफ भी इस व्यवसाय को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

राणा अहमद की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल आर्थिक सफलता नहीं है, बल्कि वह प्रेरणा है जो उनकी कहानी से झलकती है। एक महिला होते हुए भी उन्होंने पारंपरिक सीमाओं को तोड़ा, अपने हुनर को पहचाना और उसे नई दिशा दी। उन्होंने साबित किया कि अगर कला के प्रति समर्पण और आत्मविश्वास हो, तो परिस्थितियाँ कभी बाधा नहीं बनतीं। आज भी वह सादगी से अपने काम में जुटी रहती हैं, हर नए डिज़ाइन में कुछ अलग और बेहतर करने की कोशिश करती हैं।

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उनकी यात्रा हमें यह सिखाती है कि विरासत में मिली कला तभी जीवित रहती है जब अगली पीढ़ी उसे अपनाकर आगे बढ़ाए। राणा अहमद ने अपनी माँ से जो सीखा, उसे निखारकर विश्व मंच तक पहुँचाया, और अब उनका बेटा उसी परंपरा को आधुनिक दृष्टि के साथ आगे ले जाने को तैयार है। लखनऊ की चिकनकारी की महीन कढ़ाई में आज भी राणा अहमद के सपनों, संघर्षों और सफलता की चमक साफ दिखाई देती है। यह कहानी हर उस महिला और हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो अपने हुनर पर भरोसा करके दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है।