चांद दिखने पर विवाद क्यों हर साल उठता है, जानिए वजह

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 18-03-2026
Why Does a Controversy Over the Sighting of the Moon Arise Every Year? Find Out the Reason.
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जेबा नसीम

हर साल रमजान और ईद के आसपास एक सवाल बार बार सुनाई देता है। चांद कब दिखेगा। यह सवाल जितना सरल लगता है उतना है नहीं। इसके साथ ही बहस भी शुरू हो जाती है। कहीं हिलाल कमेटी पर सवाल उठते हैं तो कहीं अलग अलग मस्जिदों के फैसलों पर चर्चा होती है। लेकिन ईद आखिर हो ही जाती है। इसके बाद भी सवाल वही रहता है कि क्या कोई बेहतर तरीका हो सकता है।

दरअसल चांद देखने का मामला सिर्फ आंखों से देखने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे विज्ञान भी है और खगोलशास्त्र भी। आज के दौर में आधुनिक तकनीक इतनी आगे बढ़ चुकी है कि चांद के दिखने का समय पहले से बताया जा सकता है। फिर भी जमीन पर स्थिति अलग नजर आती है। इसका कारण परंपरा और विज्ञान के बीच संतुलन का सवाल है।

सदियों से नए चांद को नए महीने की शुरुआत माना जाता रहा है। इस्लामी कैलेंडर पूरी तरह चांद पर आधारित है। इसलिए रमजान की शुरुआत और ईद का दिन चांद दिखने पर तय होता है। यही वजह है कि इसका धार्मिक महत्व बहुत ज्यादा है। लेकिन समस्या तब आती है जब अलग अलग जगहों पर अलग अलग दिन चांद दिखाई देता है।

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि अमावस्या क्या होती है। अमावस्या वह स्थिति है जब चंद्रमा का वह हिस्सा जो पृथ्वी की तरफ होता है उस पर सूरज की रोशनी नहीं पड़ती। इस समय चांद दिखाई नहीं देता। कभी कभी इसी स्थिति में सूर्य ग्रहण भी हो सकता है लेकिन यह बहुत कम होता है।

अमावस्या के बाद चांद धीरे धीरे अपनी कक्षा में आगे बढ़ता है। जब वह थोड़ा सा आगे निकल जाता है तो उसका छोटा सा हिस्सा रोशन दिखाई देने लगता है। इसे ही हिलाल या नया चांद कहा जाता है। आमतौर पर यह अमावस्या के करीब 11 से 15 घंटे बाद दिखाई दे सकता है। लेकिन हर बार ऐसा हो यह जरूरी नहीं है।

चांद के दिखाई देने में कई फैक्टर काम करते हैं। सबसे अहम है उसका कोण। चांद को देखने के लिए उसे अपनी कक्षा में कुछ डिग्री आगे बढ़ना पड़ता है। अगर वह बहुत पास है तो वह नजर नहीं आएगा। इसके अलावा मौसम भी बड़ी भूमिका निभाता है। बादल हों तो साफ आसमान न होने की वजह से चांद नहीं दिखता।

एक और दिलचस्प बात है। कभी कभी चांद का जो हिस्सा अंधेरे में होता है वह भी हल्का सा चमकता हुआ दिखाई देता है। यह पृथ्वी से परावर्तित रोशनी की वजह से होता है। इसे स्थलीय प्रकाश कहा जाता है। यह नजारा बहुत सुंदर होता है लेकिन हर बार नहीं दिखता।

अब सवाल उठता है कि चांद हर जगह एक साथ क्यों नहीं दिखता। इसका जवाब पृथ्वी के आकार में छिपा है। पृथ्वी गोल है। अलग अलग जगहों से आसमान का नजारा अलग होता है। कहीं चांद क्षितिज के ऊपर होता है तो कहीं नीचे। इसलिए एक ही समय पर पूरी दुनिया में चांद देख पाना संभव नहीं होता।

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चंद्रमा की गति भी इस पूरे मामले को प्रभावित करती है। चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है। इसका एक चक्कर लगभग 27 दिन में पूरा होता है जिसे नक्षत्र अवधि कहा जाता है। लेकिन चंद्र मास करीब 29 दिन का होता है। इसका कारण यह है कि पृथ्वी भी सूरज के चारों ओर घूम रही होती है। इसलिए चांद को उसी स्थिति में लौटने में थोड़ा ज्यादा समय लगता है।

चंद्रमा की कक्षा सीधी नहीं है। यह करीब 5 डिग्री झुकी हुई है। इसी वजह से हर बार चांद अलग स्थिति में दिखाई देता है। साल के अलग अलग समय में इसका कोण बदलता रहता है। यही कारण है कि कभी चांद जल्दी दिख जाता है और कभी देर से।

इसके अलावा कुछ लंबे समय के बदलाव भी होते हैं। जैसे पृथ्वी की धुरी का झुकाव धीरे धीरे बदलता रहता है। चंद्रमा की कक्षा में भी हल्का बदलाव होता है। हालांकि यह बदलाव बहुत लंबे समय में असर डालते हैं लेकिन इनका असर पूरी तरह खत्म नहीं होता।

इन सभी कारणों की वजह से अलग अलग देशों में रमजान और ईद की तारीखें अलग हो जाती हैं। अगर किसी जगह चांद नहीं दिखता तो वहां अगला दिन रोजा रखा जाता है। जबकि दूसरी जगह उसी दिन ईद हो सकती है। यही वजह है कि हर साल यह बहस फिर से सामने आती है।

अब बड़ा सवाल यह है कि समाधान क्या है। क्या सिर्फ आंखों से चांद देखना जरूरी है या फिर वैज्ञानिक गणनाओं को भी मान्यता दी जानी चाहिए। कई देश अब खगोलीय गणनाओं का सहारा लेने लगे हैं। वहीं कई जगह अब भी पारंपरिक तरीके को ही सही माना जाता है।

असल में दोनों के बीच संतुलन बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती है। विज्ञान पहले से बता सकता है कि चांद कब दिखेगा। लेकिन अंतिम फैसला स्थानीय देखने पर ही निर्भर करता है। यही कारण है कि यह मुद्दा आज भी पूरी तरह हल नहीं हो पाया है।

फिलहाल इतना जरूर है कि चांद देखने की परंपरा सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक भी है। इसमें लोगों की भावनाएं जुड़ी होती हैं। इसलिए हर साल यह सवाल फिर उठता है और चर्चा भी होती है। और शायद यही इस परंपरा की खासियत भी है कि विज्ञान के दौर में भी यह बहस जिंदा है।