गुलाबी शहर की ‘रंगीन’ विरासत: तीन सदियों से साझा संस्कृति की महक बिखेरता गुलाल गोटा

Story by  फरहान इसराइली | Published by  [email protected] | Date 03-03-2026
The Pink City's 'colourful' heritage: Gulal Gota, a fusion of shared culture for three centuries
The Pink City's 'colourful' heritage: Gulal Gota, a fusion of shared culture for three centuries

 

फरहान इसराइली / जयपुर

जयपुर की सुबह जब फागुनी बयार के साथ अंगड़ाई लेती है, तो पुराने शहर की आबोहवा ही बदल जाती है। परकोटे की दीवारों पर जब सूरज की पहली किरण पड़ती है, तो गुलाबी शहर सिर्फ रंगों में नहीं नहाता, बल्कि अपनी तीन सौ साल पुरानी उस तहजीब को भी जी उठता है जो इसे दुनिया के बाकी शहरों से जुदा बनाती है। यहां होली महज एक कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि एक अहसास है—मिट्टी की सोंधी महक, लाख की चटक और हाथों के हुनर का एक ऐसा संगम, जो हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल बनकर हवाओं में गूँजता है।

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इस उत्सव की सबसे अनूठी पहचान है ‘गुलाल गोटा’। लाख से बनी यह नन्हीं सी गेंद जब किसी के बदन से टकराकर टूटती है, तो सिर्फ अबीर-गुलाल नहीं बिखरता, बल्कि सदियों पुरानी मुहब्बत और भाईचारे के रंग भी बिखर जाते हैं।

इस कहानी की बुनियाद साल 1727 में पड़ी, जब महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने अपनी दूरदर्शिता से जयपुर शहर का नक्शा खींचा। वह सिर्फ एक राजधानी नहीं बना रहे थे, बल्कि कला और कारीगरी का एक ऐसा केंद्र बसा रहे थे जहां हर हुनरमंद को सम्मान मिले। उन्होंने अलग-अलग विधाओं के माहिरों के लिए खास मोहल्ले तय किए।

इसी कड़ी में लाख के काम में उस्ताद ‘मनिहार’ समाज को बड़ी चौपड़ और त्रिपोलिया गेट के पास जगह दी गई, जो आज ‘मनिहारों का रास्ता’ के नाम से पूरी दुनिया में मशहूर है। दिलचस्प बात यह है कि इस मनिहार समाज में बड़ी तादाद मुस्लिम कारीगरों की थी। इन कारीगरों ने न केवल शहर की खूबसूरती में चार चाँद लगाए, बल्कि हिंदू त्योहारों की रौनक को अपनी कला से मुकम्मल किया।

मनिहारों के रास्ते की तंग गलियों में दाखिल होते ही आपको अहसास होगा कि आप इतिहास के किसी जीवित पन्ने पर चल रहे हैं। छोटी-छोटी दुकानों के बाहर लकड़ी के स्टूल पर बैठे कारीगर आज भी उसी शिद्दत से लाख को आग पर तपाते हैं, जैसे उनके पुरखे महाराजा के जमाने में किया करते थे।

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यहां मशीनों का शोर नहीं, बल्कि हाथों की सधे हुए स्पर्श का जादू चलता है। उस्मान और अब्दुल जमील जैसे कई कारीगरों के परिवारों की सात से दस पीढ़ियां इसी गलियारे में बीत गईं। उनके लिए यह सिर्फ रोजी-रोटी नहीं, बल्कि एक वसीयत है जिसे वे अपनी अगली पीढ़ी को सौंप रहे हैं। वे बताते हैं कि होली से दो महीने पहले ही उनके घर और दुकानें एक छोटे कारखाने का रूप ले लेती हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई गुलाल गोटे बनाने की इस रूहानी कवायद में जुट जाता है।

गुलाल गोटा बनने की प्रक्रिया किसी तपस्या से कम नहीं है। लाख के कारीगर बताते हैं कि सबसे पहले लाख को भट्ठी की आंच पर इतना गर्म किया जाता है कि वह मोम की तरह नर्म हो जाए। इसके बाद एक फूंकनी (खोखली नली) के जरिए उसमें बड़ी सावधानी से हवा भरी जाती है।

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यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई कांच की फुलाकर कलाकृति बनाता है। देखते ही देखते लाख की वह डली एक बेहद पतली और नाजुक गेंद का आकार ले लेती है। यह इतनी बारीक होती है कि एक हल्की सी आहट भी इसे तोड़ सकती है। जब यह ठंडी होकर सख्त हो जाती है, तो इसमें प्राकृतिक जड़ी-बूटियों से बना खुशबूदार और हर्बल गुलाल भरा जाता है। अंत में लाख की ही एक छोटी सी टिक्की से इसे सील कर दिया जाता है। इसकी खूबी यह है कि जब इसे किसी पर फेंका जाता है, तो यह बिना किसी को चोट पहुँचाए फूल की पंखुड़ी की तरह बिखर जाता है।

इस नायाब तोहफे के पीछे एक दिलचस्प ऐतिहासिक किस्सा भी है। कहा जाता है कि एक बार महाराजा ने मनिहार कारीगरों से फरमाइश की थी कि होली के लिए कुछ ऐसा बनाएं जो शाही शान के मुताबिक हो और प्रजा को भी पसंद आए। तब इन मुस्लिम कारीगरों ने गुलाल गोटा ईजाद किया।

होली के दिन जब महाराजा हाथी पर सवार होकर शहर के दौरे पर निकलते थे, तो वे अपनी प्रजा पर इन्हीं गोटों की बौछार करते थे। आज भी सिटी पैलेस के आंगन में जब शाही परिवार के सदस्य और मेहमान गुलाल गोटा से होली खेलते हैं, तो अतीत की वह गौरवशाली परंपरा जीवंत हो उठती है। यह दृश्य इस बात की गवाही देता है कि जयपुर की संस्कृति में धर्म की दीवारें कभी भी कला के आड़े नहीं आईं।

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आज के दौर में जब केमिकल रंगों और प्लास्टिक के गुब्बारों ने बाजारों को पाट दिया है, गुलाल गोटा अपनी शुद्धता और परंपरा के कारण एक बार फिर चर्चा में है। जयपुर से निकलकर इसकी महक अब मथुरा, वृंदावन, दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ और यहां तक कि विदेशों तक पहुँच रही है।

लोग अब पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं और इस ‘ईको-फ्रेंडली’ पारंपरिक होली को अपना रहे हैं। हालांकि, कारीगरों के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। लाख की कीमतें आसमान छू रही हैं और नई पीढ़ी इस मेहनत भरे काम से दूर भाग रही है, लेकिन मनिहारों के रास्ते के ये कलाकार हार मानने को तैयार नहीं हैं। उनके लिए यह गोटा सिर्फ एक उत्पाद नहीं, बल्कि उनकी साख और जयपुर का मान है।

गुलाल गोटा की असली खूबसूरती इसकी बनावट में नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपे पैगाम में है। यह उस जयपुर की आत्मा है जहां मंदिर के पास मनिहार की दुकान है और हिंदू त्योहार की खुशियां मुस्लिम कारीगरों की उंगलियों से तराशी जाती हैं।

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जब होली की दोपहर हवा में गुलाबी गुलाल उड़ता है, तो वह यह याद दिलाता है कि इमारतें तो वक्त के साथ पुरानी पड़ सकती हैं, लेकिन साझा संस्कृति और आपसी मुहब्बत के ये रंग कभी फीके नहीं पड़ते। तीन सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी पूरी दुनिया को यही सबक दे रही है कि कला और त्यौहार जब आपस में मिलते हैं, तो नफरत की कोई गुंजाइश नहीं बचती। जयपुर की इस तंग गली से निकला यह छोटा सा गोला वास्तव में हमारी साझी विरासत का सबसे बड़ा सिपाही है।