हाल ही में भारत में ईरान के राजदूत से पत्रकारों ने जब सवाल किया कि उनके देश ने भारत के पेट्रोल के जहाजों को चीन और रूस के साथ जलडमरू से जाने की अनुमति क्यों दी, तो उनका जवाब स्पष्ट और दिल को छू लेने वाला था। उन्होंने कहा कि भारत के लोग ईरान के साथ खड़े हैं। यह कोई सामान्य बयान नहीं था। भारत के लोगों ने न केवल ईरान पर इजरायल और अमेरिका के हमले का विरोध किया है, बल्कि मुसीबत में फंसे ईरानियों के लिए अपने दिल और घर खोल दिए हैं।
कश्मीर के कई लोग न केवल वहां जाकर राहत कार्यों में जुटे हैं, बल्कि जो लोग अभी वहां नहीं जा सकते, वे घर-घर जाकर धन, वस्त्र और आवश्यक सामग्री जुटा रहे हैं। इसमें किसी समुदाय का भेदभाव नहीं है। शिया, सुन्नी, हिन्दू या अन्य धर्म के लोग सभी बराबर भागीदारी कर रहे हैं।
#WATCH | Budgam, Kashmir: Locals in Budgam have donated gold, silver, and cash to support Iran in the wake of the Gulf War crisis, showing their solidarity with Iran. pic.twitter.com/B8CfNMiCLi
— ANI (@ANI) March 22, 2026
राज्य के शिया बहुल इलाकों में युवा रविवार, 22 मार्च, 2026 को ईद की छुट्टी के अगले ही दिन घर-घर जाकर दान इकट्ठा कर रहे थे। रैनावारी जैसे क्षेत्रों में लोगों ने अपनी बचत, परिवार की मदद, सोना और तांबे के बर्तन दान किए। लोग कहते हैं कि यह कम से कम हमारा फर्ज है। हम ईरान के लोगों की मदद कर सकते हैं, चाहे युद्ध के मैदान में नहीं जा सकते।

बुधगाम के स्थानीय निवासी मोहसिन अली बताते हैं कि मस्जिद इमाम ज़मान में दान जमा करने के लिए एक स्टॉल लगाया गया है। वहां महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग मिलकर दान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमारी माताएँ और बहनें गहने, तांबे के बर्तन और नकदी दे रही हैं ताकि हम ईरान की मदद कर सकें।
उन्होंने कहा कि हम वहां नहीं जा सकते, लेकिन वित्तीय मदद के जरिए मानवता की सेवा कर सकते हैं। उनका मानना है कि ईरान ने अन्याय के खिलाफ खड़े होकर पीड़ितों का समर्थन किया है। इसलिए वहां मदद भेजकर हम पीड़ितों की मदद कर रहे हैं और अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं।
ईरानी दूतावास ने इस मानवीय प्रयास की सराहना की और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर लिखा कि कश्मीर के लोगों का यह सहयोग कभी नहीं भुलाया जाएगा। उन्होंने कहा कि भारत के लोगों की उदारता और सहयोग का यह संदेश हमें हमेशा याद रहेगा।
इस दान संग्रह अभियान में महिलाओं ने विशेष भूमिका निभाई। उन्होंने सोने के गहने, तांबे के बर्तन और अन्य मूल्यवान वस्तुएं दान कीं। कुछ परिवारों ने पशुधन भी दान किया। बच्चों ने अपनी बचत और जेबखर्च से योगदान दिया।
संग्रह की गई सामग्री विशेष रूप से श्रीनगर, बुधगाम और बारामुल्ला से जुटाई गई है। इन क्षेत्रों में शिया आबादी अधिक है। दान को आधिकारिक राहत संगठनों और ईरानी दूतावास के माध्यम से ईरान पहुंचाया जाएगा ताकि यह निश्चित रूप से जरूरतमंदों तक पहुंचे।
इस प्रयास की पृष्ठभूमि में यह भी है कि पश्चिम एशिया में हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। फरवरी 28 को अमेरिकी और इजरायली संयुक्त हमले में ईरानी सुप्रीम लीडर आयातोल्ला अली खामनेई और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की हत्या हो गई। इस हमले के बाद तेहरान ने कड़ा जवाब दिया।
कश्मीर के लोग इस संघर्ष को केवल दूर से देख रहे हैं। उनके लिए यह जिम्मेदारी बनती है कि वे कम से कम मानवता के लिहाज से मदद करें। यह अभियान केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि भावनाओं और मानवीय सहयोग का प्रतीक है। लोग कहते हैं कि जब हम युद्ध के मैदान में नहीं जा सकते, तब भी मदद का कोई माध्यम हो सकता है।
जम्मू और कश्मीर के लोगों ने इससे पहले 13 मार्च को 'यूम-ए-कुद्स' के मौके पर भी भारी संख्या में प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन में लोगों ने ईरान और फिलिस्तीन के लोगों के साथ अपनी एकजुटता दिखाई। मार्काज़ी इमामबाड़ा, बुधगाम में बड़ी सभा हुई। इसके बाद लोग मुख्य चौक तक शांतिपूर्ण रैली निकालते हुए मार्च में शामिल हुए।
प्रतिभागियों ने कहा कि यह रैली यूम-ए-कुद्स के दिन आयोजित की गई थी। इसका उद्देश्य यह दिखाना था कि कश्मीर और भारत के लोग विश्व के अन्यायपूर्ण कार्यों के खिलाफ हैं। वे फिलिस्तीन और ईरान के लोगों के साथ खड़े हैं।
स्थानीय लोग बताते हैं कि यह केवल पुरुषों की भागीदारी नहीं है। महिलाएं भी बढ़-चढ़कर योगदान दे रही हैं। सोने के गहने, तांबे के बर्तन और नकदी दान करने में महिलाएं आगे रही हैं। बच्चों ने भी अपनी छोटी बचत के माध्यम से मदद की।
इस मानवीय प्रयास ने कश्मीर और ईरान के बीच भावनात्मक पुल बनाने का काम किया है। यह दिखाता है कि सिर्फ भौगोलिक दूरी या युद्ध की भयावहता लोगों की मानवता को कम नहीं कर सकती। लोग एकजुट होकर जरूरतमंदों की मदद करने के लिए आगे आ सकते हैं।
इमरान अली, स्थानीय निवासी, कहते हैं कि यह सहायता केवल धन और वस्त्र तक सीमित नहीं है। यह दिखाता है कि कश्मीर के लोग अन्याय और पीड़ा के खिलाफ खड़े हैं। उनका मानना है कि हर छोटा योगदान ईरान के पीड़ित लोगों के लिए बड़ा फर्क पैदा करता है।
A respected sister from Kashmir, donated the gold kept as a memento of her husband who passed away 28 years ago with a heart full of love and solidarity for the people of #Iran.
— Iran in India (@Iran_in_India) March 22, 2026
Your tears and pure emotions are the greatest source of comfort for the people of Iran and will never… pic.twitter.com/0zFcJwGhj0
ईरानी दूतावास ने दान की गई सामग्री की तस्वीरें साझा करते हुए लोगों की उदारता की सराहना की। उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों के दिल से किए गए इस सहयोग को वे कभी नहीं भूलेंगे। उन्होंने लिखा कि भारत का यह सहयोग हमेशा याद रखा जाएगा।
इस अभियान ने यह भी दिखाया कि मानवता और सहानुभूति किसी समुदाय, धर्म या सीमा से नहीं बंधती। कश्मीर के लोग सभी बाधाओं के बावजूद अपने सहयोग और उदारता का परिचय दे रहे हैं। यह केवल राहत कार्य नहीं है, बल्कि दूसरों के दुख में शामिल होने का सबसे बड़ा सबूत है।
इस तरह के प्रयास से यह स्पष्ट होता है कि युद्ध और संकट की स्थिति में भी मनुष्य की सहानुभूति और एकजुटता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कश्मीर के लोगों ने यह साबित कर दिया कि वे केवल आलोचक नहीं हैं, बल्कि पीड़ितों की मदद करने में सक्रिय और मानवता के प्रति जिम्मेदार हैं।

यह दान अभियान भावनात्मक, सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यह न केवल ईरान के पीड़ितों को राहत पहुंचाएगा, बल्कि भारत और कश्मीर के लोगों की मानवता और सहानुभूति की मिसाल भी बनेगा। यह संदेश साफ है कि संकट की स्थिति में भी दिल से मदद और भावनाओं से सहयोग संभव है।
कुल मिलाकर, कश्मीर की जनता ने यह दिखा दिया है कि वे न केवल अपने समाज के प्रति जिम्मेदार हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पीड़ितों के लिए मानवता का संदेश भी दे सकते हैं। उनकी यह पहल एक प्रेरणा है, जो यह बताती है कि मानवता की शक्ति हमेशा जीवित रहती है, चाहे दूरी कितनी भी हो।