फरहान इसराइली, जयपुर | मधुकर पांडेय, लखनऊ
मुहर्रम की 10वीं तारीख पर राजस्थान की राजधानी जयपुर और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गम, अकीदत और सदियों पुरानी परंपराओं का ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने हजारों लोगों को भावुक कर दिया। दोनों शहरों की सड़कों पर निकले ताजियों और अलम के जुलूसों में बड़ी संख्या में अकीदतमंद शामिल हुए। "या हुसैन" की सदाओं, मातमी नौहों और सीना जनी के बीच इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों को खिराजे अकीदत पेश की गई।
जयपुर में अलग अलग इलाकों से करीब 300 छोटे बड़े ताजियों के जुलूस निकले। यह जुलूस छोटी चौपड़, बड़ी चौपड़, हवामहल बाजार, चांदी की टकसाल, सुभाष चौक और जोरावर सिंह गेट से होते हुए रामगढ़ मोड़ स्थित कर्बला मैदान पहुंचे। परंपरा के अनुसार अधिकांश ताजियों को सुपुर्द ए खाक किया गया। हालांकि शहर के दो ऐतिहासिक ताजिए हर साल की तरह इस बार भी सुरक्षित वापस इमामबाड़े और सिटी पैलेस में रख दिए गए।
जयपुर का शाही ताजिया आज भी आस्था का सबसे बड़ा केंद्र
जयपुर का शाही ताजिया शहर की सबसे बड़ी पहचान माना जाता है। इसका निर्माण वर्ष 1868 में तत्कालीन महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय ने करवाया था। यह ताजिया पूरे वर्ष सिटी पैलेस में सुरक्षित रखा जाता है और केवल मोहर्रम की 9 और 10 तारीख को आम लोगों के दीदार के लिए बाहर लाया जाता है।
इतिहासकार बताते हैं कि महाराजा ने मोहर्रम की परंपरा को राजकीय संरक्षण दिया था। उन्होंने दो शाही ताजिए बनवाए जो आज भी जयपुर की साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं। यह देश के उन विरले ताजियों में शामिल है जिनका निर्माण किसी हिंदू शासक ने कराया था। यही वजह है कि इसे गंगा जमुनी तहजीब और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है।
बताया जाता है कि इस ताजिए के निर्माण में करीब 10 किलो सोना और 60 किलो चांदी का उपयोग किया गया था। महीन नक्काशी, पारंपरिक कारीगरी और ऐतिहासिक स्वरूप आज भी लोगों को आकर्षित करता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु त्रिपोलिया गेट पहुंचकर इसके दीदार करते हैं और अपनी अकीदत पेश करते हैं।
बीमारी से जुड़ी मन्नत और शाही ताजिए की कहानी
स्थानीय खिदमतगारों के अनुसार महाराजा सवाई राम सिंह द्वितीय एक समय गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। उस दौरान एक मुस्लिम फकीर ने उन्हें ताजिया बनवाने की मन्नत मानने की सलाह दी। स्वस्थ होने के बाद महाराजा ने अपनी मन्नत पूरी करते हुए इस शाही ताजिए का निर्माण कराया। तभी से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है।
मुहर्रम की 10वीं तारीख को यह ताजिया अन्य ताजियों के साथ कर्बला मैदान तक जाता है, लेकिन इसे दफ्न नहीं किया जाता। रस्म पूरी होने के बाद इसे फिर से सिटी पैलेस में सुरक्षित रख दिया जाता है।
महावतान का ताजिया भी विरासत की अनमोल निशानी
घाट गेट स्थित महावतान मोहल्ले का सोने चांदी और ज़री का ताजिया भी जयपुर की ऐतिहासिक धरोहर माना जाता है। करीब 158 वर्ष पुराने इस ताजिए का मूल ढांचा आज भी सुरक्षित है। इसे हर साल नया नहीं बनाया जाता बल्कि उसी पुराने चंदन के ढांचे पर पारंपरिक तरीके से सजावट की जाती है।
महावतान बिरादरी के युवा शाहनवाज़ लाला बताते हैं कि यह ताजिया वर्ष 1868 में जयपुर रियासत की ओर से उनकी बिरादरी को सौंपा गया था। तब से इसकी देखरेख स्थानीय लोग करते आ रहे हैं। समय के साथ यदि कहीं ज़री खराब हो जाती है तो उसे ठीक कर दिया जाता है, लेकिन मूल स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जाता।
मुहर्रम की 7 से 9 तारीख तक यहां दूर दूर से लोग मन्नत लेकर पहुंचते हैं। कई परिवार पीढ़ियों से इस परंपरा को निभा रहे हैं। मुहर्रम की 10 तारीख को जोहर की नमाज के बाद पूरे सम्मान के साथ ताजिया उठाया जाता है। परंपरा के अनुसार इसे 21 हाथियों की सलामी दी जाती है। इसके बाद मनकबत, नात और सलातो सलाम पढ़ते हुए जुलूस आगे बढ़ता है।
इस ताजिए पर कुरआन की आयतें अंकित हैं। इसकी सजावट में सुर्खाब पक्षी के पंख भी लगाए जाते हैं। यही इसकी सबसे अलग पहचान है।
गले मिलने की रस्म भी बनी आकर्षण
जयपुर के मुहर्रम की एक खास परंपरा ताजियों के गले मिलने की रस्म भी है। मुहर्रम की 9 और 10 तारीख को तोपखाने के ताजिए और इमाम चौक के ताजिए को आमने सामने लाकर स्पर्श कराया जाता है। इसे आपसी सम्मान और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है।शहर के जुलाहों का सोने चांदी का ताजिया, तोपखाने का चांदी का ताजिया, तकिया यकीन शाह मस्जिद का ताजिया और सिटी पैलेस का शाही ताजिया भी लोगों की आस्था के प्रमुख केंद्र बने रहे।
वीडियो | राजस्थान: मुहर्रम पर जयपुर में सोने-चांदी की शाही ताजिया की अनोखी परंपरा
— पीटीआई न्यूज_भाषा (@PTINews_Bhasha) June 26, 2026
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हर धर्म के लोग पहुंचे अकीदत पेश करने
जयपुर में मुहर्रम के दौरान केवल मुस्लिम समुदाय ही नहीं बल्कि हिंदू और अन्य धर्मों के लोग भी बड़ी संख्या में ताजियों के दीदार के लिए पहुंचे। श्रद्धालुओं ने फूल, मोली और तबर्रुक चढ़ाकर अपनी मन्नतें मांगीं। यही दृश्य शहर की सदियों पुरानी साझा संस्कृति और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करता है।
लखनऊ में अलविदाई मजलिस के बाद निकला अलम का जुलूस
उधर लखनऊ के विक्टोरिया स्ट्रीट स्थित इमामबाड़ा नाजिम साहब में अलविदाई मजलिस आयोजित हुई। मौलाना कल्बे जवाद ने अपने संबोधन में कहा कि अजादारी जनाबे फातिमा जहरा की तमन्ना का नाम है। उन्होंने कहा कि जनाबे फातिमा को यह चिंता थी कि उनके बच्चों के गम में कौन आंसू बहाएगा। तब रसूल ने फरमाया था कि एक ऐसी कौम आएगी जो हमेशा हुसैन का गम मनाएगी।
मौलाना ने जब छह महीने के हजरत अली असगर की शहादत का जिक्र किया तो मजलिस में मौजूद हजारों लोग गम से रो पड़े। पूरे इमामबाड़े में मातम और नौहाख्वानी का माहौल बन गया।
लखनऊ--10-मोहर्रम पर पारंपरिक मातमी जुलूस निकाला गया. अकीदतमंदों ने मातम करते हजरत इमाम हुसैन (अस.) और कर्बला के शहीदों को याद किया. इमाम हुसैन का पैगाम इंसानियत,, अमन और एकता का पैगाम है,, उनकी कुर्बानी ने मजहब,, जाति,, फिरकों की दीवारों को तोड़कर पूरी इंसानियत को संदेश दिया..ll pic.twitter.com/fPEX1IhBT9
— 🇮🇳 Farhan Irakee . (@FarhanIrakee) June 26, 2026
हजारों लोगों ने किया अलम का इस्तकबाल
मजलिस समाप्त होते ही मोहम्मद मुर्तजा अलविदाई अलम लेकर इमामबाड़े से बाहर निकले। अलम के दीदार और उसे चूमने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़ पड़े। अलम के आगे आगे अकीदतमंद सीना जनी और जंजीरों का मातम करते हुए चल रहे थे।
यह जुलूस अकबरी गेट, नक्खास, बिलोचपुरा चौराहा, गिरधारी सिंह इंटर कॉलेज, मंसूर नगर तिराहा, रौजा ए काजमैन और कर्बला दिया नतुद्दौला से होकर रौजा शबीहे नजफ की ओर रवाना हुआ। पूरे मार्ग पर पुलिस और प्रशासन की ओर से सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे।
मुहर्रम के अवसर पर जयपुर और लखनऊ की यह तस्वीर केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं थी। यह उन परंपराओं की भी याद दिलाती है जो सदियों से लोगों को इतिहास, इंसानियत, साझा संस्कृति और भाईचारे के सूत्र में जोड़ती आ रही हैं।