फरहान इसराइली / जयपुर
जोधपुर के 568वें स्थापना दिवस पर आयोजित भव्य समारोह में जब मेहरानगढ़ किले के म्यूजियम ट्रस्ट ने विरासत संरक्षण के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए जयपुर की आर्ट कंजर्वेटर मैमुना नरगिस को सम्मानित किया, तो यह केवल एक पुरस्कार समारोह नहीं था, बल्कि भारतीय कला और विरासत संरक्षण के लिए उनके वर्षों के समर्पण की पहचान भी थी। जोधपुर महाराज गज सिंह, महारानी हेमलता राजे, राज्यवर्धन सिंह राठोड और शाहपुरा रियासत के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में उन्हें 75 हजार रुपये, ट्रॉफी और सम्मान चिन्ह भेंट किए गए।
जयपुर के आमेर क्षेत्र में रहने वाली मैमुना नरगिस ने सदियों पुरानी पांडुलिपियों, जर्जर हो चुके रथों, धुंधली पड़ चुकी पेंटिंग्स और ऐतिहासिक इमारतों को नया जीवन देने का काम किया है। वे ऐसी शख्सियत हैं, जिन्होंने मिटती हुई विरासत को अपने हाथों से फिर जीवित किया।
मैमुना आज भारत की पहली और अब तक की इकलौती शिया मुस्लिम महिला आर्ट कंजर्वेटर के रूप में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले में जन्मीं मैमुना का जीवन बेहद साधारण माहौल में गुजरा, लेकिन उनके सपनों की उड़ान हमेशा बड़ी रही।
उनकी स्कूली शिक्षा मुरादाबाद जिले के बहजोई कस्बे में हुई। उनके पिता उत्तर प्रदेश पुलिस में कार्यरत थे और उन्होंने अपनी बेटी के हौसलों को हमेशा मजबूती दी। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद मैमुना ने अलीगढ मुस्लिम युनिवर्सिटी से फाइन आर्ट्स की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने म्यूजियोलॉजी में डिप्लोमा किया, जिसने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।
नेशनल म्यूजियम में सीखी कला की बारीकियां
म्यूज़ियोलॉजी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नेशनल म्यूज़ियम में काम करते हुए एमए इन कंजर्वेशन किया। इसके बाद भारत सरकार की ओर से आयोजित दो विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। पहला तीन महीने का वुडन ऑब्जेक्ट्स कंजर्वेशन कोर्स था, जबकि दूसरा ऑल टाइप पेंटिंग कंजर्वेशन का प्रशिक्षण था।
प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने इतिहास को सिर्फ पढ़ा नहीं, बल्कि उसे अपने हाथों से महसूस किया। सदियों पुराने दस्तावेज़, दुर्लभ पेंटिंग्स, लकड़ी की कलाकृतियां और पांडुलिपियां उनके सामने थीं, जिन्हें बचाने के लिए धैर्य, संवेदनशीलता और बेहद बारीक तकनीक की जरूरत थी।

किलों, पेंटिंग्स और ऐतिहासिक धरोहरों को फिर से जीवित किया
साल 2002 में उन्होंने जयपुर के जयगढ़ किले में आठ महीने तक क्यूरेटर के रूप में काम किया। यही वह दौर था, जहां से उनके कला संरक्षण के सफर ने वास्तविक आकार लिया। इसके बाद वे नई दिल्ली में देश के प्रसिद्ध चित्रकार जतिन दास के स्टूडियो से जुड़ीं।
वहां उन्होंने लगभग 100 कैनवास पेंटिंग्स का कंजर्वेशन किया। ये वे पेंटिंग्स थीं जो ग्राहकों के पास से क्षतिग्रस्त होकर वापस आई थीं। हालांकि यह राह बिल्कुल आसान नहीं थी। हिजाब पहनने वाली महिला होने के कारण कई बार लोगों ने उनकी क्षमता पर सवाल उठाए। कई बार मेहनत के बावजूद उन्हें भुगतान तक नहीं मिला। लेकिन मैमुना ने हर मुश्किल को अपने अनुभव और आत्मविश्वास की ताकत बना लिया।
उन्होंने अपनी संस्था आर्ट कंज़र्वेशन एंड रेस्टोरेशन हाउस के माध्यम से राजस्थान सहित देशभर में बड़े स्तर पर विरासत संरक्षण का कार्य किया। राजस्थान के करीब 16 संग्रहालयों में उन्होंने अलग-अलग प्रोजेक्ट्स पर काम किया। इनमें चार संग्रहालयों में पांडुलिपियों का संरक्षण, 10 संग्रहालयों में 6वीं से 13वीं शताब्दी की पत्थर की मूर्तियों का संरक्षण और दो संग्रहालयों में सिविल व पेंटिंग कंजर्वेशन शामिल है।
उन्होंने 2004 से 2007 तक नेशनल म्यूजियम की लैब में मुगलकालीन दुर्लभ ग्रंथों पर काम किया। इनमें बाबरनामा, अकबरनामा, जहांगीरनामा और शाहजहांनामा जैसी ऐतिहासिक पांडुलिपियां शामिल थीं। इसके अलावा उन्होंने ‘अलिफ लैला’ के मूल संस्करण का भी संरक्षण किया, जिसकी बीमा राशि करीब 36 करोड़ रुपये बताई गई।
कोटा म्यूजियम में उन्होंने 400 वर्ष पुरानी गीता का संरक्षण किया, जो कई टुकड़ों में टूट चुकी थी। उन्होंने उसके सभी हिस्सों को जोड़कर पीछे विशेष लाइनिंग दी। इसी संग्रहालय में 750 वर्ष पुरानी सोने से लिखी गई कुरान का भी संरक्षण किया।
जैसलमेर के लुद्रवा जैन मंदिर में उन्होंने लगभग 400 वर्ष पुराने लकड़ी के रथ को पुनर्जीवित किया। यह रथ दीमक से पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका था और उसकी लकड़ी मिट्टी में बदल रही थी। संरक्षण के बाद रथ दोबारा चलने की स्थिति में आ गया। उन्होंने मुंबई एयरपोर्ट पर लगी 200 वर्ष पुरानी ‘पालिताना’ पेंटिंग का भी संरक्षण किया। यह विशाल कैनवास पेंटिंग छोटे-छोटे टुकड़ों में फट चुकी थी, जिसे उन्होंने सावधानी से जोड़कर पुनर्स्थापित किया।
झालावाड़ के गढ़ पैलेस में उन्होंने दीवारों और छतों पर बनी प्राचीन पेंटिंग्स और प्लास्टर का संरक्षण किया। जहां कई ठेकेदारों ने पुराने प्लास्टर को हटाने की सलाह दी थी, वहीं उन्होंने मूल तकनीक से उसी ऐतिहासिक संरचना को सुरक्षित किया।

जयपुर इंटरनेशनल एअरपोर्ट पर उन्होंने राजस्थानी कला पर आधारित कई म्यूरल तैयार किए। इनमें हल्दीघाटी युद्ध का दृश्य, फड़ पेंटिंग, शीश महल शैली और नाहरगढ़ किले से प्रेरित कलाकृतियां शामिल हैं।
उन्होंने जयपुर के अल्बर्ट हॉल की फ्रेस्को कला और वहां संरक्षित मिनिएचर पेंटिंग्स का भी कंजर्वेशन किया।
इसके अलावा भरतपुर संग्रहालय में टैक्सिडर्मी जानवरों और अभ्रक (माइका) पर बनी 30 दुर्लभ मिनिएचर पेंटिंग्स को संरक्षित किया, जिन्हें उनके वरिष्ठ विशेषज्ञों ने भी बेहद कठिन माना था।उनके सबसे चुनौतीपूर्ण कार्यों में 1971 भारत-पाक युद्ध से जुड़े गुप्त दस्तावेजों का संरक्षण भी शामिल है। इसके अलावा उन्होंने सेना के कई प्रतिष्ठानों में टैक्सिडर्मी ट्रॉफियों, शेर, बाघ, अजगर और घड़ियाल जैसी संरक्षित खालों को भी पुनर्स्थापित किया।
उनका काम केवल संग्रहालयों तक सीमित नहीं रहा। मुंबई और दिल्ली एयरपोर्ट पर हेरिटेज कला संरक्षण से लेकर जयपुर एयरपोर्ट पर राजस्थानी शीशमहल कला, ग्लास पेंटिंग और म्यूरल आर्ट को आधुनिक स्थापत्य का हिस्सा बनाने तक उन्होंने भारतीय विरासत की खूबसूरती को नई पहचान दी।
वे राजस्थान, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में विरासत संरक्षण परियोजनाओं पर काम कर चुकी हैं। कानपुर स्थित जेके समूह के निजी संग्रहालय में भी उन्होंने विशेष संरक्षण कार्य किए।
मैमुना सिर्फ कला संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पारंपरिक भारतीय निर्माण कला को बचाने के अभियान में भी जुटी हैं। उनका मानना है कि चूना, सुरखी और अराइश प्लास्टर जैसी पारंपरिक सामग्री से बनी इमारतें सदियों तक टिकती हैं, जबकि आधुनिक सीमेंट की इमारतों की उम्र बहुत कम होती है। यही वजह है कि अब कई आर्किटेक्ट और उद्योगपति उनके सुझाव पर पारंपरिक निर्माण तकनीकों की ओर लौट रहे हैं।
वे महिलाओं की शिक्षा, कमजोर तबकों के अधिकार और विरासत संरक्षण को लेकर लगातार सेमिनार, वर्कशॉप और लेखों के माध्यम से लोगों को जागरूक करती रही हैं। उनका कहना है कि हेरिटेज सिर्फ सरकार की नहीं, समाज की भी जिम्मेदारी है। अगर हम अपनी विरासत नहीं बचाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान खो देंगी।

राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय सम्मान से हुई पहचान
पुरस्कारों की बात करें तो उन्हें अब तक 32 से अधिक सम्मान मिल चुके हैं। इनमें कई राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार शामिल हैं। वर्ष 2018 में कुरुक्षेत्र में आयोजित कार्यक्रम में उन्हें देश की 100 प्रतिभाशाली महिलाओं में शामिल कर सम्मानित किया गया। इसके अलावा University of Jammu और FICCI की ओर से भी उन्हें राष्ट्रीय सम्मान दिया गया। साथ ही विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थाओं ने भी उन्हें उनके संरक्षण कार्यों के लिए सम्मानित किया है।
आज भी मैमुना नरगिस मजदूरों के साथ खड़ी होकर खुद चूना तैयार करती हैं, दीवारों पर प्लास्टर करती हैं और धूल-धूप के बीच घंटों काम करती हैं। पुरुष प्रधान क्षेत्र में स्कैफोल्डिंग पर चढ़कर सदियों पुरानी कलाओं को फिर से जीवित करना आसान नहीं था।
लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो इतिहास को भी दोबारा जिंदा किया जा सकता है। मैमुना नरगिस सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, समर्पण और महिला सशक्तिकरण की मजबूत पहचान बन चुकी हैं। उनकी कहानी यह बताती है कि जुनून, मेहनत और हौसले के दम पर कोई भी इंसान इतिहास में अपनी अलग जगह बना सकता है।