सफ़ेद बर्फ़, खाकी वर्दी और मुकद्दस रोज़ा: सरहद पर सजदा करती भारतीय सेना की देशभक्ति

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 27-02-2026
White snow, khaki uniform and holy fast: The patriotism of the Indian Army prostrating at the border
White snow, khaki uniform and holy fast: The patriotism of the Indian Army prostrating at the border

 

मलिक असगर हाशमी/ नई दिल्ली

सफेद बर्फ की चादर से ढकी ऊँची पहाड़ियां और हाड़ कंपा देने वाली ठंड। इसी खामोश सन्नाटे के बीच एक आवाज गूँजती है। "रोज़ा भी रखेंगे, पहरा भी देंगे। फौजी हैं जनाब, अपना वादा पूरा करेंगे।" यह बोल फौजी साहिल के हैं। उनका यह वीडियो जब सोशल मीडिया पर आया तो हर हिंदुस्तानी का सिर गर्व से ऊँचा हो गया। तेरह से चौदह घंटे का कड़ा रोज़ा और हाथ में मुस्तैदी से थामी हुई राइफल। यह मंजर बताता है कि भारतीय सेना का मुसलमान सिपाही अपने फर्ज और अपने ईमान को कैसे एक धागे में पिरोता है।

f

सरहद की रखवाली करना कोई आसान काम नहीं है। जब पेट खाली हो और प्यास से गला सूख रहा हो, तब भी दुश्मन पर नजर टिकाए रखना लोहे के चने चबाने जैसा है। पर भारतीय सेना के ये जवान बड़ी शिद्दत से इस दोहरी जिम्मेदारी को निभा रहे हैं।

शहरों में रहने वाले आम रोजेदारों के लिए सेहरी और इफ्तार एक उत्सव जैसा होता है। घरों में दस्तरखान सजे होते हैं। मेजों पर पौष्टिक फल, दूध और ताज़ा खाना मौजूद होता है। लेकिन सरहद पर तैनात इन फौजियों की दुनिया एकदम जुदा है। फौजी अब्दुल जब्बार का एक वीडियो इन दिनों खूब वायरल हो रहा है।

वह अपनी बैरक में अपने साथियों के साथ बैठे हैं। थाली में कोई लजीज पकवान नहीं है। वह बहुत सादगी से कहते हैं कि आज उन्होंने बासी रोटी और बासी चावल खाकर रोज़ा रखा है। वह मुस्कुराते हुए जनता से कहते हैं कि भाइयों आप लोग भी सेहरी कर लो, हम तो इसी बासी खाने से अपना काम चला रहे हैं। यह सादगी और वतन के लिए कुछ भी सह जाने का जज्बा ही उन्हें दूसरों से अलग बनाता है। उनके लिए ताज़ा खाना नहीं बल्कि वतन की सलामती सबसे बड़ी खुराक है।

तमाम मुश्किलों और संसाधनों की कमी के बावजूद इन जवानों के चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखती। वे अपनी ड्यूटी की बीट पर तैनात हैं और बेहद खुश नज़र आते हैं। जवान कैफ ने अपने साथी मुकीम मेवात के बारे में बताया कि चढ़ाई वाली जगहों पर रोज़ा खोलना एक अलग ही अनुभव है। मुकीम के लिए पहाड़ों पर यह पहला रोज़ा थोड़ा कठिन रहा।

लेकिन शाम के पांच बजकर ग्यारह मिनट पर जब उन्होंने रोज़ा खोला तो सारी थकान जैसे काफूर हो गई। इन जवानों की हिम्मत ही है जो उन्हें इतनी ऊँचाइयों पर भी डटे रहने की ताकत देती है। यहाँ न कोई शिकायत है और न ही कोई थकान। बस एक ही धुन है कि सरहद पर परिंदा भी पर न मार सके।

सरहद की तन्हाई में जब मस्जिद की अज़ान सुनाई देती है तो जवानों का हौसला दोगुना हो जाता है। फौजी अर्तुल गाजी कहते हैं कि सुबह सवेरे जब अज़ान की आवाज पहाड़ों से टकराकर उनके कानों तक पहुँचती है तो उन्हें बहुत सुकून मिलता है। पास में मस्जिद होने का अहसास ही उन्हें मानसिक शांति देता है।

अर्तुल का बात करने का मेवाती अंदाज उनकी सादगी को और बढ़ा देता है। इसी तरह अरशद मेवात का एक वीडियो भी चर्चा में है। वे अपनी जीप पर गश्त कर रहे हैं और मोबाइल पर नात सुन रहे हैं। "या नबी मुझ पे भी एक निगाहे करम" के बोलों के बीच उनकी ड्यूटी जारी है। वे रोज़ा रखकर भी अपने काम को पूरी मस्ती और खुशी के साथ अंजाम दे रहे हैं। उनके लिए इबादत और ड्यूटी में कोई फर्क नहीं है।

सबसे खूबसूरत तस्वीर मोहम्मद सलीम के वीडियो में दिखती है। वह इफ्तार के समय अपने साथियों के साथ बैठे हैं। दरी पर उनके साथ अभय उस्ताद, गोविंद और सत्यवान भी नजर आ रहे हैं। सलीम बड़े चाव से अपने हिंदू साथियों का परिचय कराते हैं।

वे बताते हैं कि कैसे उनके ये साथी इफ्तार में उनके साथ शामिल होते हैं। यह दृश्य भारतीय सेना की उस एकता को दर्शाता है जहाँ मजहब की दीवारें गिर जाती हैं। यहाँ सिर्फ एक ही मजहब है और वह है 'वर्दी'। इफ्तार के फलों को साथ मिलकर बांटना यह संदेश देता है कि भारत की असली ताकत यही भाईचारा है। सलीम की खुशी उनके साथियों की मौजूदगी से और बढ़ जाती है।

d

सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो मौजूद हैं जो इन दिनों खूब देखे जा रहे हैं। इन सभी में एक बात बिल्कुल समान है। सभी जवान सेना की वर्दी में तैनात हैं। उन्होंने अपनी लोकेशन को गुप्त रखने के लिए वीडियो का एंगल बहुत समझदारी से चुना है। यह उनके पेशेवर अनुशासन को दिखाता है।

सबसे अहम बात जो दिल जीत लेती है वह वीडियो का अंत है। हर जवान 'अस्सलाम अलैकुम' के बाद 'जय हिंद' कहना कभी नहीं भूलता। वे दुनिया को यह बताना चाहते हैं कि मुसलमान होना और एक सच्चा भारतीय फौजी होना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनकी देशभक्ति उनके ईमान का ही एक हिस्सा है।

यह रिपोर्ट साबित करती है कि भारतीय सेना का हर सिपाही पहले एक हिंदुस्तानी है। उनके लिए देश की मिट्टी की खुशबू किसी भी इत्र से बढ़कर है। बासी रोटी खाकर सरहद पर खड़ा अब्दुल जब्बार हो या साथियों के साथ इफ्तार करता सलीम, ये सब भारत की साझा संस्कृति के रक्षक हैं।

उनकी वर्दी पर लगा तिरंगा उनके दिल की धड़कन है। वे बताते हैं कि सच्चा मुसलमान वही है जो अपने वतन की हिफाजत के लिए अपनी जान की भी परवाह न करे। ये वीडियो केवल क्लिप्स नहीं हैं बल्कि देशभक्ति के जीवंत दस्तावेज हैं। ये जवान आज के युवाओं के लिए मिसाल हैं कि फर्ज और अकीदा साथ-साथ कैसे निभाए जाते हैं।

आज जब देश रमजान की खुशियां मना रहा है, तब सरहद पर बैठा यह प्रहरी भूखा-प्यासा रहकर हमारी सलामती की दुआ कर रहा है। उनकी शहादत और उनका त्याग ही इस मुल्क की नींव को मजबूत करता है। इन फौजियों के 'जय हिंद' के नारे में जो गूँज है, वह हर दुश्मन के कलेजे को दहलाने के लिए काफी है। वे सिर्फ पहरा नहीं दे रहे हैं बल्कि वे भारत की एकता और अखंडता की जीती जागती कहानी लिख रहे हैं। उनकी देशभक्ति पर किसी को कोई शक नहीं हो सकता क्योंकि उन्होंने अपने खून और पसीने से वतन की मिट्टी को सींचा है।