आवाज द वाॅयस / नई दिल्ली
नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में आयोजित दिल्ली वर्ल्ड बुक फेयर में इस वर्ष खुसरो फ़ाउंडेशन का स्टॉल खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.। साहित्य, संस्कृति, धर्म और आधुनिक वैचारिक विमर्श को जोड़ने वाली खुसरो फ़ाउंडेशन की पुस्तकों ने लेखकों, शोधकर्ताओं, छात्रों और विचारकों का विशेष ध्यान खींचा।
मौलाना आज़ाद उर्दू यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डॉ. उमैर मंज़र ने खुसरो फ़ाउंडेशन के स्टॉल का दौरा करने के बाद कहा कि यह संस्था भारत की सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, भाषाई और साहित्यिक परंपराओं को आगे बढ़ाने की एक सराहनीय कोशिश कर रही है।
उन्होंने कहा कि खुसरो फ़ाउंडेशन की किताबों को केवल साहित्य के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे वैचारिक प्रयास के तौर पर देखा जाना चाहिए, जहाँ साहित्य, सभ्यता और संस्कृति के बीच संवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। साथ ही, धार्मिक दृष्टिकोण से जटिल और संवेदनशील विषयों पर गंभीर सोच-विचार की परंपरा को भी मजबूत किया जा रहा है।
डॉ. मंज़र के अनुसार, खुसरो फ़ाउंडेशन द्वारा चुने गए विषय न केवल गहन अध्ययन और विवेक के साथ प्रस्तुत किए गए हैं, बल्कि पाठकों के बीच इनकी उल्लेखनीय माँग भी देखने को मिल रही है। उन्होंने बताया कि स्टॉल पर आने वाले लोग खास तौर पर उन पुस्तकों में रुचि दिखा रहे हैं, जो धर्म, आधुनिकता और भारतीय साझा संस्कृति के बीच सेतु का काम करती हैं।
वर्ल्ड बुक फेयर में खुसरो फ़ाउंडेशन द्वारा प्रदर्शित और चर्चित पुस्तकों में मुस्लिम विद्वानों का हिंदू धर्म का अध्ययन, मेरे वतन की खुशबू, तिरंगा आँचल, हज गाइड, मुहम्मद दारा शिकोह और हिंदुस्तान उर्दू शायरी के हवाले से जैसी अहम कृतियाँ शामिल हैं। ये किताबें न केवल ऐतिहासिक और वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि आज के सामाजिक संदर्भों में भी गहरी प्रासंगिकता रखती हैं।
खुसरो फ़ाउंडेशन की आधुनिक इस्लामी विचारधारा और सकारात्मक वैचारिक नैरेटिव पर आधारित पुस्तकों को विशेष रूप से लेखकों, शोधकर्ताओं, छात्रों और ओपिनियन मेकर्स के बीच सराहा जा रहा है। दिल्ली स्थित यह संस्था उर्दू, हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण साहित्य प्रकाशित करने के लिए जानी जाती है, जिसका उद्देश्य देश की विविधता में एकता को मजबूत करना और समाज को वैचारिक रूप से जोड़ना है।
बुक फेयर के दौरान फ़ाउंडेशन ने कई प्रतिष्ठित लेखकों की पुस्तकों का लोकार्पण किया और उन पर विचार-विमर्श तथा परिचर्चाओं का आयोजन भी किया। इन चर्चाओं में धर्म, आधुनिकता, समाज और आपसी संवाद जैसे विषयों पर गंभीर और संतुलित बहस देखने को मिली।
खुसरो फ़ाउंडेशन के स्टॉल पर जिन पुस्तकों की सबसे अधिक माँग देखी गई, उनमें तुर्की लेखक मुस्तफ़ा अक्योल की चर्चित पुस्तक Reconstruction of Muslim Mind का उर्दू अनुवाद मुस्लिम अज़हान की तश्कील-ए-नौ, तिरंगा आँचल, मोहम्मद मुश्ताक तिजारवी द्वारा अनूदित दारा शिकोह की हिंदी पुस्तक, और हिंदुस्तान उर्दू शायरी के हवाले से प्रमुख हैं।
बुक फेयर के दौरान प्रो. अफ़शर आलम, कुलपति, जामिया हमदर्द द्वारा लिखित Reopening Muslim Minds के विमोचन के अवसर पर खुसरो फ़ाउंडेशन ने “इस्लाम और आधुनिकता” विषय पर एक पैनल चर्चा का आयोजन किया। इस परिचर्चा में फ़ाउंडेशन के निदेशक डॉ. शांतनु मुखर्जी और सिराजुद्दीन क़ुरैशी सहित अन्य वक्ताओं ने धर्म और आधुनिकता के बीच संतुलन, संवाद और पुनर्व्याख्या की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।
Glance at the World Book Fair,2026
— Khusro Foundation ख़ुसरो फ़ाउण्डेशन خسرو فاؤنڈیشن (@Khusrofounda) January 16, 2026
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पुस्तक विमोचन के बाद अंतर-धार्मिक संवाद पर एक गहन और सार्थक चर्चा हुई, जिसने श्रोताओं को गहराई से सोचने के लिए प्रेरित किया। फ़ाउंडेशन ने इस अवसर पर सभी अतिथियों और लेखकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
खुसरो फ़ाउंडेशन के संयोजक डॉ. हफ़ीज़ुर रहमान ने आवाज़-द वॉयस से बातचीत में बताया कि उनकी पुस्तकों का एक विशिष्ट पाठक वर्ग है, जिसमें विचारक, शोधकर्ता और छात्र शामिल हैं। उन्होंने कहा कि फ़ाउंडेशन द्वारा प्रकाशित कई किताबें ऐसी भाषाओं और विषयों पर हैं, जो आमतौर पर बाज़ार में उपलब्ध नहीं होतीं।
Visitors exploring Khusro Foundation’s rich collection of literature at the World Book Fair, engaging with ideas of culture, and dialogue.
— Khusro Foundation ख़ुसरो फ़ाउण्डेशन خسرو فاؤنڈیشن (@Khusrofounda) January 16, 2026
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डॉ. हफ़ीज़ुर रहमान के अनुसार, पाठक न केवल पुस्तकों में किए गए गहन शोध की सराहना कर रहे हैं, बल्कि उनकी प्रोडक्शन क्वालिटी और प्रस्तुति से भी प्रभावित हैं। उनका मानना है कि खुसरो फ़ाउंडेशन का प्रयास आने वाले समय में भारतीय बौद्धिक और सांस्कृतिक विमर्श को एक नई दिशा देगा।
कुल मिलाकर, दिल्ली वर्ल्ड बुक फेयर में खुसरो फ़ाउंडेशन की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि गंभीर, शोध-आधारित और संवादपरक साहित्य की आज भी गहरी ज़रूरत और माँग है, और यही प्रयास भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत को और मजबूत करता है।