जमुई का 'पुल मैन': मां की याद में पंचर जोड़ने वाले ने बना दिया नदी पर रास्ता

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 03-03-2026
Jamui's 'Bridge Man': A puncture repairer built a bridge over the river in memory of his mother.
Jamui's 'Bridge Man': A puncture repairer built a bridge over the river in memory of his mother.

 

आमिर इकबाल/ नई दिल्ली

बिहार की मिट्टी के बारे में एक बात मशहूर है कि यहाँ का आम इंसान जब कुछ ठान लेता है, तो वह इतिहास रच देता है। दशकों पहले दशरथ मांझी ने अपनी पत्नी के प्रेम में पहाड़ का सीना चीर दिया था। आज उसी बिहार के जमुई जिले में एक और 'मांझी' उभरा है। इनका नाम है सरफराज अंसारी। सरफराज ने किसी पहाड़ को तो नहीं काटा, लेकिन अपनी मां को खोने के दर्द को एक ऐसी ताकत में बदल दिया कि आज पूरा इलाका उन्हें सलाम कर रहा है।

जमुई जिले के झाझा प्रखंड के एक छोटे से गांव में रहने वाले सरफराज पेशे से पंचर बनाने वाले हैं। उनकी ज़िंदगी सुबह से शाम तक टायर और ट्यूब के बीच गुजरती है। मामूली सी दुकान और उससे होने वाली चंद रुपयों की कमाई से उनके घर का चूल्हा जलता है। उनके पास न तो अकूत संपत्ति थी और न ही सरकारी रसूख। लेकिन उनके पास एक बड़ा दिल और कुछ कर गुजरने का फौलादी जज्बा था।

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वह काली रात और मां का बिछड़ना

सरफराज की यह कहानी साल 2019 के मानसून से शुरू होती है। आसमान से आफत की बारिश हो रही थी। गांव के पास बहती नदी उफान पर थी। उसी दौरान सरफराज की मां की तबीयत अचानक बिगड़ गई। गांव में इलाज की सुविधा नहीं थी। शहर के अस्पताल जाने के लिए उस उफनती नदी को पार करना एकमात्र रास्ता था। नदी पर कोई पुल नहीं था। सरफराज ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी बीमार मां को गोद में उठाया और अंधेरी रात में उस जानलेवा लहरों के बीच उतर गए।

वे किसी तरह नदी पार कर अस्पताल पहुंचे। लेकिन वक्त को कुछ और ही मंजूर था। इलाज शुरू होने से पहले ही मां ने दम तोड़ दिया। सरफराज के पास सिर्फ उनकी यादें और एक गहरा पछतावा रह गया। उनके मन में बार-बार यही सवाल कौंधता कि अगर नदी पर पुल होता, तो शायद उनकी मां आज जिंदा होतीं। यह टीस उन्हें सोने नहीं देती थी। रात के सन्नाटे में उन्हें अपनी मां का चेहरा याद आता और उनकी आंखें भर आती थीं।

पंचर की दुकान से पुल का सफर

मां के इंतकाल के बाद सरफराज ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वे इस नदी पर पुल बनाएंगे ताकि किसी और को अपनी मां न खोनी पड़े। जब उन्होंने यह बात लोगों को बताई, तो कइयों ने उनका मजाक उड़ाया। लोगों का कहना था कि एक पंचर जोड़ने वाला इंसान करोड़ों का पुल कैसे बनाएगा? लोगों ने उन्हें सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने की सलाह दी। लेकिन सरफराज जानते थे कि सरकारी फाइलों को पहिए लगने में उम्र बीत जाती है। उन्होंने तय किया कि वे सरकार का इंतजार नहीं करेंगे।

सरफराज ने अपनी छोटी सी दुकान की कमाई से पैसा बचाना शुरू किया। जिस दिन ज्यादा काम होता, उस दिन वे अपनी बचत बढ़ा देते। कई बार उन्होंने खुद भूखे रहकर पैसे जोड़े लेकिन अपना संकल्प नहीं तोड़ा। महीनों की इस तपस्या के बाद जब कुछ रकम जमा हुई, तो उन्होंने गांव वालों के सामने अपना विजन रखा। उनकी ईमानदारी और जज्बे को देखकर गांव वाले भी भावुक हो गए। धीरे-धीरे कारवां बढ़ता गया। किसी ने अपनी मेहनत दी, तो किसी ने निर्माण सामग्री। यह पूरी तरह से एक जन-भागीदारी का प्रोजेक्ट बन गया।

40 गांवों की नई उम्मीद

आज जमुई की उस नदी पर एक मजबूत पुलिया खड़ी है। यह पुलिया 25 फीट लंबी, 13 फीट चौड़ी और 8 फीट ऊंची है। देखने में यह सीमेंट और सरिए का ढांचा लग सकता है, लेकिन यह करीब 40 गांवों के हजारों लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। अब बारिश के मौसम में लोगों को शहर जाने के लिए जान जोखिम में डालने की जरूरत नहीं पड़ती। बच्चों के लिए स्कूल की राह आसान हो गई है। किसान अब अपनी फसलें समय पर बाजार ले जा सकते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि अब कोई मरीज अस्पताल पहुंचने में देरी के कारण दम नहीं तोड़ेगा। सरफराज ने अपनी मां को जो श्रद्धांजलि दी है, उसका लाभ आज पूरा समाज उठा रहा है। स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि भी सरफराज के इस मानवीय कार्य की प्रशंसा कर रहे हैं। अधिकारी मानते हैं कि जो काम बड़े बजट की योजनाएं नहीं कर पाईं, वह एक साधारण इंसान की हिम्मत ने कर दिखाया।

बड़ा आदमी नहीं, बड़ा दिल चाहिए

सरफराज अंसारी आज भी अपनी उसी छोटी सी दुकान पर पंचर जोड़ते हैं। उनकी सादगी में कोई बदलाव नहीं आया है। वे कहते हैं कि वे कोई बड़े आदमी नहीं हैं। उनका मानना है कि इंसान को बड़ा होने के लिए पैसों की नहीं, बल्कि बड़े दिल की जरूरत होती है। मां को खोने का दुख उनके भीतर आज भी है, लेकिन जब वे किसी बीमार को उस पुल से सही सलामत गुजरते देखते हैं, तो उन्हें असीम सुकून मिलता है।

सरफराज के लिए यह पुल सिर्फ एक रास्ता नहीं है। वे इसे अपनी मां की याद में बनाया गया एक मंदिर मानते हैं। यह पुल इस बात का प्रमाण है कि अगर इंसान के इरादे नेक हों, तो वह बिना किसी बाहरी मदद के भी दुनिया बदल सकता है।

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साझी विरासत और भविष्य की राह

बिहार की इस धरती पर जहाँ दशरथ मांझी ने पहाड़ तोड़ा था, वहीं सरफराज ने पानी पर रास्ता बनाया है। यह दोनों कहानियां हमें सिखाती हैं कि प्रेम की शक्ति सबसे बड़ी होती है। सरफराज अंसारी के इस काम ने सामाजिक सहयोग की एक नई परिभाषा लिखी है। उन्होंने साबित कर दिया कि आत्मनिर्भरता और श्रमदान के जरिए बड़ी से बड़ी मुश्किल को हल किया जा सकता है।

आज सरफराज अंसारी का नाम पूरे बिहार में सम्मान के साथ लिया जा रहा है। उनकी यह पहल उन लोगों के लिए एक कड़ा जवाब है जो हर बात के लिए सरकार का मुंह ताकते हैं। सरफराज की कहानी आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। बिहार की इस माटी में सचमुच कुछ खास है, जहाँ एक आम इंसान भी इतिहास के पन्नों पर अपना नाम दर्ज करा देता है।