सानिया अंजुम
"मेरी जन्मभूमि मेरे लिए स्वर्ग है।" डॉ. फरीदा रहमतुल्लाह की आवाज में गर्व और यादों की चमक साफ झलकती है। कॉफी और काली मिर्च के बागानों, ऊंचे पहाड़ों और हरियाली से सराबोर कर्नाटक के चिकमगलूर जिले के गुल्लनपेट में उनका जन्म हुआ। इसी जगह ने उन्हें आत्मसम्मान और अपनेपन का पहला पाठ पढ़ाया। वहां बेटियों को बहुत प्यार और सम्मान दिया जाता था। लेकिन इस लाड-प्यार के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी थी। उस दौर में लड़कियों की पढ़ाई अक्सर किशोरावस्था तक आते-आते रोक दी जाती थी। उच्च शिक्षा कुछ ही खुशकिस्मत लड़कियों के हिस्से आती थी। अपनी आंखों के सामने इस भेदभाव को देखकर उनके मन में पहली बार सवाल उठने लगे।

शादी उनके जीवन का एक बड़ा मोड़ साबित हुई। वह गांव की शांति से निकलकर बेंगलुरु के शोर-शराबे वाले शहर में आ गईं। यहां उन्हें जिंदगी की एक अलग और कठोर हकीकत देखने को मिली। आजादी तो थी लेकिन अमीरी-गरीबी की खाई बहुत गहरी थी। गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले कई मुस्लिम परिवारों की हालत देखकर उनका दिल बैठ गया।
लड़कियां शिक्षा से दूर थीं। छोटे-छोटे लड़के साइकिल रिपेयर की दुकानों पर घंटों काम करते थे। महिलाएं अंधेरे कमरों में बैठकर अगरबत्ती बनाती थीं। कई पुरुष बेरोजगारी या नशे की गिरफ्त में थे। फरीदा जी याद करती हैं, "उसी दिन मैंने ठान लिया कि मैं काम करूंगी और इस स्थिति को बदलकर रहूंगी।" यह फैसला गुस्से में नहीं, बल्कि अपनों के प्रति जिम्मेदारी और हमदर्दी की भावना से लिया गया था।
शिक्षा उनके लिए केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि दुख और निराशा के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन गई। वह दृढ़ता से कहती हैं, "शिक्षा मेरा जुनून है और मेरी प्राथमिकता भी।" उनका मानना है कि जब किसी बच्चे को सही मार्गदर्शन और संस्कारों के साथ पढ़ाया जाता है, तो बदलाव अपने आप आता है।
शिक्षित बच्चा न केवल अपना बल्कि अपने परिवार और समाज का ख्याल रखना सीख जाता है। उनके लिए समाज सेवा और शिक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। "मानवता की सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है," इसी सिद्धांत ने उनके हर काम की नींव रखी।

उनकी अपनी पढ़ाई का सफर भी सीखने के प्रति उनके अटूट प्रेम को दर्शाता है। बेंगलुरु आने के बाद उन्होंने एनएमकेआरवी (NMKRV) कॉलेज से स्नातक किया। इसके बाद बेंगलुरु विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए और धारवाड़ विश्वविद्यालय से उर्दू में एमए की डिग्री हासिल की।
साहित्य उनका सहारा बना और उनकी आवाज भी। उन्होंने दो उपन्यास और तीन लघु कथा संग्रह लिखे। अपनी रचनाओं में उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर संवेदनशीलता और बहादुरी के साथ चोट की। तीस वर्षों तक उन्होंने 'ज़र्रीन शुवेन' नामक उर्दू मासिक पत्रिका का संपादन किया। यह पत्रिका अनगिनत पाठकों के लिए एक सांस्कृतिक मंच बन गई।
फरीदा जी ने अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए शिक्षण संस्थानों की स्थापना की। 'होली मदर्स इंग्लिश स्कूल' की संस्थापक प्रिंसिपल के रूप में उन्होंने सुनिश्चित किया कि शिक्षा सबके लिए हो। उनके स्कूल में लगभग चालीस प्रतिशत बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। यहां हर धर्म के बच्चे साथ पढ़ते हैं। बाद में उन्होंने अवालाहल्ली स्लम एरिया (झुग्गी बस्ती) में एक और 'होली मदर्स स्कूल' शुरू किया। वहां गरीब बच्चों को पूरी तरह मुफ्त शिक्षा दी जाती है।
कोरोना महामारी उनके जीवन का एक और कठिन अध्याय था। लॉकडाउन के दौरान उन्होंने देखा कि झुग्गियों में रहने वाले बच्चों के पास ऑनलाइन क्लास की कोई सुविधा नहीं थी। जहां ऑनलाइन पढ़ाई हो भी रही थी, वहां बच्चों पर उसका बुरा असर पड़ रहा था। बच्चों की एकाग्रता कम हो रही थी और वे मोबाइल के आदी हो रहे थे।
स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या बढ़ गई थी। इस स्थिति से परेशान होकर उन्होंने जेपी नगर स्थित अपने स्कूल के प्रयासों को और तेज कर दिया। यह स्कूल पिछले पैंतीस वर्षों से सफलतापूर्वक चल रहा है। वह कहती हैं, "मैं उन बच्चों को पढ़ाने की कोशिश कर रही हूं जिन्होंने बीच में स्कूल छोड़ दिया था। मेरा मकसद उन्हें देश का बेहतर नागरिक बनाना है।" उनके पढ़ाए हुए छात्र आज एक गरिमामय जीवन जी रहे हैं।
स्कूल के अलावा डॉ. फरीदा समाज कल्याण के अन्य कामों में भी सक्रिय हैं। उन्होंने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए 'अल हुदा महिला कल्याण संगठन' की स्थापना की। यह संस्था गरीब बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी आपातकालीन स्थितियों में परिवारों की मदद करती है।

उन्होंने नशीली दवाओं के खिलाफ माताओं को जागरूक करने में भी बड़ी भूमिका निभाई है। उनका मानना है कि अगर मां जागरूक होगी, तो पूरी पीढ़ी सुरक्षित रहेगी। उनका संदेश बहुत सीधा है, "अपनी संपत्ति और अपनी प्रतिभा का उपयोग जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए करें।"
उनके निस्वार्थ सेवा भाव को समाज और सरकार ने भी सराहा है। साल 2008 में उन्हें उनके साहित्यिक कार्यों के लिए 'कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उनके दिल के बहुत करीब है। उन्हें कर्नाटक उर्दू अकादमी से दो बार सम्मानित किया गया है।
वह आठ वर्षों तक यूनिसेफ (UNICEF) की सदस्य भी रहीं। कर्नाटक सरकार ने उन्हें कर्नाटक हज समिति के सदस्य के रूप में भी नामांकित किया। बेंगलुरु की सड़कों पर लगे उनके होर्डिंग्स उनके महान कार्यों की गवाही देते हैं। वह बड़ी विनम्रता से कहती हैं, "जब लोग मेरे काम को पहचानते हैं, तो मुझे लगता है कि अल्लाह मेरे कामों से खुश है।"
साल 2019 में सेंट मदर टेरेसा यूनिवर्सिटी ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की। कुवेम्पू यूनिवर्सिटी में उनके जीवन और योगदान पर एम.फिल (M Phil) का शोध भी किया गया है। लगभग सौ पुरस्कार जीतने के बाद भी वह बहुत सरल स्वभाव की हैं। उनके लिए सफलता का मतलब ट्रॉफियां नहीं, बल्कि वे जिंदगियां हैं जिन्हें उन्होंने संवारा है।
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भविष्य की पीढ़ी के लिए उनका संदेश बहुत गहरा है। वह कहती हैं, "खुद से प्यार करें, अपनी भाषा से प्यार करें और अपने लोगों से प्यार करें। साथ ही दूसरी भाषाओं और समुदायों के लोगों का भी पूरा सम्मान करें।" उनका जीवन करुणा, साहस और भाईचारे का जीता-जागता उदाहरण है।
चिकमगलूर की पहाड़ियों से बेंगलुरु की तंग गलियों तक का डॉ. फरीदा रहमतुल्लाह का सफर यह साबित करता है कि अगर इंसान का मकसद नेक हो, तो वह बड़े से बड़ा बदलाव ला सकता है। उन्होंने बदलाव का इंतजार नहीं किया, बल्कि वह खुद बदलाव बन गईं।