ईरान चीनी युआन में तेल शुल्क चाहता है- क्या अमेरिकी पेट्रोडॉलर की शक्ति घट रही है?

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 08-05-2026
Iran wants oil tariffs in Chinese yuan – is the power of the US petrodollar waning?
Iran wants oil tariffs in Chinese yuan – is the power of the US petrodollar waning?

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली 

 
ईरान और अमेरिका द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में लगाए गए अवरोधों के बीच पिछले कुछ हफ्तों से जारी तनाव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह संकीर्ण समुद्री मार्ग इस संघर्ष के परिणाम में निर्णायक भूमिका निभा रहा है।

अमेरिका ने इस जलमार्ग से जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए ‘एस्कॉर्ट’ (सुरक्षा) व्यवस्था शुरू की है, लेकिन इस सैन्य गतिविधि के पीछे एक गहरा बदलाव देखा जा रहा है और वह यह कि फारस की खाड़ी में ऊर्जा सुरक्षा व्यवस्था तेज़ी से बदल रही है।
 
इस क्षेत्र से तेल, गैस, हीलियम और उर्वरक के वैश्विक प्रवाह को नियंत्रित करने की ईरान और अमेरिका दोनों की कोशिशों के साथ-साथ एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिका के एक प्रमुख सहयोगी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने ओपेक से खुद को अलग कर लिया है, जिसे तेल गठबंधन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
 
इसके अतिरिक्त, ईरान ने युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य में शुल्क (टैरिफ) लगाने की योजना की घोषणा की है।
 
चीन की मुद्रा में भुगतान की योजना
 
यदि यह टैरिफ लागू होता है, तो इससे ईरान को हर साल लगभग 40 से 50 अरब अमेरिकी डॉलर की आय हो सकती है। इससे वह अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के प्रभाव को कम कर सकता है।
 
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शुल्क चीनी मुद्रा युआन में वसूला जाएगा, न कि अमेरिकी डॉलर में। इससे ईरान और चीन के बीच आर्थिक संबंध और मजबूत हो सकते हैं और क्षेत्रीय तथा वैश्विक शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आ सकता है।
 
रिपोर्टों के अनुसार, चीन, भारत और जापान की ओर जाने वाले जहाजों द्वारा पहले ही इस तरह के भुगतान किए जा चुके हैं, और ईरान की संसद इस प्रक्रिया को औपचारिक बनाने पर काम कर रही है। ईरान ने क्रिप्टोकरेंसी में भुगतान स्वीकार करना भी शुरू किया है।
 
डॉलर का दबदबा 50 वर्षों से जारी
 
यदि ईरान यह शुल्क वसूलना जारी रखता है, तो इससे क्षेत्रीय प्रभाव अमेरिका से हटकर चीन और एशिया की ओर स्थानांतरित हो सकता है और वैश्विक तेल व्यापार में अमेरिकी डॉलर (पेट्रोडॉलर) की ऐतिहासिक श्रेष्ठता कमजोर हो सकती है।
 
पेट्रोडॉलर व्यवस्था की शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी, जब अमेरिका ने सऊदी अरब से सैन्य सहायता के बदले तेल को केवल अमेरिकी डॉलर में मूल्यांकित करने को कहा था। धीरे-धीरे यह व्यवस्था ओपेक देशों में फैल गई और वैश्विक तेल व्यापार का मानक बन गई।
 
इससे अमेरिकी डॉलर वैश्विक रिज़र्व मुद्रा बन गया और अमेरिका की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति मजबूत हुई। तेल निर्यातक देशों के पास बड़े पैमाने पर डॉलर का भंडार जमा हुआ, जिसे उन्होंने अमेरिकी प्रतिभूतियों और वैश्विक निवेशों में लगाया। इससे अमेरिका के वित्तीय घाटे को भी मदद मिली और उसकी उधारी लागत कम रही।
 
क्या नया वैश्विक आर्थिक मॉडल उभर रहा है?
 
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कतर, कुवैत और सऊदी अरब जैसे देश ईरान को “पेट्रोयुआन” (चीनी युआन में भुगतान) में शुल्क देते हैं, तो यह पेट्रोडॉलर व्यवस्था के धीरे-धीरे कमजोर होने का संकेत होगा।
 
अर्थशास्त्री एंटोनियो भारद्वाज के अनुसार, यह वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए एक वैकल्पिक ढांचे की ओर बदलाव का संकेत हो सकता है, जिसमें युआन एक प्रमुख मुद्रा बन सकती है।
 
कुछ विश्लेषकों के अनुसार, इससे वैश्विक तेल बाजार दो हिस्सों में बंट सकता है—एक ओर युआन आधारित व्यापार और दूसरी ओर डॉलर आधारित व्यापार, जिसमें लागत अधिक होगी।