कर्नल इशरत अहमद: महिलाओं के लिए सेना में प्रेरणा और नई राह

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-03-2026
Colonel Ishrat Ahmed: An inspiration and a new path for women in the military
Colonel Ishrat Ahmed: An inspiration and a new path for women in the military

 

अशफाक कायमखानी, झुंझुनूं (राजस्थान)

राजस्थान की रेतीली मिट्टी की तासीर में ही कुछ ऐसा है कि यहाँ की हवाओं में भी वीरता की कहानियां तैरती हैं। झुंझुनूं जिले का नाम आते ही आंखों के सामने फौजियों की लंबी कतारें आ जाती हैं। इसी जिले का एक छोटा सा गांव है नूआं। इस गांव को लोग 'अफसरों वाला गांव' भी कहते हैं। इसी मिट्टी से निकली एक बेटी ने आज भारतीय सेना में वो मुकाम हासिल किया है जो न केवल उनके परिवार बल्कि पूरे प्रदेश के लिए गौरव का विषय है। यह कहानी है कर्नल इशरत अहमद की। वह केवल एक सैन्य अधिकारी नहीं हैं, बल्कि एक मिसाल हैं कि अगर हौसले बुलंद हों तो रेगिस्तान की बेटियां भी आसमान छू सकती हैं।

हाल ही में जब मेरठ में भारतीय सेना की ऑर्डिनेंस यूनिट की कमान कर्नल इशरत अहमद को सौंपी गई, तो यह एक ऐतिहासिक पल बन गया। इशरत कायमखानी समाज की पहली महिला अफसर हैं जो इस ऊंचे और रणनीतिक पद तक पहुंची हैं। उनकी वर्दी पर लगे सितारे और उनके चेहरे का अनुशासन यह बताता है कि यह कामयाबी किसी इत्तेफाक का नतीजा नहीं है। इसके पीछे पीढ़ियों का संघर्ष और फौजी घरानों की वो परंपरा है जिसमें देशप्रेम सबसे ऊपर रखा जाता है।

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कर्नल इशरत की रगों में फौजी खून दौड़ता है। उनके पिता मरहूम लेफ्टिनेंट कर्नल जकी अहमद नूआं गांव के उन पहले चंद अफसरों में शामिल थे जिन्होंने 1971 में सेना में डायरेक्ट कमीशन पाया था। घर के माहौल में बचपन से ही सेना का अनुशासन और राष्ट्रवाद घुला हुआ था। कर्नल इशरत के भाई साकिब हुसैन भी भारतीय सेना में ब्रिगेडियर के पद पर तैनात हैं। ब्रिगेडियर साकिब कायमखानी समाज के पहले ब्रिगेडियर होने का मान रखते हैं। इतना ही नहीं, इशरत के नाना भी सेना में कप्तान थे। ऐसे में वर्दी पहनना इशरत के लिए सिर्फ एक करियर नहीं था, बल्कि अपनी विरासत को आगे बढ़ाने की एक जिम्मेदारी थी।

इशरत अहमद की पढ़ाई और ट्रेनिंग का सफर भी चुनौतियों भरा रहा। उन्होंने साल 2001 में चेन्नई से कमीशन प्राप्त किया। तब से लेकर आज तक उन्होंने सेना के कठिन से कठिन मोर्चों पर अपनी काबिलियत को साबित किया है। वह मानती हैं कि सेना में कोई जेंडर नहीं होता, वहां सिर्फ काम और देश की सुरक्षा सर्वोपरि होती है। उनकी सफलता ने उन तमाम रूढ़ियों को तोड़ा है जो यह मानती थीं कि मुस्लिम महिलाएं केवल घर की चारदीवारी तक सीमित रहती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि यह परिवार केवल सेना में ही नहीं, बल्कि देश के हर ऊंचे दफ्तर में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। इनके परिवार में आईएएस, आईपीएस और आईआरएस अधिकारियों की एक लंबी फेहरिस्त है। इनके चाचा अशफाक हुसैन और जाकिर हुसैन भारतीय प्रशासनिक सेवा में कलेक्टर रहे।

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वर्तमान में सीकर के जिला कलेक्टर कमरुल जमान चौधरी भी इसी परिवार के दामाद हैं। राजस्थान पुलिस के पहले मुस्लिम आईजी मरहूम लियाकत अली खान भी इसी परिवार का हिस्सा थे। कर्नल इशरत की बहनें भी प्रशासनिक और राजस्व सेवाओं में अपनी सेवाएं दे रही हैं। एक ही परिवार में इतने आला अधिकारियों का होना यह बताता है कि इस घर में शिक्षा और अनुशासन की जड़ें कितनी गहरी हैं।

इतनी बड़ी अफसर होने के बावजूद कर्नल इशरत की सादगी दिल जीत लेने वाली है। वह तामझाम और मीडिया की लाइमलाइट से दूर रहना पसंद करती हैं। उनकी बहन शबनम खान बताती हैं कि जब भी इशरत गांव आती हैं, तो वह गांव की बेटियों के साथ बैठना पसंद करती हैं। वह उन्हें यह समझाती हैं कि सेना में जाना केवल एक नौकरी नहीं है, यह जीवन जीने का एक तरीका है। वह उन्हें प्रतियोगी परीक्षाओं की बारीकियां सिखाती हैं और उनके भीतर आत्मविश्वास भरती हैं। वह चाहती हैं कि उनके गांव और समाज की हर बेटी अपनी पहचान खुद बनाए।

मेरठ में जब कर्नल इशरत अपनी यूनिट की कमान संभाल रही थीं, तो वहां मौजूद उनकी मां शमीम बानो की आंखों में खुशी के आंसू थे। एक मां के लिए इससे बड़ा गर्व क्या होगा कि उसका बेटा ब्रिगेडियर हो और बेटी कर्नल। यह दृश्य बदलते भारत की एक खूबसूरत तस्वीर पेश कर रहा था। यह संदेश था उन लोगों के लिए जो बेटियों की उड़ान को छोटा समझते हैं।

कायमखानी समाज के लिए भी कर्नल इशरत एक नई रोशनी लेकर आई हैं। यह बिरादरी सदियों से युद्धों में अपनी बहादुरी के लिए जानी जाती रही है। अब कर्नल इशरत जैसी बेटियां इस शौर्य को आधुनिक शिक्षा और नेतृत्व के साथ जोड़ रही हैं। समाज के बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि इशरत ने वो रास्ता दिखाया है जिस पर चलकर आने वाली पीढ़ियां और अधिक सशक्त होंगी।

कर्नल इशरत की कहानी संघर्ष और धैर्य की भी है। 1995 में पिता के निधन के बाद इस परिवार ने जिस मजबूती से खुद को संभाला, वह प्रेरणादायक है। कठिन परिस्थितियों में भी मां ने बच्चों की शिक्षा और संस्कारों से समझौता नहीं किया। आज उसी तपस्या का फल है कि नूआं गांव की हर गली में कर्नल इशरत के चर्चे हैं।

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आज जब कर्नल इशरत अहमद मेरठ में अपनी सैन्य यूनिट का नेतृत्व करती हैं, तो उनकी कमान के नीचे सैकड़ों जवान देश की सुरक्षा का संकल्प लेते हैं। उनकी यह यात्रा यह साबित करती है कि अगर परिवार का साथ हो और खुद का कठोर परिश्रम, तो कोई भी मंजिल दूर नहीं है। राजस्थान की माटी की यह लाडली आज देश के लाखों युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुकी है। कर्नल इशरत अहमद केवल एक व्यक्ति नहीं हैं, वह एक भरोसा हैं कि भारत का भविष्य सुरक्षित हाथों में है और बेटियां अब हर मोर्चे पर नेतृत्व करने को तैयार हैं।