पुणे के निंबूत गांव में मुस्लिम जोड़े ने राम को चढ़ाया चांदी मुकुट

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 02-04-2026
Muslim Couple Offers Silver Crown to Lord Rama in Pune's Nimbut Village
Muslim Couple Offers Silver Crown to Lord Rama in Pune's Nimbut Village

 

 भक्ति चालक

आजकल जब हम सुबह अखबार खोलते हैं या सोशल मीडिया स्क्रॉल करते हैं, तो अक्सर जाति और धर्म के नाम पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े गुट, नफरत भरे भाषण और नफरत की राजनीति देखने को मिलती है। समाज में धर्म की दीवारें इतनी ऊंची हो गई हैं कि पड़ोसी किस धर्म का है, इसी बात से उसके साथ बर्ताव करने का तरीका तय किया जाने लगा है। ऐसे खराब माहौल में महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में आने वाले निंबूत गांव में घटी एक घटना बहुत सुकून देने वाली है।

पुणे ज़िले के बारामती तालुका में निंबूत नाम का एक छोटा सा गांव है, जिसने हाल ही में एक ऐसा काम किया है जिसकी चर्चा पूरे महाराष्ट्र और देश में होनी चाहिए। हाल ही में जब पूरे देश में रामनवमी का जश्न मनाया गया, उसी दौरान निंबूत में एक मुस्लिम जोड़े ने भगवान श्रीराम की मूर्ति पर चांदी का मुकुट चढ़ाकर एक नया इतिहास रच दिया है।

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आखिर घटना क्या है?

रामनवमी हिंदू धर्म का एक बहुत ही पवित्र त्योहार है, जिस दिन भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव मनाया जाता है। निंबूत गांव में हाल ही में बने खूबसूरत राम मंदिर में इस साल की रामनवमी बहुत खास रही, क्योंकि मंदिर में राम दरबार, राधा-कृष्ण और हनुमान जैसी कुल सात भव्य मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। हाल ही में गुज़री इस रामनवमी के मौके पर इन मूर्तियों के सिर पर चांदी के नक्काशीदार मुकुट चढ़ाने का एक खास कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

आम तौर पर ऐसे धार्मिक कामों में उसी धर्म के मुखियों या पुजारियों को यह सम्मान दिया जाता है, लेकिन निंबूत में इस रिवायत को तोड़ते हुए एक क्रांतिकारी कदम उठाया गया। गांव के तौफीक शाबुद्दीन सय्यद और उनकी पत्नी परवीन सय्यद को भगवान श्रीराम की मूर्ति पर मुकुट चढ़ाने का सम्मान दिया गया। एक मुस्लिम जोड़े द्वारा हिंदुओं के आराध्य देवता की इस तरह से सेवा करना, आज के दौर में बहुत ही नायाब और उतना ही अहम है, और इस नज़ारे को देखने के लिए पूरा गांव एक साथ जमा हुआ था।

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इस तारीखी बदलाव के पीछे की सोच

इस बेमिसाल घटना के पीछे सतीश शिवाजीराव काकड़े की दूरदृष्टि और सोच है, जो गांव की तरक्की के लिए हमेशा आगे रहते हैं। किसानों के मसले सुलझाना और गांव में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखना उनका असल मकसद है। उन्होंने यह बात समझ ली कि गांव की तरक्की करते वक्त सिर्फ सड़कें और पानी ही नहीं, बल्कि लोगों के दिलों को जोड़ना भी बहुत ज़रूरी है।

काकड़े ने गांव में ‘एक मंदिर और एक मस्जिद’ की मुहिम चलाई है, और इस सोच के पीछे अपना मकसद साफ करते हुए वह एक अहम बात कहते हैं। वह कहते हैं, “नेता लोग चुनाव आते ही वोटों के लिए जातिवाद फैलाते हैं और लोगों को गुमराह करते हैं, लेकिन मेरी नज़र में मंदिर क्या और मस्जिद क्या, सबका ईश्वर एक ही है। ईश्वर धर्म नहीं देखता, वह सिर्फ आस्था देखता है, यही बात मुझे साबित करनी थी और इसीलिए मैंने तय किया कि अगर मस्जिद और मंदिर अगल-बगल हो सकते हैं, तो उनके त्योहार भी एक-दूसरे के हाथों से मनाए जा सकते हैं।”

काकड़े की इस सोच को सीधे सत्ता से ताकत मिली, क्योंकि इन दोनों इमारतों को बनाने के लिए दिवंगत नेता अजित पवार ने भारी फंड दिया था। मस्जिद के लिए 55 लाख और राम मंदिर के लिए 60 लाख रुपये के सरकारी फंड का इस्तेमाल करके, उसमें गांव वालों और खुद काकड़े ने भी अपनी तरफ से पैसे मिलाए। आज निंबूत में 80 लाख की मस्जिद और 85 लाख का राम मंदिर एक-दूसरे के अगल-बगल बहुत ही शान से खड़े हैं।

यह मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा पल है”

मूर्ति पर मुकुट चढ़ाने वाले तौफीक सय्यद के पास इस तजुर्बे को बयान करने के लिए लफ्ज़ कम पड़ रहे थे। वह बताते हैं कि आज के समाज में लोग एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों की तरफ देखने से भी डरते हैं, ऐसे माहौल में गांव की तरफ से एक मुस्लिम परिवार को दिया गया यह सम्मान बहुत बड़ा है।

अपने जज़्बात बयान करते हुए तौफीक कहते हैं, “समाज में जाति-पाति की हद पार कर चुकी राजनीति देखकर डर लगता है, लेकिन मेरे गांव में हमने कभी कोई भेदभाव महसूस नहीं किया। जब मुझे पता चला कि पत्नी के साथ श्रीराम की मूर्ति पर मुकुट चढ़ाने का सम्मान मिलने वाला है, तो पल भर के लिए मुझे यकीन ही नहीं हुआ। लेकिन जब मैंने असल में वह काम किया, तब मुझे एहसास हुआ कि भारत को ऐसा ही होना चाहिए और यह मेरी पूरी ज़िंदगी की सबसे अविस्मरणीय बात है। निंबूत गांव ने जो मिसाल कायम की है, वह पूरे महाराष्ट्र के लिए एक बड़ी प्रेरणा बनेगी।”

सभी धर्मों के लोग रहते हैं मिलजुलकर

निंबूत में सिर्फ मंदिर और मस्जिद ही अगल-बगल नहीं हैं, बल्कि वहां हर मज़हब के लोग आपस में बहुत ही प्यार और भाईचारे से रहते हैं। हाल ही में गुज़री रामनवमी के इस मौके पर गांव के धनगर, माली, गोसावी, वडारी और मुस्लिम समाज के सात जोड़ों को मूर्तियों पर मुकुट चढ़ाने का खास सम्मान दिया गया।

इस घटना की अहमियत पर ज़ोर देते हुए सतीश काकड़े खास तौर पर बताते हैं कि दिसंबर 2015 में जब इस मंदिर और मस्जिद का उद्घाटन हुआ था, तब अजित पवार और नवाब मलिक एक ही मंच पर मौजूद थे। एक ही दिन दोनों इमारतों का उद्घाटन होने की यह देश की शायद पहली ही घटना रही होगी। वह फख्र से कहते हैं, “कुछ लोग कहते हैं राम मंदिर अच्छा बना है, कुछ कहते हैं मस्जिद अच्छी बनी है, लेकिन मुझे इस बात की तसल्ली है कि मैंने दोनों इमारतें बिल्कुल एक जैसी और बराबर बनाई हैं।”

मूर्तियों के ज़रिए महापुरुषों के विचार

सतीश काकड़े ने इस सफर को सिर्फ धार्मिक स्थलों तक ही सीमित नहीं रखा है, बल्कि आने वाले सितंबर महीने में वह गांव में महापुरुषों की पांच ब्रॉन्ज़ की मूर्तियां लगवाने वाले हैं। इनमें महात्मा ज्योतिबा फुले, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर और दिवंगत नेता अजित पवार शामिल हैं। इन महापुरुषों ने ज़िंदगी भर बराबरी और विज्ञान की सोच को बढ़ावा दिया, और वही सोच निंबूत के नौजवानों में जगाना उनका असल मकसद है।

निंबूत गांव की यह घटना सच में समाज के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल है, क्योंकि आज के दौर में जब राजनीति इंसानों को घर-घर में बांटने का काम कर रही है, तब निंबूत जैसे गांव देश को बराबरी की राह दिखाने का काम करते हैं। तौफीक सय्यद और उनकी पत्नी के हाथों चढ़ाया गया राम का वह मुकुट आज हिंदुस्तानी एकता की एक बड़ी निशानी बन गया है।

महाराष्ट्र में संतों की एक बहुत बड़ी रिवायत रही है, जहां ज्ञानेश्वर, तुकाराम और नामदेव ने हमेशा बराबरी का विचार लोगों के सामने रखा। सतीश काकड़े ने निंबूत में जो पहल की है, वह इन्हीं संतों के विचारों की एक शानदार विरासत है। भेदभाव खत्म हुए बिना समाज की तरक्की नहीं हो सकती, यह पैगाम निंबूत ने पूरी दुनिया को दिया है। निंबूत का यह 'राम-रहीम' मॉडल अगर हर गांव में अपनाया गया, तभी महाराष्ट्र में बढ़ रहे मज़हबी नफरत के ज़हर को कम किया जा सकेगा और महाराष्ट्र सही मायनों में एक तरक्कीपसंद राज्य बनेगा।