Jaipur's Mir Ji Bagh: A Dargah, a Madrasa, and a Center of Brotherhood
फरहान इसराइली/ जयपुर
राजधानी जयपुर की हलचल-भरी सड़कों से एक मोड़ लेकर चलते हैं, मिर्ज़ा इस्माइल रोड के पास, संसार चंद्र रोड की ओर। वहाँ सामने खुलता है एक हरा-भरा, शांत बाग़, जिसे लोग “मीर जी का बाग़” कहते हैं। जैसे ही कदम दरगाह के परिसर में पड़ते हैं, हवा में मस्जिद की मीनार से पढ़ी जाने वाली तहरीर, हल्की खुशबू और पेड़ों की छाँव एक साथ घुल जाती है। यहाँ दरगाह मीर कुर्बान अली शाह, मस्जिद, मदरसा और लाइब्रेरी हैं। हर कोने में किताबों की खुशबू और इतिहास की गूँज महसूस होती है। वर्तमान सज्जादानशीन डॉ. सैय्यद हबीबुर्रहमान नियाजी हमें इस सफ़र में लेकर चलते हैं। उनकी आवाज़ में वह गर्मजोशी और सुकून है, जो इस जगह की रूह की तरह है।
मीर कुर्बान अली साहब का जयपुर आगमन
डॉ. नियाजी बताते है कि यह सिलसिला 19वीं सदी के आखिरी हिस्से में शुरू हुआ। मीर कुर्बान अली साहब अतरौली, जिला अलीगढ़ से आए थे। सन 1860 की बात है। “वे उस वक्त अवध हाई कोर्ट में लीडिंग वकील थे। राजा और नवाबों के मुकदमे वे संभालते थे। रियासत के दीवान ने महाराजा राम सिंह द्वितीय से कहा कि ऐसे बुजुर्ग हैं, उन्हें बुलाइए। महाराजा ने उन्हें रॉयल काउंसिल में मेंबर और ताज़िमी सरदार का ओहदा दे दिया।” जयपुर में उनका आगमन सिर्फ़ वकील के रूप में नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम भाईचारे और तालीम का पैग़ाम लेकर हुआ।
दरगाह मीर कुर्बान अली शाह: रूहानी और तालीमी मरकज़
जैसे ही हम दरगाह परिसर में कदम रखते हैं, पत्थरों पर लिखे कुरआनी अयात हमें सुकून देते हैं, और बाग़ में खिले पेड़-पौधे और फूलों की खुशबू चारों तरफ महसूस होती है। सात बीघा में फैला यह बाग़ सिर्फ हरियाली का नहीं, बल्कि मीर साहब की विरासत और इंसानी भाईचारे की मिसाल भी है। इस बाग़ के बीच में दरगाह मीर कुर्बान अली शाह है, जो 1907 में मीर साहब के इन्तेकाल के बाद उनके पोते अनवार उर रहमान साहब की देखरेख में बनाई गई। दरगाह के आसपास मस्जिद, मदरसा, कॉलोनी और महबूब लाइब्रेरी मिलकर धार्मिक, सामाजिक और शिक्षा के काम का केंद्र हैं। मस्जिद, जो 1865 में बनी, पत्थरों पर खूबसूरत नक्काशी के साथ सिर्फ़ नमाज़ पढ़ने का स्थल नहीं, बल्कि तालीम और लोगों के मिलन का भी स्थान है। डॉ. सैय्यद हबीबुर्रहमान नियाजी बताते हैं कि यहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग शामिल होकर भाईचारे और मेल-जोल बढ़ाते हैं।
मदरसा तालीम का मरकज़ है, जहाँ बच्चों को इस्लामी तालीम के साथ-साथ अच्छे काम और समाज के सही रास्ते की भी सीख दी जाती है। यह मदरसा न सिर्फ़ पढ़ाई का केंद्र है, बल्कि इंसानियत और नैतिकता फैलाने का काम भी करता है। बाग़ का एक हिस्सा कॉलोनी के रूप में है, जिसमें 68 प्लाट हैं और इसे मुसलमानों के लिए सुरक्षित रखा गया। डॉ. नियाजी कहते हैं, “हमने इसे गरीबों के लिए भी रखा, ताकि वे भी रह सकें।” यहाँ रहने वाले लोग दरगाह और मदरसा की गतिविधियों में भाग लेकर समुदाय में एकजुटता बनाए रखते हैं।
दरगाह परिसर में ही महबूब लाइब्रेरी में करीब 1,000–1,500 किताबें सुरक्षित हैं, जिनमें उर्दू साहित्य और धार्मिक किताबें हैं। यहाँ संग्रहित किताबें आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान और रूहानी मार्गदर्शन का जरिया हैं। शोधकर्ता और विद्यार्थी नियमित रूप से आते हैं, जिससे परिसर धार्मिक, सामाजिक और शिक्षा के लिहाज से पूरी तरह जीवंत रहता है।
मीर जी बाग़ में खानदानी विरासत
जब आप मीर जी बाग़ में कदम रखते हैं, तो सिर्फ़ दरगाह ही नहीं, बल्कि वहाँ की सज्जादानशीन की पुरानी परंपरा भी नजर आती है। मीर कुर्बान अली साहब से शुरू हुई यह परंपरा उनके बेटे मीर अब्दुर्रहमान साहब, फिर अनवारुर्रहमान साहब और उसके बाद सैयद महबूब उर रहमान नियाजी साहब और उनके बाद डॉ. सैय्यद हबीबुर्रहमान नियाजी साहब तक आ रही है।
बाग़ में खानदानी क़ब्रिस्तान भी हैं जहाँ यहाँ के सभी बुजुर्ग दफन हैं। सज्जादानशीन का काम सिर्फ़ कागज़ और दस्तावेज़ तक सीमित नहीं रहा। यह काम परिवार के बुजुर्गों ने अपने हाथों से समाज और धर्म की देखभाल की जिम्मेदारी बनाकर किया। आज भी दरगाह के आंगन में फैली महक, बाग़ की ठंडी छाया और गूंजती दुआएँ परिवार की मेहनत और सेवा की कहानी सुनाती हैं।
उर्स, मजलिस और रमज़ान का माहौल
जब दरगाह में उर्स का समय आता है, तो पूरा परिसर जैसे जश्न की तरह जीवित हो उठता है। रबी-उस-सानी में 15, 16 को उर्स और 17 तारीख़ को गौस पाक के चिराग़ रोशन किए जाते हैं। बाग़ और दरगाह की गलियों में चिराग़ों की रोशनी फैल जाती है और हवा में खुशबु फ़ैल जाती है। रजब में मीर कुर्बान अली साहब और उनके पुत्र अब्दुर रहमान साहब का उर्स दो दिन तक चलता है। इस दौरान लोग दरगाह के आँगन में बैठकर तक़रीर और मीलाद शरीफ सुनते हैं। बच्चों की हँसी, बुज़ुर्गों की दुआएँ और महिलाओं की सजधज से पूरा माहौल एक ही परिवार जैसा लगता है। रमज़ान के दौरान दरगाह में रोज़ाना इफ्तार का आयोजन होता है। चार बड़े इफ्तार होते हैं, जिनमें जयपुर और आसपास के लोग शामिल होते हैं। इफ्तार में मिठाइयाँ और फल दरगाह के गलियारे में सजते हैं। लोग नमाज़ के बाद साथ बैठकर खाना खाते हैं और एक-दूसरे की खुशियों में शामिल होते हैं।
12 रबी-उल-अव्वल के दिन मिलाद शरीफ का आयोजन होता है। इस दिन दरगाह फूलों और रंग-बिरंगी सजावट से सजी होती हैं। हिंदू और मुस्लिम सभी समुदाय के लोग जलसे में शामिल होते हैं। मुहर्रम के दस दिनों में दरगाह में शोहदा-ए-करबला के वाकियात सुनाए जाते हैं। पहली तारीख़ को खास मजलिस होती है, क्योंकि इसी दिन सज्जादानशीन के वालिद को दफनाया गया था। यह सिलसिला 1995 से लगातार चल रहा है, और हर दिन 500–600 लोग इसमें शरीक होते हैं।
उर्स और पर्व: हिन्दू-मुस्लिम एकता की निशानी
दरगाह पर बसंत, होली, दिवाली के जश्न होते हैं। लोग अपनी नई खुशियों और कामयाबियों के लिए यहाँ दुआ लेते हैं। नई कार या मोटरसाइकिल लेने पर लोग दरगाह में खुशी व्यक्त करने आते हैं। उर्स में राजस्थान, यूपी, गुजरात मध्यप्रदेश और दक्षिण भारत से लोग आते हैं। दरगाह मीर कुर्बान अली शाह सिर्फ़ इबादत की जगह नहीं है, बल्कि लोगों के बीच भाईचारे और मोहब्बत का केंद्र भी है। यहाँ हिन्दू और मुसलमान दोनों समुदाय मिलकर त्योहार मनाते हैं। बसंत, होली और दिवाली के दिन बाग़ में रंग-बिरंगे फूल, झंडे और रोशनियाँ सजाई जाती हैं। बच्चे हँसी-ख़ुशी खेलते हैं, महिलाएँ फूलों और दीयों से सजावट करती हैं, और मर्द अपने पारंपरिक लिबास में महफ़िल में शामिल होते हैं। हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे की झलक हर कदम पर नजर आती है। यह जगह एक घर जैसी लगती है, जहाँ हर कोई अपनापन और सुकून महसूस करता है।
नियाज़िया सिलसिला: बरेली से दुनिया तक
दरगाह का संबंध बरेली के नियाज़िया सिलसिले से है। जिसकी शाखाएँ यूरोप, मध्य-पूर्व,एशिया, बुखारा, समरकंद, अन्दीजान, सऊदी अरब, फ्रांस, स्पैन और जर्मनी तक फैली हैं। डॉ. नियाजी बताते हैं कि बरेली के बुजुर्गों के मार्गदर्शन से हमारा सिलसिला शुरू हुआ।
डॉ. सैय्यद हबीबुर्रहमान नियाजी: तालीम, सूफिज़्म और समाज सेवा में मिसाल
डॉ. सैय्यद हबीबुर्रहमान नियाजी की जिंदगी एक उजली मिसाल है, जहाँ तालीम, सूफिज़्म और समाज सेवा आपस में बुनकर एक जीवन-दर्शन बन गया है। राजस्थान में जन्मे, उन्होंने प्रोफेसर से लेकर डायरेक्टर तक कई उच्च शिक्षा के ओहदे संभाले और उर्दू अकादमी के सेक्रेटरी और चेयरमैन रहकर भाषा और साहित्य की सेवा की। उनकी लिखी नौ किताबों में उर्दू अदब और दीन-ए-इस्लाम की बातें शामिल हैं।
डॉ नियाजी का शुमार राजस्थान के नाम चीन शायरों में होता है उनकी ग़ज़लें फिल्मी गायकों जैसे जावेद हुसैन, मोहम्मद वकील, साबरी ब्रदर्स और पद्मश्री मोहम्मद हुसैन अहमद हुसैन के स्वर में भी गूँजी हैं। राजनीति में भी उनका असर रहा; राजस्थान कॉलेज से चुनाव जीतने वाले पहले मुसलमान होने का गौरव, यूथ कांग्रेस के जनरल सेक्रेटरी और कांग्रेस वर्किंग कमेटी जयपुर के सदस्य के रूप में उन्होंने लोकतांत्रिक सेवा में भूमिका निभाई। डॉ. हबीबुर्रहमान नियाजी ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी भी हैं, जो पूरे भारत की 800 दरगाहों के सज्जादानशीनों को जोड़ता है। इसके अलावा डॉ नियाजी क्रिकेट और बैडमिंटन के अच्छे खिलाडी रहे हैं। उनका मानना है कि सूफिज़्म सिर्फ़ धर्म का नहीं, बल्कि इंसानियत और भाईचारे का पैग़ाम है।
दरगाह की खिदमत में नौजवान कयादत: नायब सज्जादानशीन सैय्यद फैज़ुर रहमान नियाजी
सैय्यद फैज़ुर रहमान नियाजी, 36 वर्षीय युवा नायब सज्जादानशीन, दरगाह की खिदमत में पूरी तरह समर्पित हैं। उन्हें 2020 में उर्स के मौके पर उनके वालिद डॉ. सैय्यद हबीबुर्रहमान नियाजी ने जिम्मेदारी सौंपी। फैज़ुर रहमान ने दुनियावी नौकरी छोड़कर सूफ़ियाना रास्ता अपनाया। उनका बचपन अदबी माहौल में बीता। वालिद ने उन्हें तालीम के साथ-साथ तज़किया-ए-नफ़्स की तरबियत भी दी, ताकि वह न सिर्फ़ इस्लाम की रूहानी परंपराओं को समझें बल्कि उन्हें आगे बढ़ा सकें।
दरगाह की खिदमत में उनका दिन-रात एक जज़्बा और इमानी लगन से भरा रहता है। दुनियावी तालीम के लिहाज़ से वे एम.काम, एमबीए हैं। उनकी शादी 2016 में बरेली के खानकाह ए नियाज़िया के पांचवे सज्जादानशीन हज़रत हसनी मियां साहब की साहिबजादी से हुई, और उनके दो फूल मुनीबुर रहमान नियाजी और सय्यदा बद्र फ़ातिमा नियाजी, इस रूहानी सिलसिले को आगे बढ़ाने का प्रतीक हैं। फैज़ुर रहमान दरगाह की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक खिदमत में पूरी तरह सक्रिय हैं।
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जयपुर का यह हरा-भरा मीर जी बाग़, जहाँ दरगाह, मस्जिद, लाइब्रेरी और मदरसा साथ-साथ हैं, सिर्फ़ ईंट-पत्थर का जामा नहीं है। यहाँ का हर कोना तारीख़, रूहानी कैफ़ियत और भाईचारे की खुशबू से महकता है। जब चिराग़ रौशन होते हैं, मीलाद शरीफ़ गूंजती हैं और बाग़ की ठंडी हवा हर दिल को सुकून देती है, तो यूँ महसूस होता है जैसे वक़्त भी यहाँ ठहर सा गया हो।
यहाँ की विरासत सिर्फ़ पुरानी दास्तानों में नहीं, बल्कि हर मुस्कुराहट, हर दुआ और हर अकीदत में ज़िंदा है। डॉ. सैय्यद हबीबुर्रहमान नियाज़ी और उनके बेटे हाजी फैज़ुर रहमान नियाज़ी की सरपरस्ती में यह रूहानी विरासत नस्ल दर नस्ल आगे बढ़ती जा रही है। मीर जी बाग़ का असली पैगाम यही है, सच्ची विरासत नाम या ओहदों में नहीं होती, बल्कि खिदमत, तालीम, भाईचारे और रूहानी रौशनी में होती है। हर पत्थर, हर दरख़्त और हर रौशनी की किरन हमें यह याद दिलाती है कि असली उजाला वही होता है जो नस्लों तक फैलता रहे। यही इस दरगाह की मिटने न वाली निशानी और इसकी ज़िंदा पहचान है।