मलिक असगर हाशमी
कन्नौज की संकरी गलियों से निकलकर देश की सबसे कठिन परीक्षा तक पहुंचने वाली डॉ. बुशरा बानो की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह कहानी पूरी तरह सच है। कहानी है हिम्मत की। यह कहानी है यकीन की। और यह कहानी है एक ऐसी मां की जिसने सपनों को बच्चे के जन्म के बाद भी जिंदा रखा।

उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले के सौरिख गांव में जन्मी बुशरा बानो बचपन से ही पढ़ाई में तेज थीं। परिवार को उन पर गर्व था। चार साल की उम्र में उन्होंने दूसरी कक्षा से पढ़ाई शुरू की। हर क्लास में वह अव्वल रहीं। गणित में बीएससी किया।
वह भी ऐसे समय में जब गांव में लड़कियों की पढ़ाई को लेकर ज्यादा जागरूकता नहीं थी। इसके बाद उन्होंने कम उम्र में ही एमबीए पूरा कर लिया। पढ़ने की रफ्तार इतनी तेज थी कि बीस साल से पहले पोस्ट ग्रेजुएशन खत्म कर चुकी थीं।

आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मैनेजमेंट में पीएचडी में दाखिला लिया। अगले ही साल उन्होंने नेट जेआरएफ क्वालीफाई किया। रिसर्च के साथ वह पढ़ाने भी लगीं। आगरा के एक प्राइवेट संस्थान में लेक्चरर रहीं। मेहनत रंग लाई और उन्होंने कम समय में पीएचडी पूरी कर ली। पढ़ाई उनके लिए सिर्फ डिग्री नहीं थी। वह आत्मनिर्भरता का रास्ता थी।
वह एक इंटरव्यू में बताती हैं, ‘‘ इसी दौरान उनकी शादी सऊदी अरब की जज़ान यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर असमर हुसैन से हुई। शादी के बाद उन्हें भी उसी यूनिवर्सिटी में पढ़ाने का मौका मिला। पति पत्नी दोनों साथ पढ़ाते थे। जिंदगी व्यवस्थित थी। सम्मान था। स्थिरता थी। लेकिन दिल में एक खालीपन था। उन्हें अपना देश याद आता था। भारत की मिट्टी की खुशबू उन्हें चैन से बैठने नहीं देती थी।“
वह कहती हैं-’’ चार साल बाद उन्होंने बड़ा फैसला लिया। उन्होंने नौकरी छोड़ दी। वह भारत लौट आईं। यह आसान नहीं था। पति सऊदी में ही रहे। तब तक वह एक बेटे की मां बन चुकी थीं। भारत लौटकर उन्होंने पोस्ट डॉक्टोरल प्रोग्राम ज्वाइन किया और साथ ही सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी। घर की जिम्मेदारी भी थी। छोटे बच्चे की परवरिश भी। लेकिन इरादा साफ था।“
पहली बार उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी। सफलता नहीं मिली। हिम्मत नहीं टूटी। इसी बीच उन्हें कोल इंडिया की एक कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी मिल गई। उनकी पोस्टिंग सोनभद्र में हुई। नौकरी के साथ पढ़ाई चलती रही। अगले साल उन्होंने फिर प्रयास किया। इस बार उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग और उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग दोनों की प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली।
जून 2018 में उन्होंने दोनों की मुख्य परीक्षा भी पास कर ली। उस समय वह अपने दूसरे बच्चे के साथ गर्भवती थीं। इंटरव्यू के समय वह गर्भावस्था के अंतिम चरण में थीं। सर्जरी हो चुकी थी। शरीर कमजोर था। लेकिन मन मजबूत था। उन्होंने इंटरव्यू दिया। परिणाम आया। उन्हें 277वीं रैंक मिली और इंडियन रेलवे ट्रैफिक सर्विस मिली।
उधर, उत्तर प्रदेश पीसीएस में उनकी रैंक 6वीं आई। इसका मतलब था कि वह डिप्टी कलेक्टर बन सकती हैं। उन्होंने 2020में फिरोजाबाद सदर में एसडीएम के रूप में कार्यभार संभाला। प्रशासनिक जिम्मेदारी निभाते हुए उन्होंने अवैध खनन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की। कानून व्यवस्था पर ध्यान दिया। गरीबों की समस्याएं सुनीं। वह हिजाब पहनकर दफ्तर जाती थीं। शुरू में कुछ लोग हैरान थे। लेकिन काम ने सबको जवाब दे दिया।

जिन्होंने उन्हें करीब से जाना, वे उनकी सादगी और स्पष्ट सोच के मुरीद हो गए। वह कहती हैं कि लोग पहले पहचान से जज करते हैं। बाद में काम से पहचान बनती है। फिरोजाबाद में वह लोकप्रिय अधिकारी रहीं।
इस बीच उन्होंने एक और बार संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा दी। इस बार 234 वीं रैंक आई। उन्हें भारतीय पुलिस सेवा मिली। वर्ष 2021 बैच की अधिकारी के रूप में उनका चयन हुआ और उन्हें पश्चिम बंगाल कैडर मिला। आज वह हुगली ग्रामीण जिले में असिस्टेंट सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस के रूप में सेवाएं दे रही हैं। पुलिस वर्दी में उनकी नई पारी शुरू हुई है। वह कानून लागू करने के साथ समुदाय से जुड़कर काम कर रही हैं।
उनकी सफलता के पीछे परिवार का बड़ा योगदान है। वह खुद मानती हैं कि अक्सर कहा जाता है कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला होती है। उनके मामले में यह उल्टा हुआ। जब यह तय हुआ कि वह भारत में ही सेवा करेंगी और बच्चे उनके साथ रहेंगे, तब उनके पति ने सऊदी की नौकरी छोड़ दी। वह भारत आ गए। अब वह बिजनेस करते हैं और खुद भी पीएचडी कर रहे हैं।

दो बच्चों की मां। कई सर्जरी। पढ़ाई का दबाव। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी। नौकरी की जिम्मेदारी। समाज की बातें। यह सब एक साथ था। लेकिन उन्होंने कभी खुद को कमजोर नहीं माना। वह कहती हैं कि मां बनने के बाद सपने खत्म नहीं होते। जिम्मेदारी बढ़ती है। हिम्मत भी बढ़ती है।
उनका संदेश साफ है। खासकर मुस्लिम लड़कियों और उनके परिवारों के लिए। वह कहती हैं कि बेटियों को मौका दीजिए। उन्हें पढ़ने दीजिए। उन्हें फैसला लेने दीजिए। अगर परिवार साथ खड़ा हो तो कोई मंजिल दूर नहीं।
डॉ. बुशरा बानो की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि जिंदगी सीधी रेखा नहीं होती। कभी असिस्टेंट प्रोफेसर। कभी कॉरपोरेट नौकरी। कभी एसडीएम।
फिर आईपीएस अधिकारी। हर मोड़ पर उन्होंने नया रास्ता चुना। हर बार चुनौती बड़ी थी। लेकिन उन्होंने हर बार खुद को बड़ा साबित किया।
आज जब वह पुलिस की वर्दी पहनकर मैदान में उतरती हैं तो वह सिर्फ एक अधिकारी नहीं होतीं। वह उन लाखों लड़कियों की उम्मीद होती हैं जो छोटे शहरों से बड़े सपने देखती हैं।
वह उन मांओं की आवाज होती हैं जो सोचती हैं कि अब बहुत देर हो चुकी है। वह बताती हैं कि देर कभी नहीं होती।
कन्नौज की गलियों से लेकर प्रशासनिक सेवा और फिर भारतीय पुलिस सेवा तक का यह सफर हमें यकीन दिलाता है कि हालात चाहे जैसे हों, इरादा साफ हो तो रास्ते बन जाते हैं। डॉ. बुशरा बानो ने यह साबित कर दिया है कि सपनों की कोई समय सीमा नहीं होती। और हिम्मत का कोई विकल्प नहीं होता।