बासित जरगर/श्रीनगर
दक्षिण कश्मीर के पुलवामा जिले का परिगाम गांव इन दिनों बादाम की बहार से गुलजार है। यहाँ के बादाम के बागों में स्थानीय किसान इन दिनों अपनी फसल की कटाई में व्यस्त नजर आ रहे हैं। कश्मीर घाटी की कृषि संस्कृति और ग्रामीण जीवनशैली में बादाम की खेती का बहुत पुराना और गहरा स्थान रहा है। हर साल गर्मियों के इन दिनों में यह पारंपरिक नजारा यहाँ की आबोहवा में एक अलग ही रौनक ले आता है।

धूप के बीच खेतों में मेहनत करते किसान
मौसम की सुस्ती के बीच, चिलचिलाती धूप में किसान बादाम के पेड़ों के बीच कतारों में खड़े दिखाई देते हैं। पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल करते हुए, वे लंबे लकड़ी के डंडों से पेड़ों की शाखाओं को बड़े करीने से हिलाते हैं।
पेड़ों के नीचे बड़े-बड़े कपड़े या चादरें बिछाई जाती हैं, जिन पर पके हुए बादाम गिरते हैं। परिवार के सभी सदस्य मिलकर इन बादामों को इकट्ठा करते हैं, उनकी छंटाई करते हैं और उन्हें सुरक्षित बोरियों में भरते हैं।
यह पूरी प्रक्रिया महीनों की कड़ी मेहनत का परिणाम होती है।वसंत ऋतु के दौरान पेड़ों पर आने वाले फूलों से इस चक्र की शुरुआत होती है। इसके बाद पूरी गर्मी के मौसम में दाने विकसित और परिपक्व होते हैं।अगस्त का महीना आते-आते बादाम पूरी तरह तैयार हो जाते हैं, और किसान बिना किसी आधुनिक मशीनरी के, पुरानी और पारंपरिक पद्धतियों के सहारे अपनी फसल को पेड़ों से नीचे उतारते हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका का मुख्य साधन
यहाँ के अधिकांश बादाम उत्पादकों के लिए यह कटाई सिर्फ एक कृषि कार्य नहीं है, बल्कि उनकी आजीविका और मौसमी आमदनी का सबसे बड़ा जरिया है।जब चादरों पर बादाम गिर जाते हैं, तो किसान उन्हें इकट्ठा करके पत्तियों और टहनियों जैसी अशुद्धियों से अलग करते हैं।
इसके बाद उपज को अच्छी तरह साफ किया जाता है और धूप में सुखाया जाता है। सुखाने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, इस बेहतरीन फसल को स्थानीय बाजारों में बेचने के लिए भेजा जाता है या भविष्य के अच्छे दामों के लिए सुरक्षित रख लिया जाता है।

जलवायु परिवर्तन और बदलते मौसम की मार
पुलवामा ऐतिहासिक रूप से कश्मीर के सबसे प्रमुख बादाम उत्पादक क्षेत्रों में से एक माना जाता रहा है। हालांकि, पिछले कुछ सालों में यहाँ के बागवानों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
मौसम के बदलते मिजाज, तापमान में उतार-चढ़ाव, कम मुनाफे और सेब की खेती के तेजी से बढ़ते दायरे ने बादाम उद्योग को संकट में डाल दिया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, कश्मीर में बादाम की खेती का कुल रकबा तेजी से सिकुड़ रहा है। किसान कम रिटर्न और प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के कारण दूसरी फसलों, खासकर सेब की ओर रुख कर रहे हैं।
इस साल भी शुरुआती महीनों में किसानों ने समय से पहले पेड़ों पर फूल आने को लेकर गहरी चिंता जताई थी।उनका कहना है कि मौसम में हो रहे इन अनचाहे बदलावों का सीधा असर पौधों के विकास और फलत पर पड़ता है।तापमान बढ़ने के कारण इस बार फसल समय से काफी पहले पककर तैयार हो गई, जिससे किसानों को अपनी कटाई भी जल्दी शुरू करनी पड़ी।
चुनौतियों के बावजूद परंपरा कायम
इन तमाम मुश्किलों और प्रशासनिक उपेक्षा की शिकायतों के बावजूद, परिगाम के किसान अपनी विरासत और बादाम के बागों को सहेजने में जुटे हैं। पेड़ों की डालियों को डंडों से पीटने, चादरों से बादाम बीनने और उन्हें छांटने का यह पारंपरिक दृश्य हर साल गर्मियों में परिगाम की मिट्टी में लौट आता है।

यहाँ के स्थानीय किसानों के लिए यह कटाई का सीजन पूरे साल के कठिन परिश्रम का फल पाने का वक्त होता है।इसके साथ ही यह समय इस बात पर मंथन करने का भी है कि आने वाले समय में कश्मीर में बादाम की खेती का भविष्य किस दिशा में जाएगा, और कैसे इस पुरानी थाती को बचाया जा सके।