निज़ामुद्दीन से देवा शरीफ तक, मोहब्बत के फूलों की होली

Story by  अर्सला खान | Published by  [email protected] | Date 04-03-2026
Unique Holi of Hazrat Nizamuddin Auliya and Deva Sharif
Unique Holi of Hazrat Nizamuddin Auliya and Deva Sharif

 

अर्सला खान/ नई दिल्ली

होली को रंगों का त्योहार कहा जाता है, लेकिन देश की कुछ सूफी दरगाहों में यह त्योहार फूलों की खुशबू के साथ मनाया जाता है। यहाँ गुलाल और पानी की जगह गुलाब और गेंदे की पंखुड़ियाँ उड़ती हैं। यह परंपरा केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रेम, भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की जीवंत मिसाल है। दिल्ली की मशहूर दरगाह Dargah Hazrat Nizamuddin Auliya और उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में स्थित Deva Sharif Dargah में खेली जाने वाली फूलों की होली इसी संदेश को आगे बढ़ाती है।
 
हज़रत Nizamuddin Auliya चिश्ती सिलसिले के महान सूफी संत थे। उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इंसानियत, मोहब्बत और सेवा का संदेश दिया। उनकी दरगाह पर होली के मौके पर खास आयोजन होता है। दरगाह परिसर को फूलों से सजाया जाता है। सूफी कलाम और कव्वाली की महफिल सजती है। जब “आज रंग है री…” जैसे मशहूर सूफी गीत गूंजते हैं, तो माहौल आध्यात्मिक आनंद से भर जाता है। इसके बाद अकीदतमंद एक-दूसरे पर फूलों की पंखुड़ियाँ डालकर होली खेलते हैं।

इस परंपरा के पीछे एक लोकप्रिय मान्यता जुड़ी है। कहा जाता है कि अमीर खुसरो, जो हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के प्रिय शिष्य थे, एक बार अपने पीर को उदास देखकर चिंतित हुए। उसी समय उन्होंने कुछ महिलाओं को होली खेलते देखा। वे भी रंग और फूल लेकर अपने गुरु के पास पहुंचे और उन्हें खुश करने के लिए होली का गीत गाया। यह दृश्य देखकर हज़रत मुस्कुराए। तभी से दरगाह में होली मनाने की परंपरा शुरू हुई। यहाँ रंगों की जगह फूलों का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है, ताकि त्योहार की खुशी भी बनी रहे और दरगाह की पवित्रता भी कायम रहे।

फूलों की होली का अर्थ केवल उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रेम का प्रतीक है। सूफी संतों का मानना था कि ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता इंसान से होकर जाता है। जब लोग बिना भेदभाव के एक-दूसरे पर फूल डालते हैं, तो वह इस बात का संकेत है कि दिलों में नफरत नहीं, केवल मोहब्बत होनी चाहिए।

इसी तरह बाराबंकी के देवा शरीफ में भी होली के दिन खास रौनक रहती है। यह दरगाह सूफी संत हाजी वारिस अली शाह से जुड़ी है। Barabanki के इस ऐतिहासिक स्थल पर होली के मौके पर बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं। यहाँ भी पहले चादरपोशी और दुआ का सिलसिला होता है, फिर सूफियाना कलाम के बीच फूलों की होली खेली जाती है।

देवा शरीफ में फूलों की होली के पीछे मान्यता है कि सूफी संतों ने हमेशा इंसानों को जोड़ने का काम किया। उनके दर पर किसी धर्म या जाति का भेदभाव नहीं होता। होली जैसे बड़े हिंदू त्योहार पर दरगाह में फूलों की होली खेलना इस बात का संदेश देता है कि त्योहार केवल किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि सभी का होता है। यहाँ हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग एक साथ शामिल होते हैं। कई श्रद्धालु मानते हैं कि इस दिन दरगाह में हाजिरी लगाने से आपसी रिश्तों में मिठास बढ़ती है और मन की मुराद पूरी होती है।

होली का असली संदेश बुराई पर अच्छाई की जीत और प्रेम का विस्तार है। दरगाहों में जब फूल उड़ते हैं, तो यह संदेश और भी गहरा हो जाता है। यहाँ कोई होड़ नहीं होती, न ही दिखावा। बस दुआ, मुस्कान और भाईचारे का माहौल होता है। आज के दौर में जब समाज को एकता की जरूरत है, तब निज़ामुद्दीन औलिया और देवा शरीफ की फूलों वाली होली हमें याद दिलाती है कि सच्चा रंग वही है जो दिलों को जोड़ दे। रंग भले सूख जाएँ, लेकिन फूलों की खुशबू और मोहब्बत का संदेश हमेशा बना रहता है। यही इन दरगाहों की होली की असली पहचान है।