फरहान इसराइली/ जयपुर
मोहर्रम से एक दिन पहले मातमी धुनों के साथ ताजियों का जुलूस निकाला जाता है. मोहर्रमके 10वें दिन यौम-ए- आशूरा पर कर्बला में ताजियों को सुपुर्द खाक किया जाता है.राजधानी जयपुर में 300से अधिक ताजिए हर साल निकाले जाते हैं.हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में अकीदत के फूल पेश करते हुए जयपुर में पिछले 250 साल से ताजिये निकाले जा रहे हैं.
ताजियेदार सालभर मेहनत करके ताजिये तैयार करते हैं ताकि मुहर्रम की 10 तारीख को इमाम हुसैन की शहादत की याद में ताजिये निकाल कर खिराजे अकीदत पेश की जा सके.गुलाबी नगरी जयपुर अकेली ऐसे जगह है जहां सोने चांदी के ताजिये निकाले जाते हैं.
राजधानी को देशभर में सोने-चांदी के ताजियों लिए भी जाना जाता है.वो भी कोई हल्के-फुल्के नहीं बल्कि कई मण वज़न वाले सोने- चांदी के ताजिये यहां मौजूद हैं.इसकी शुरुआत जयपुर के महाराजा सवाई रामसिंह के वक्त हुई.इतिहासकारों और जानकारों के मुताबिक,एक बार सवाई रामसिंह बेहद बीमार हुए तो उनके सलाहकार ने उन्हें ताजिये की मन्नत के बारे में बताया.
तब उन्होंने मन्नत मांगी.मन्नत पूरी होने पर डेढ़ मण सोने-चांदी का ताजिया बनवाया.175साल से इस ताजिये को हर साल मोहर्रम पर 5दिन बाहर निकाला जाता है.इसी ताजिये की तर्ज पर मोहल्ला महावतानऔर मोहल्ला जुलाहान ने भी सोने चांदी के ताजिए बनवाये हैं.
हालांकि उनका वजन जयपुर दरबार के ताजिये से कम है.इन सभी ताजियों का प्रदर्शन ताजियों के जुलूस के साथ किया जाता है.इनकी खास सुरक्षा की जाती है, लेकिन इन्हें सुपुर्द-ए-खाक़ नहीं किया जाता.गुलाबी नगरी जयपुर जहां अपने तहजीब और संस्कृति के लिए देशभर में जाना जाता है, वहीं यहां की गंगा-जमुनी तहजीब भी लोगों के लिए एक मिसाल है.
जयपुर के पूर्व राजपरिवार की ओर से यहां बनाए गए सोने और चांदी के ताजिये आज भी मुहर्रम के मौके पर निकाले जाते हैं.इन्हें करबला के मैदान तक ले जा कर वापस इमामबाड़े में रख दिया जाता है.
हिंदू-मुस्लिम दोनों की आस्था का केंद्र है ताजिए
पुरानी मान्यता है कि ताजियों के बनाने के दौरान जयपुर शहर समेत अन्य कई शहरों में हिंदू समुदायके लोग ताजियों के बनाने के दौरान प्रसाद चढ़ाते हैं.इस प्रसाद की एवज में ताजिया बनाने के दौरान वहां बैठे मौलवी उनको ताबीज या काला डोरा देते हैं जो खास तौर पर बच्चों के बांधे जाते हैं.
कहा जाता है कि इस काले डोरे के बांधे जाने के बाद बच्चों को ऊपरी बलाएं नहीं लगती हैं.उनको नजर भी नहीं टिकती.इसके अलावा ताजियों के जुलूस निकलने के दौरान हिंदू लोग अपने छोटे बच्चों को लेकर ताजियों के नीचे से निकलते हैं.दो से तीन बार ऐसा ही किया जाता है जिससे ऊपरी हवाएं नहीं लगती.मुस्लिम समाज के लोग भी इसी तरह करते हैं.हालांकि इस दौरान भारी पुलिस बंदोबस्त रहता है.जयपुर शहर की बात की जाए तो चारदीवारी में ताजिया निकालने के दौरान हर बार ऐसा ही होता है.