चीन का पनडुब्बी मिसाइल परीक्षण, प्रशांत क्षेत्र में बढ़ी वैश्विक चिंता

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 14-07-2026
China's submarine missile test raises global concern in the Pacific region.
China's submarine missile test raises global concern in the Pacific region.

 

हांगकांग

चीन ने एक बार फिर अपनी सैन्य क्षमता का ऐसा प्रदर्शन किया है, जिसने एशिया प्रशांत क्षेत्र के कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। 6 जुलाई को चीन की परमाणु ऊर्जा से संचालित एक पनडुब्बी ने दक्षिण प्रशांत महासागर की ओर लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया। यह पहली बार है जब चीन की नौसेना ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में लगभग पूरी मारक क्षमता वाली पनडुब्बी से बैलिस्टिक मिसाइल दागने का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। इस घटनाक्रम ने चीन की बढ़ती सैन्य ताकत और उसकी रणनीतिक मंशा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, यह मिसाइल उत्तरी फिलीपींस और लूजोन जलडमरूमध्य के ऊपर से गुजरते हुए पलाऊ और गुआम के निकट से लगभग 7,300 किलोमीटर की दूरी तय कर दक्षिण प्रशांत के उस क्षेत्र में गिरी, जिसे परमाणु मुक्त क्षेत्र माना जाता है। चीन का कहना है कि मिसाइल में वास्तविक परमाणु हथियार नहीं था, बल्कि परीक्षण के लिए डमी वारहेड लगाया गया था।

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी के प्रवक्ता वरिष्ठ कैप्टन वांग शुएमेंग ने कहा कि यह वार्षिक सैन्य अभ्यास का नियमित हिस्सा था। उनके अनुसार, परीक्षण अंतरराष्ट्रीय कानून और प्रचलित नियमों के अनुरूप किया गया तथा संबंधित देशों को पहले ही सूचना दे दी गई थी। हालांकि कई रक्षा विशेषज्ञों ने इस दावे पर सवाल उठाए हैं।

विश्लेषकों का कहना है कि चीन ने बैलिस्टिक मिसाइल प्रसार के विरुद्ध बने हेग कोड ऑफ कंडक्ट के मानकों का पूरी तरह पालन नहीं किया। आरोप है कि बीजिंग ने परीक्षण की सूचना 24 घंटे से भी कम समय पहले कुछ चुनिंदा देशों को दी, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार विस्तृत जानकारी पहले से साझा की जानी चाहिए थी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि मिसाइल संभवतः चीन की टाइप 094 परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी से दागी गई। यही पनडुब्बी चीन की समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की रीढ़ मानी जाती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि परीक्षण में जेएल 2 या जेएल 3 पनडुब्बी से छोड़ी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइल का इस्तेमाल किया गया। हालांकि चीन ने आधिकारिक तौर पर मिसाइल के प्रकार की पुष्टि नहीं की है।

अमेरिका स्थित सीएनए कॉरपोरेशन के शोध विश्लेषक डेकर एवेलेथ का कहना है कि चीन एक साथ दो अलग अलग समुद्री क्षेत्रों में अपनी परमाणु पनडुब्बियों की संचालन क्षमता का अभ्यास कर रहा था। उनके अनुसार, यह केवल मिसाइल परीक्षण नहीं बल्कि परमाणु कमान, नियंत्रण और संचार प्रणाली की विश्वसनीयता जांचने की व्यापक सैन्य कवायद भी हो सकती है।

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के वरिष्ठ विशेषज्ञ टोंग झाओ का मानना है कि चीन अब अपनी रणनीतिक परमाणु क्षमता को पहले की तुलना में अधिक खुले तौर पर प्रदर्शित कर रहा है। उनके अनुसार, यह परीक्षण किसी नई तकनीक की जांच से अधिक परिचालन क्षमता का प्रदर्शन प्रतीत होता है।

यह भी उल्लेखनीय है कि सितंबर 2024 में चीन ने हैनान द्वीप से डीएफ 31बी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण किया था। दो वर्षों से भी कम समय में लंबी दूरी के दो बड़े मिसाइल परीक्षण इस बात का संकेत माने जा रहे हैं कि बीजिंग अपनी रणनीतिक सैन्य गतिविधियों की गति तेज कर रहा है।

कुछ विशेषज्ञों ने इस परीक्षण के समय को भी महत्वपूर्ण बताया है। यह अभ्यास अमेरिकी नेतृत्व वाले रिमपैक 2026 नौसैनिक युद्धाभ्यास की शुरुआत, रूस के साथ चीन के संयुक्त सैन्य अभ्यास और ऑस्ट्रेलिया तथा फिजी के नए रक्षा समझौते के समय हुआ। हालांकि कई विश्लेषकों का कहना है कि इसे केवल राजनीतिक संदेश मानना जल्दबाजी होगी, क्योंकि इस तरह के परीक्षणों की तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है।

ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट के कार्यकारी निदेशक जस्टिन बैसी का कहना है कि यह परीक्षण दिखाता है कि चीन अब अपने समुद्री प्रभाव को अपने तटों से बहुत दूर तक बढ़ाने की क्षमता विकसित कर रहा है। वहीं ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ डॉ. डोमिनिक मेघर का मानना है कि चीन और अमेरिका के मिसाइल परीक्षणों की प्रकृति अलग है, क्योंकि अमेरिका आमतौर पर सहयोगी देशों के साथ पूर्व निर्धारित व्यवस्था के तहत परीक्षण करता है, जबकि चीन ने यह परीक्षण ऐसे क्षेत्र में किया जहां कई छोटे प्रशांत देशों को सीमित जानकारी मिली।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अपने परमाणु शस्त्रागार का तेजी से विस्तार कर रहा है। अनुमान है कि पिछले छह वर्षों में उसके परमाणु हथियारों की संख्या 200 से बढ़कर 600 से अधिक हो गई है। अमेरिकी रक्षा विभाग का आकलन है कि वर्ष 2030 तक चीन के पास एक हजार से अधिक परमाणु वारहेड हो सकते हैं। ऐसे में यह मिसाइल परीक्षण केवल एक सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला घटनाक्रम माना जा रहा है।