डॉ आसीमा बानू

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 15-04-2026
Dr. Asima Banu of BMCRI: An Exemplar of Honesty, Service, and Leadership
Dr. Asima Banu of BMCRI: An Exemplar of Honesty, Service, and Leadership

 

स़ानिया अंजुम

एक डॉक्टर की असली पहचान क्या है? उनके पद, उनकी डिग्रियाँ या उनके काम के साल? क्या यह उनके द्वारा चुने गए विषय हैं, उनके बनाए सिस्टम हैं या वे मूल्य हैं जिनसे उन्होंने कभी समझौता नहीं किया? बेंगलुरु मेडिकल कॉलेज और रिसर्च सेंटर (BMCRI) में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष डॉ. आसीमा बानू के लिए इसका जवाब बहुत सीधा है। उनके लिए इसका मतलब है जीवन भर कठिन रास्तों को चुनना और ईमानदारी, अखंडता और उद्देश्य के साथ अडिग रहना।

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दक्षिण बेंगलुरु में जन्मी और पली-बढ़ी डॉ. आसीमा की पढ़ाई सरस्वती विजया स्कूल से शुरू हुई। वह बचपन से ही मेधावी छात्रा रहीं और उन्होंने अपनी पूरी शिक्षा के दौरान हमेशा टॉप रैंक हासिल की। इतनी अच्छी रैंक के साथ वह चाहतीं तो चिकित्सा का कोई भी चकाचौंध वाला विषय चुन सकती थीं, लेकिन उन्होंने एक अलग राह चुनी। वह कहती हैं कि मैंने कभी भी घिसे-पिटे रास्तों पर चलना पसंद नहीं किया। इसे मेरी किस्मत कहें या मेरी पसंद, मैंने माइक्रोबायोलॉजी को चुना।

जिस समय डॉ. आसीमा ने यह फैसला लिया, तब भारत में एचआईवी मेडिसिन शुरुआती दौर में थी और कचरा प्रबंधन (बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट) जैसी चीजों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था। जहाँ दूसरों को अनिश्चितता दिखी, वहाँ डॉ. आसीमा को एक मकसद मिला।

उनका मानना है कि कठिन रास्ते ही हमेशा खूबसूरत मंजिलों तक ले जाते हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने BMCRI में 26साल से ज्यादा समय तक काम किया। उन्होंने विक्टोरिया अस्पताल और ट्रॉमा केयर जैसे बेहद दबाव वाले केंद्रों में लगभग नौ साल बिताए। वह कहती हैं कि ट्रॉमा मेडिसिन का काम बहुत थका देने वाला होता है, लेकिन मरीजों की सेवा और छात्रों को पढ़ाने का जुनून उन्हें हमेशा ऊर्जा से भर देता है।

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डॉ. आसीमा सिर्फ एक डॉक्टर नहीं हैं, वह सिस्टम बनाने में माहिर हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक ट्रॉमा केयर सेंटर में एक ऐसी प्रयोगशाला (लैब) शुरू करना था जो 24घंटे काम करती है। उन्होंने बहुत कम संसाधनों में एक ऐसा मॉडल तैयार किया जो आज भी बेहतरीन परिणाम दे रहा है।

इसके अलावा, उन्होंने मेडिकल शिक्षा के स्तर को सुधारने और आधुनिक तकनीक को पढ़ाई से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2018में उन्होंने संस्थान में सिम्युलेशन सेंटर शुरू करने में मदद की, जिससे डॉक्टरों की ट्रेनिंग और बेहतर हो सके।

नेतृत्व को लेकर उनके विचार बहुत स्पष्ट हैं। वह कहती हैं कि एक लीडर के तौर पर आपको आलोचना झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। लीडरशिप का मतलब अधिकार जताना नहीं बल्कि जिम्मेदारी लेना है। वह मानती हैं कि अपनी टीम को बचाकर रखना और सफलता का सारा श्रेय उन्हें देना ही एक सच्चे लीडर की निशानी है। उनकी इन्हीं खूबियों की वजह से 2007में उन्हें 'स्टेट बेस्ट टीचर अवार्ड' से नवाजा गया।

वनी विलास अस्पताल में इन्फेक्शन कंट्रोल की जिम्मेदारी संभालना हो या ब्रेस्ट मिल्क बैंक के सुरक्षा मानकों की निगरानी करना, डॉ. आसीमा ने हमेशा पर्दे के पीछे रहकर हजारों जानें बचाई हैं। कोरोना महामारी के उस भयावह दौर को याद करते हुए वह उसे एक 'बुरे सपने' जैसा बताती हैं। उस दौरान न कोई त्यौहार था, न कोई छुट्टी। हर दिन मौत का सामना करना पड़ता था, फिर भी वे लोग डटे रहे। वह अपनी इस हिम्मत का श्रेय सामूहिक ताकत और ऊपरवाले की मदद को देती हैं।

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इतनी व्यस्तता के बावजूद डॉ. आसीमा एक पारिवारिक महिला हैं। वह खुद को काम के प्रति समर्पित मानती हैं, लेकिन अपनी पोती के साथ समय बिताना, प्रकृति, पेंटिंग और हस्तशिल्प में उन्हें सुकून मिलता है। वह रेडियो पर 'आस्क आसीमा' के जरिए भी लोगों से जुड़ी रहती हैं। वह कहती हैं कि परिवार हो या पेशा, उन्होंने कभी किसी चीज से समझौता नहीं किया।

जब उनसे पूछा गया कि वह अपनी क्या विरासत छोड़ना चाहती हैं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं चाहती हूँ कि मेरे छात्र मुझे एक 'दोस्त' के रूप में याद रखें। वह दोस्त जो उनके साथ बैठती थी, उनके साथ खाना खाती थी और उनके हर सुख-दुख में साथ खड़ी रहती थी।

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युवाओं के लिए उनका संदेश बहुत सरल है: अपने सिद्धांतों पर चलें, काम के प्रति ईमानदार रहें और एक जिम्मेदार नागरिक बनें। वह याद दिलाती हैं कि जीवन में गुलाब के साथ कांटे भी मिलेंगे, लेकिन आपकी ईमानदारी ही सफर को सार्थक बनाएगी। डॉ. आसीमा बानू भारतीय स्वास्थ्य सेवा की वह शांत ताकत हैं जिन्होंने हमेशा पद और सत्ता के बजाय लोगों और सेवा को प्राथमिकता दी।