गुलाम कादिर
सूरत की रांदर बस्ती में एक ऐसा वास्तुकला चमत्कार मौजूद है, जो किसी भी देखने वाले को हैरान कर देता है। इसे लोग आम तौर पर “एक खंभा मस्जिद” या “मस्जिद-ए-कुव्वत-ए-इस्लाम” के नाम से जानते हैं। कुछ लोग मुस्लिम समाज को केवल पारंपरिक कला या सीमित हुनर वाला समझते हैं, लेकिन यह मस्जिद इस धारणा को पूरी तरह पलट देती है। यह सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि इतिहास, संस्कृति और स्थापत्य कला का अनूठा संगम है।

इस एक खंभे पर टिकी है पूरी मस्जिद
मस्जिद रांदर के पुराने हिस्से में स्थित है। रांदर सूरत का प्रमुख व्यावसायिक केंद्र रहा है। यहां के व्यापारी प्राचीन समय में अफ्रीका, अरब देशों और बर्मा तक अपने व्यापार के लिए जाने जाते थे। अनुमानित रूप से 1225 ईस्वी में कूफ़ा (इराक) से आए अरब व्यापारी रांदर में बस गए। उनके आने से स्थानीय और बाहरी संस्कृति का मेल शुरू हुआ। यही सांस्कृतिक मिश्रण आज भी रांदर में दिखाई देता है।

मस्जिद का निर्माण 1800 के दशक में हुआ। यह किसी एक शैली की बजाय कई स्थापत्य शैलियों का मिश्रण है। इसमें अरबी, मुगल, पुर्तगाली और डच स्थापत्य तत्व देखे जा सकते हैं। मस्जिद का सबसे अद्भुत पहलू इसका संरचनात्मक डिजाइन है। यह पूरी तरह एक ही खंभे पर टिकी है। बेसमेंट में एक खंभे से चार मेहराबें निकलती हैं और तीन मीनारें खड़ी हैं, जिनकी ऊँचाई 50 फीट है। इस खंभे पर ही पूरी मस्जिद का मीडज़ेनाइन और एक फ्लोर टिका हुआ है।

रांदर का ऐतिहासिक महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र जैन, पारसी और अन्य समुदायों का भी घर रहा है। रांदर का बंदरगाह सूरत के बंदरगाह से पहले अस्तित्व में था। 1200 के दशक में यहां जैन व्यापारी विभिन्न देशों के साथ व्यापार करते थे। 1225 में अरब व्यापारी आए और उन्होंने पूजा के लिए अपनी जगह बनाई।

यहां से नमाज पढ़ाते हैं मस्जिद के इमाम
सूरत के प्रतिष्ठित आर्किटेक्ट और आर्कियोलॉजिस्ट डॉ. सुरेंद्र व्यास के शोध के अनुसार, "गुजरात में पहली मस्जिद रांदर में ही बनाई गई थी।" डॉ. व्यास ने अपनी पुस्तक “डॉन ऑफ इस्लामिक आर्किटेक्चर इन गुजरात” में बताया है कि लगभग 1300 साल पहले दो अरब व्यापारी रांदर आए और उन्होंने केवल एक किबला की दीवार बनवाई थी। इसमें कोई मीनार या हौज़-ए-वज़ू नहीं था। इस दीवार के सामने सभी व्यापारी एकत्र होते और अल्लाह की पूजा करते। आज भी इन दो व्यापारियों की कब्र नजदीकी कब्रिस्तान में मौजूद है, जिस पर अरबी में लेखन है।

यह मस्जिद रांदर के लोकजीवन में भी महत्वपूर्ण है। यहां की गलियों में चलते हुए आपको पुराने समय की व्यापारिक जीवनशैली की झलक मिलती है। मस्जिद और आसपास की बस्तियों में जैन मंदिर भी हैं। यह दर्शाता है कि रांदर विभिन्न धर्म और संस्कृतियों का संगम रहा है। डॉ. व्यास के अनुसार, गुजरात की कुल 70 से अधिक मस्जिदों और इमारतों का अध्ययन तीन साल तक चला। इस अध्ययन में रांदर की मस्जिद की स्थापत्य तकनीक और कला का विवरण भी शामिल किया गया।

मस्जिद का पश्चिमी दीवार, जिसे किबला की दीवार कहते हैं, मक्का की दिशा की ओर है। यह दीवार अब भी मस्जिद की डिजाइन का अहम हिस्सा है। पहले नमाज का कोई निर्धारित समय नहीं था। लोग ऊँचे टीले पर खड़े होकर या बूम का इस्तेमाल करके एकत्र होते थे। बाद में मीनार से अजान होने लगी और लोग निर्धारित समय पर इबादत करने लगे।

एक खंभा मस्जिद का यह डिज़ाइन न केवल वास्तुकला के लिए बल्कि सामाजिक जीवन और व्यापारिक इतिहास के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह दिखाता है कि रांदर के लोग कितने व्यवस्थित और आधुनिक सोच वाले थे। मस्जिद में एक ही खंभे पर इतनी भारी संरचना टिकाना वास्तुकला की अद्वितीय उपलब्धि है।

रांदर की गलियों में चलते हुए आपको यह एहसास होता है कि यह केवल एक इबादत गाह नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक केंद्र भी था। यहां व्यापारी विभिन्न देशों से आते और व्यापार के साथ-साथ अपने धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न करते। इस तरह से मस्जिद ने रांदर को केवल धार्मिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी मजबूती दी।


अलग-अलग ऐंगल से ली गई मस्जिद के बारी हिस्से की तस्वीर
स्थानीय लोग अब भी इसे “एक खंभा मस्जिद” के नाम से बुलाते हैं। यह नाम अपनी विशिष्टता के कारण है। आम मस्जिदों में कई खंभे होते हैं, लेकिन यह पूरी संरचना केवल एक खंभे पर टिकी है। इसके चारों ओर की मेहराबें और तीन मीनारें इसे और भी भव्य बनाती हैं।
मस्जिद के आसपास की गलियां इतिहास की कहानियों से भरी हैं। रांदर का बंदरगाह और व्यापारिक गतिविधियां आज भी पर्यटन और संस्कृति के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण हैं। अरबी व्यापारी यहां के समाज में घुलमिल गए। उन्होंने अपनी कला, संस्कृति और व्यापारिक अनुभवों को स्थानीय समाज के साथ साझा किया। इसी का परिणाम है कि आज रांदर में मस्जिद, मंदिर और अन्य स्थापत्य इमारतें एक साथ देखी जा सकती हैं।
डॉ. व्यास के अनुसार, "रांदर में मीनार नहीं होने के पीछे भी एक दिलचस्प वजह है। यह मुमकिन है कि यह मस्जिद व्यक्तिगत पूजा गृह के रूप में बनाई गई थी, इसलिए हौज़-ए-वज़ू और मीनार जैसी सुविधाओं की आवश्यकता नहीं थी। आसपास तालाब या सरोवर होने के कारण पानी की सुविधा उपलब्ध थी।"
आज की नजर से देखें तो यह मस्जिद किसी चमत्कार से कम नहीं है। एक ही खंभे पर टिककर यह इतने लंबे समय तक खड़ी रही और हर आने वाले को आश्चर्यचकित करती है। सूरत के रांदर क्षेत्र में यह स्थल न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस मस्जिद ने यह साबित कर दिया कि इस क्षेत्र के लोग केवल व्यापार में ही माहिर नहीं थे, बल्कि उनके पास स्थापत्य और कला का अद्भुत ज्ञान भी था। हर खंभे, हर मीनार और हर मेहराब में उनके हुनर की झलक मिलती है। यह मस्जिद उनके धैर्य, समर्पण और रचनात्मक सोच का प्रतीक है।
रांदर की यह मस्जिद हमें यह सिखाती है कि कला, संस्कृति और धर्म का मेल कैसे समाज को मजबूत और समृद्ध बनाता है। यह स्थल न केवल इतिहास की गवाह है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।
संपर्क जानकारी:
मस्जिद का पता: रांदर, सूरत, गुजरात, भारत
निर्माण का वर्ष: 1800 के दशक
स्वामित्व: अरब, मुगल
रांदर की यह एक खंभा मस्जिद आज भी अपने आप में एक जीवंत दस्तावेज़ है। यह दर्शाती है कि कभी-कभी एक खंभा ही पूरी संरचना को संभाल सकता है और इतिहास की धरोहर बन सकता है।