नीलम गुप्ता
"यह मेरी मां का सपना था कि मैं डॉक्टर बनूं।" आंखों में चमक और चेहरे पर संतोष की गहरी भावना लिए स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शाइस्ता अंजुम जब अपनी जिंदगी के सफर को याद करती हैं, तो उनकी आवाज में आत्मविश्वास के साथ-साथ उन लोगों के लिए गहरा सम्मान भी झलकता है, जिनकी वजह से वह आज इस मुकाम तक पहुंच पाई हैं। डॉ. शाइस्ता बेहद सहज अंदाज में बताती हैं कि उनकी सफलता केवल उनकी अपनी मेहनत का परिणाम नहीं है, बल्कि यह तीन ऐसे लोगों के त्याग, विश्वास और सहयोग की कहानी है, जिन्होंने उनके सपनों को अपना सपना बना लिया।
वह कहती हैं, "यह मेरी मां का सपना था कि मैं डॉक्टर बनूं। एमबीबीएस पूरा करने के बाद मेरे पति ने मुझे आगे पढ़ाई जारी रखने और एमएस करने के लिए प्रेरित किया। मेरी सास ने मेरी बेटी की देखभाल की, जब मैं पढ़ाई कर रही थी। आज भी वह पूरी कोशिश करती हैं कि मुझे घर के कामों की चिंता न करनी पड़े। अगर ये तीन लोग मेरी जिंदगी में नहीं होते, तो मुझे नहीं पता कि आज मैं कहां होती।"
डॉ. शाइस्ता की कहानी सिर्फ एक लड़की के डॉक्टर बनने की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे परिवार की कहानी है, जिसने साबित किया कि गरीबी बड़े सपनों को खत्म नहीं कर सकती। यह कहानी उस मां की भी है, जिसने अपनी अधूरी इच्छाओं को बेटी के सपनों में पूरा होते देखा। यह उस सास की भी कहानी है, जिसने अपने संघर्षों के बावजूद अपनी बहू के भविष्य को संवारने में कोई कमी नहीं छोड़ी। और यह उस पति की कहानी भी है, जिसने पत्नी की सफलता को अपनी जिम्मेदारी समझा।

संघर्षों से भरा बचपन
डॉ. शाइस्ता अंजुम का बचपन राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित बारां में बीता। बारां आज एक उपखंड बन चुका है और यह कोटा से लगभग सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। उनके पिता एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते थे। परिवार का खर्च इसी दुकान से चलता था, लेकिन आमदनी इतनी नहीं थी कि जीवन आसानी से चल सके। वहीं उनकी मां हसरत बानो परिवार की आर्थिक मदद के लिए बीड़ी बनाने का काम करती थीं।
शाइस्ता बताती हैं, "मेरी मां हसरत बानो बीड़ी बनाती थीं। हम पांच भाई-बहन थे तीन बहनें और दो भाई। पढ़ाई में मैं सबसे आगे थी। मेरी मां को विश्वास था कि मुझमें डॉक्टर बनने की क्षमता है।" परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद उनकी मां ने कभी बेटी की पढ़ाई को रुकने नहीं दिया। उन्होंने शाइस्ता को मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए कोटा भेजने का फैसला किया और वहां के प्रसिद्ध एलन कोचिंग इंस्टीट्यूट में उनका दाखिला कराया।
शाइस्ता ने भी अपनी मां के विश्वास को टूटने नहीं दिया। उन्होंने कड़ी मेहनत की, मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास की और बारां के पास स्थित झालावाड़ के सरकारी मेडिकल कॉलेज में दाखिला हासिल किया।
एमबीबीएस के बाद ग्रामीण सेवा और आगे बढ़ने का फैसला
एमबीबीएस और इंटर्नशिप पूरी करने के बाद राजस्थान के नियमों के अनुसार उन्हें दो साल ग्रामीण क्षेत्र में सेवा देनी थी। इसी के तहत उनकी नियुक्ति पिंडावर गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हुई। यहां उन्होंने ग्रामीण इलाकों में मरीजों की सेवा की और अपने डॉक्टर होने की जिम्मेदारी निभाई। लेकिन इसी दौरान उनके पति सैयद इमरान अली ने उन्हें आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया।
सैयद इमरान अली पेशे से वकील हैं। शाइस्ता और इमरान की शादी साल 2015 में झालावाड़ में उनकी इंटर्नशिप के दौरान हुई थी। शाइस्ता बताती हैं कि उनके पति अक्सर उनसे कहते थे, "लोग कहेंगे कि मैंने तुम्हारी पढ़ाई रुकवा दी और मैं अपने ऊपर यह आरोप नहीं लेना चाहता।" पति के इस विश्वास ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी। ग्रामीण सेवा पूरी करने के बाद उनका तबादला झालावाड़ के सरकारी अस्पताल में हो गया।
साल 2020 में उन्होंने एमएस प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू की। इसके लिए उन्होंने दिल्ली के एक ऑनलाइन कोचिंग कार्यक्रम में दाखिला लिया। उस समय परिस्थितियां पहले से ज्यादा चुनौतीपूर्ण थीं, क्योंकि अब वह सिर्फ एक डॉक्टर और छात्रा नहीं थीं, बल्कि एक मां भी थीं। अस्पताल की ड्यूटी पूरी करने के बाद उन्हें रात के समय ऑनलाइन क्लास करनी पड़ती थी। उनकी छोटी बेटी की देखभाल में उनकी सास ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई।
शाइस्ता बताती हैं कि उन्होंने एमएस प्रवेश परीक्षा दो बार पास की, लेकिन उनकी रैंक इतनी अच्छी नहीं थी कि उन्हें अपनी पसंद की विशेषज्ञता मिल सके। एनेस्थीसिया के अलावा कोई पसंदीदा शाखा उपलब्ध नहीं थी, लेकिन उनकी रुचि उसमें नहीं थी। उन्होंने हार नहीं मानी और तीसरी बार पूरी तैयारी के साथ परीक्षा दी। इस बार उन्होंने शानदार रैंक हासिल की और उन्हें अपनी पसंद की विशेषज्ञता चुनने का अवसर मिला। उन्होंने स्त्री रोग यानी गायनेकोलॉजी को चुना। इसके पीछे उनकी मां की सीख थी। शाइस्ता कहती हैं, "मेरी मां हमेशा कहती थीं कि महिलाओं को बहुत तकलीफ सहनी पड़ती है। कोशिश करना कि उनकी जिंदगी थोड़ी आसान बना सको।"
यही सोच उनके लिए प्रेरणा बनी और उन्होंने गायनेकोलॉजी को अपना क्षेत्र चुना। लेकिन वह यह भी कहती हैं कि बाहर से देखने पर यह सफर आसान लग सकता है, लेकिन इसके पीछे उनकी मां का बहुत बड़ा संघर्ष छिपा हुआ था।
मां का संघर्ष, सास का त्याग और एक डॉक्टर बनने की पूरी कहानी
डॉ. शाइस्ता अंजुम कहती हैं कि उनकी सफलता के पीछे सबसे बड़ा योगदान उनकी मां के संघर्षों का है। उनके पिता की छोटी सी किराने की दुकान थी, जिससे परिवार का खर्च मुश्किल से चल पाता था। उनकी मां बीड़ी बनाकर परिवार की आर्थिक मदद करती थीं। आमदनी बहुत कम थी, लेकिन परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए हर एक रुपया महत्वपूर्ण था। शाइस्ता बताती हैं, "हम सभी ने सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की। लेकिन किताबें, यूनिफॉर्म और दूसरी जरूरतों के लिए पैसे की जरूरत होती थी। कई बार मेरे नाना ने हमारी आर्थिक मदद की।"
जब शाइस्ता कोटा में मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही थीं, तब उनकी मां अपने स्तर पर हर संभव कोशिश कर रही थीं कि बेटी की पढ़ाई में कोई कमी न आए। वह कहती हैं, "मेरी मां पांच और दस रुपये के सिक्के एक छोटी सी गुल्लक में जमा करती थीं और जब भी कुछ पैसे इकट्ठे होते, मुझे भेज देती थीं। उन्होंने अपने ऊपर कभी ज्यादा खर्च नहीं किया। लेकिन मेरी पढ़ाई के लिए उन्होंने घर के खर्चों में भी कटौती करनी शुरू कर दी थी।"
उनकी मां की केवल एक ही इच्छा थी कि किसी भी तरह उनकी बेटी डॉक्टर बने। शाइस्ता कहती हैं, "मैं अल्लाह का शुक्र अदा करती हूं कि मुझे अपनी मां का सपना पूरा करने का मौका मिला। यह सिर्फ उनकी आंखों में देखा हुआ सपना नहीं था, बल्कि उनकी आत्मा की गहरी इच्छा थी।"

मां के अधूरे सपने ने बेटी को डॉक्टर बनाया
शाइस्ता बताती हैं कि उनकी मां के मन में बेटी को डॉक्टर बनाने की इच्छा अचानक नहीं आई थी, बल्कि इसके पीछे उनका अपना दर्द और पुराना अनुभव था। उनकी मां हसरत बानो के पिता यानी शाइस्ता के नाना के परिवार में तीन बेटियां और दो बेटे थे। शाइस्ता बताती हैं, "मेरे नाना ने अपनी बेटियों को सिर्फ पांचवीं कक्षा तक पढ़ाया, लेकिन दोनों बेटों को उच्च शिक्षा दिलाई। उनमें से एक बेटा डॉक्टर बना।"
उनकी मां और उनकी बहनें अक्सर सोचती थीं कि उन्हें आगे पढ़ने का अवसर क्यों नहीं दिया गया। उन्होंने अपने पिता से आगे पढ़ाई करने की इच्छा जताई, लेकिन उन्हें जवाब मिला कि लड़कियों को ज्यादा शिक्षा की जरूरत नहीं होती। घर की बेटियों को घरेलू कामों की जिम्मेदारी दी गई, जबकि उनके भाई को पढ़ाई के लिए पूरा समय दिया गया। यहां तक कि जब उनका भाई मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था, तब भी उनकी मां और उनकी बहनों को उसके लिए लगातार चाय बनानी पड़ती थी।
यही वह अनुभव था जिसने हसरत बानो के मन में एक संकल्प पैदा किया। उन्होंने तय किया कि अगर उनकी बेटी होगी, तो वह उसे जरूर पढ़ाएंगी और डॉक्टर बनाएंगी। शाइस्ता कहती हैं, "मेरी मां ने बहुत मुश्किलें झेलीं, लेकिन उन्होंने अपना सपना कभी नहीं छोड़ा। यह सिर्फ एक सपना नहीं था, बल्कि उनके दिल में वर्षों से मौजूद एक दर्द था, जिसे मेरी डॉक्टर बनने की सफलता ने एक तरह से भर दिया।"
सास की कहानी भी किसी संघर्ष से कम नहीं
शाइस्ता कहती हैं कि उनकी मां के संघर्षों ने उन्हें जीवन की चुनौतियों से लड़ना सिखाया, लेकिन शादी के बाद उन्हें एहसास हुआ कि उनकी सास का संघर्ष भी उतना ही कठिन था। उनकी सास हसरत बानो एक मध्यमवर्गीय परिवार से थीं। लेकिन शादी के बाद उनके पति ने दूसरी शादी कर ली और उन्हें छोड़ दिया। उस समय उनका एक छोटा बेटा था, जिसकी उम्र केवल छह साल थी।
पति के छोड़ने के बाद वह अपने बेटे को लेकर अपने माता-पिता के घर लौट आईं। लेकिन वहां भी उनका जीवन आसान नहीं था। शाइस्ता बताती हैं, "मेरी सास के भाई और भाभी ने उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। पिता के निधन के बाद उनकी मां भी उनसे अलग रहने लगीं।" उनके सामने एक छोटा बच्चा था और पूरी जिंदगी पड़ी थी। उनकी मां ने उन्हें रहने का सहारा दिया, लेकिन बेटे की परवरिश और जीवन चलाने के लिए कमाई करना एक बड़ी चुनौती थी।
उन्होंने सबसे पहले बीड़ी बनाने का काम शुरू किया, लेकिन इससे घर चलाने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं मिलता था। इसके बाद उन्होंने घर-घर जाकर कपड़े बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी टोकरी में चूड़ियां, नेल पॉलिश, लिपस्टिक और अन्य कॉस्मेटिक सामान भी जोड़ लिए। वह सामान खरीदने के लिए कोटा जाती थीं और फिर झालावाड़ से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित सुकेत गांव में घर-घर जाकर सामान बेचती थीं। शाइस्ता बताती हैं, "वह झालावाड़ में सामान नहीं बेचती थीं क्योंकि उन्हें डर था कि रिश्तेदार उन्हें देखकर बातें बनाएंगे और यह उनके लिए शर्मिंदगी का कारण बनेगा।" उन्होंने पूरे दिन यात्रा की, मेहनत की और हर एक रुपया कमाया, ताकि उनका बेटा अच्छी शिक्षा हासिल कर सके। आज वही बेटा एक सफल वकील है।

संघर्ष से सफलता तक बदला पूरा जीवन
शाइस्ता अपने शादी के शुरुआती दिनों को याद करते हुए कहती हैं, "जब मैं इस परिवार में शादी करके आई थी, तब हमारे घर में न फ्रिज था और न ही टीवी। हमारे पास सिर्फ एक स्टील की प्लेट और चार कटोरियां थीं। हम तीनों उसी एक प्लेट में खाना खाते थे।" लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए। आज उनके परिवार के पास अपनी कार है, पक्का घर है और उनके मायके के भाई भी आर्थिक रूप से अच्छी स्थिति में हैं। सबसे बड़ी खुशी की बात यह है कि आज उनकी मां और उनकी सास दोनों को बीड़ी बनाने की मजबूरी नहीं है।
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डॉक्टर बनने के बाद भी संघर्ष जारी रहा
एमएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉ. शाइस्ता अंजुम को दोबारा ग्रामीण क्षेत्र में नियुक्ति मिली। उन्हें झालावाड़ से करीब 125 किलोमीटर दूर डाग चोमेहला के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पोस्ट किया गया। एक छोटी बच्ची के साथ इतनी दूर की नौकरी संभालना उनके लिए बेहद मुश्किल था। शाइस्ता बताती हैं, "एक छोटी बेटी के साथ इतनी लंबी दूरी की पोस्टिंग संभालना बहुत कठिन हो गया था। इसलिए मैंने सीनियर रेजिडेंसी के लिए आवेदन किया। अल्लाह की कृपा से मेरा चयन हो गया और मेरी पोस्टिंग झालावाड़ सरकारी मेडिकल कॉलेज में हो गई।" एमएस पूरा करने के लिए उन्होंने तीन साल का अध्ययन अवकाश लिया था। इसके बाद जनवरी 2026 में उन्होंने दोबारा सरकारी सेवा ज्वाइन की।
मां की याद और सफलता का सम्मान
आज डॉ. शाइस्ता अंजुम की मां इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन शाइस्ता मानती हैं कि उन्होंने जो कुछ हासिल किया है, वह अपनी मां की वजह से है। वह कहती हैं, "आज मुझे अपने पूरे परिवार में सम्मान मिलता है क्योंकि मैं अपने परिवार की पहली लड़की हूं, जिसने घर से बाहर निकलकर उच्च शिक्षा हासिल की और अपना सफल करियर बनाया।" डॉ. शाइस्ता अंजुम की कहानी सिर्फ एक डॉक्टर की सफलता की कहानी नहीं है। यह तीन ऐसे लोगों की कहानी है, जिन्होंने एक महिला के सपने को पूरा करने में अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। एक मां, जिसने समाज की सीमाओं और आर्थिक परेशानियों के बावजूद अपनी बेटी के लिए बड़ा सपना देखने की हिम्मत की।
एक पति, जिसने पत्नी की प्रतिभा को पहचाना और हर कदम पर उसका साथ दिया। और एक सास, जिसने अपनी बहू के सपने को पूरा करने के लिए अपनी सुविधाओं और आराम का त्याग किया। इन तीनों के विश्वास, संघर्ष और प्यार ने न सिर्फ डॉ. शाइस्ता अंजुम को एक सफल डॉक्टर बनाया, बल्कि एक पूरे परिवार की सोच और आने वाली पीढ़ियों की दिशा बदल दी। यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि जब परिवार का साथ, मेहनत और मजबूत इरादे एक साथ आते हैं, तो मुश्किल हालात भी सफलता का रास्ता बना देते हैं।