सानिया अंजुम
डॉ. सरवत आदिल खान दान-पुण्य की बात नहीं करतीं। वे सम्मान की बात करती हैं। वे इसे किसी का बचाव करना नहीं, बल्कि उसे उसकी जगह वापस दिलाना कहती हैं। उनका मानना है कि शिक्षा सिर्फ परीक्षा पास करने का नाम नहीं है, बल्कि दुनिया में अपनी पहचान वापस पाने का जरिया है।
बेंगलुरु की तंग गलियों में, जहाँ अमीरी और गरीबी एक साथ रहती हैं, डॉ. सरवत ने चुपचाप एक ऐसा पुल बनाया है जिसने टूटे हुए सपनों को फिर से जोड़ दिया। साल 2018में उन्होंने 'लर्निंग पॉइंट फाउंडेशन' की शुरुआत की। तब से अब तक उन्होंने 1,500से ज़्यादा ऐसे लोगों की जिंदगी बदली है जो अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ चुके थे। उन्होंने इन लोगों को सिर्फ किताबें नहीं दीं, बल्कि जीने की नई उम्मीद और आत्म-सम्मान भी दिया।

उनका यह मिशन उनके अपने संघर्ष से निकला है। डॉ. सरवत को शादी की वजह से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी। सालों तक लगा कि पढ़ाई का अध्याय अब बंद हो चुका है। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने फिर से शुरुआत की, अपनी डिग्रियां पूरी कीं और मनोविज्ञान (Psychology) में डॉक्टरेट हासिल की।
पढ़ाई में आए उस लंबे अंतराल ने उन्हें दूसरों का दर्द समझने में मदद की। वे कहती हैं, "जब मैंने दोबारा पढ़ाई शुरू की, तो मुझे पता चला कि उस खाली वक्त का बोझ कितना भारी होता है। मैं उस आत्मविश्वास की कमी को जानती थी। इसीलिए मैं पीछे छूट गए लोगों को अनदेखा नहीं कर सकी।"
पिछड़े इलाकों में उन्होंने देखा कि लोगों में दिमाग की कमी नहीं है, बस उनके पास रास्ते नहीं हैं। गरीबी, घर की ज़िम्मेदारियाँ, कम उम्र में शादी और सामाजिक दबाव के कारण कई बच्चे और बड़े स्कूल छोड़ देते हैं। मदरसों के छात्रों, विधवाओं, अकेली माताओं और अनाथ बच्चों के लिए मुख्यधारा की शिक्षा हमेशा एक सपना बनी रही।
डॉ. सरवत ने इस सोच को बदलने का फैसला किया। 'लर्निंग पॉइंट फाउंडेशन' का मकसद बिल्कुल साफ था: स्कूल छोड़ चुके लोगों को 'नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग' (NIOS) के ज़रिए फिर से शिक्षा से जोड़ना। यहाँ 10वीं और 12वीं की तैयारी कराई जाती है, ताकि उन लोगों को मान्यता प्राप्त सर्टिफिकेट मिल सके जो सोच चुके थे कि अब बहुत देर हो गई है।

नतीजे वाकई हैरान करने वाले हैं। यहाँ का रिजल्ट 90प्रतिशत से भी ज़्यादा रहता है। लेकिन इन आँकड़ों के पीछे जीती-जागती कहानियाँ हैं। तीन बच्चों की एक माँ ने शादी के 15साल बाद फिर से पढ़ाई शुरू की। एक नौजवान, जिसने पैसे की तंगी के कारण स्कूल छोड़ दिया था, आज 12वीं पास करके नौकरी कर रहा है। कई मदरसा छात्र आज कॉलेज और नौकरी के लिए तैयार हो रहे हैं।
डॉ. सरवत कहती हैं, "एक सर्टिफिकेट पूरे परिवार की दिशा बदल सकता है। जब घर का एक सदस्य पढ़ता है, तो पूरे घर को फिर से उम्मीद मिलने लगती है।"'लर्निंग पॉइंट फाउंडेशन' सिर्फ परीक्षा पास करना नहीं सिखाता। डॉ. सरवत जानती थीं कि आज की दुनिया में सिर्फ किताबी ज्ञान काफी नहीं है।
यहाँ छात्रों को मानसिक सहारा और व्यक्तित्व विकास की ट्रेनिंग दी जाती है। कई छात्र टूटे हुए भरोसे और हार के डर के साथ आते हैं। उन्हें बातचीत करने का तरीका, समय का सही इस्तेमाल और अनुशासन सिखाया जाता है। वे कहती हैं, "हम उन्हें सोचना और आत्मविश्वास के साथ खड़ा होना सिखाते हैं।"
यहाँ वोकेशनल ट्रेनिंग भी दी जाती है। डेटा एंट्री, कंप्यूटर और डिजिटल साक्षरता जैसे कोर्स से छात्रों को नौकरी मिलने में मदद मिलती है। कई परिवारों के लिए यह बदलाव उनकी पूरी ज़िंदगी बदलने जैसा है।एक पूर्व छात्र ने बताया, "मैंने पढ़ाई की उम्मीद छोड़ दी थी। मुझे लगा मैं बस छोटी-मोटी नौकरियाँ ही कर पाऊँगा। यहाँ मुझे सम्मान मिला। मैंने कंप्यूटर सीखा और आज मेरे पास नौकरी है। अब मेरे छोटे भाई-बहन मेरी वजह से स्कूल जा रहे हैं।"
फाउंडेशन में क्लासरूम, लैब और लाइब्रेरी जैसी सुविधाएँ हैं। ज़रूरतमंद छात्रों को स्कॉलरशिप भी दी जाती है। हालांकि, यह संस्था सीमित बजट और दान के भरोसे ही चलती है।आर्थिक तंगी के बावजूद इनका काम बढ़ता जा रहा है। चंद बच्चों से शुरू हुआ यह सफर आज हर साल 1,000 से ज़्यादा छात्रों तक पहुँच चुका है। डॉ. सरवत की कोशिश है कि मदरसों के साथ मिलकर धार्मिक और आधुनिक शिक्षा का सही तालमेल बनाया जा सके।

वे कहती हैं, "हम किसी से उनकी जड़ें छोड़ने को नहीं कहते। हम तो बस उनके लिए आसमान बड़ा कर देते हैं।" यहाँ का माहौल अनुशासित भी है और ममता भरा भी। छात्रों को उनके बीते हुए कल के लिए नहीं परखा जाता, बल्कि उन्हें उनके आने वाले कल के लिए तैयार किया जाता है।
डॉ. सरवत स्वभाव से शांत लेकिन इरादों की पक्की हैं। उन्हें प्रचार से ज़्यादा अपने काम के असर से प्यार है। वे मुस्कुराते हुए कहती हैं, "जब कोई छात्र फोन करके कहता है कि 'मैडम, मेरा रिजल्ट आ गया', तो वही मेरा सबसे बड़ा इनाम होता है।"
आज 'लर्निंग पॉइंट फाउंडेशन' सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि दोबारा शुरुआत करने का एक केंद्र है। यह उन अधूरे सपनों का घर है जिन्हें फिर से जीने का मौका मिला है।जहाँ समाज अक्सर 'ड्रॉपआउट' बच्चों को सिर्फ एक संख्या मानता है, डॉ. सरवत उनमें एक चेहरा देखती हैं।

वे उनमें छिपी हुई काबिलियत देखती हैं। उनका मानना है, "शिक्षा के दरवाज़े किसी के लिए बंद नहीं होने चाहिए। अगर सीखने की इच्छा है, तो रास्ता ज़रूर निकलना चाहिए।" और बेंगलुरु की एक छोटी सी इमारत में, हर दिन एक नया रास्ता बनाया जा रहा है।