धर्म नहीं, सोच बनाती है इंसान को आज़ाद : इतिहासकार प्रोफेसर एस. इरफ़ान हबीब

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 04-04-2026
It is not religion, but thought that liberates the human being: Historian Professor S. Irfan Habib
It is not religion, but thought that liberates the human being: Historian Professor S. Irfan Habib

 

आवाज द वाॅयस/नई दिल्ली

भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का नाम आते ही जेहन में एक गंभीर विद्वान और राष्ट्रवादी नेता की तस्वीर उभरती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक दौर ऐसा भी था जब मौलाना अपनी विरासत में मिली धार्मिक समझ से पूरी तरह असंतुष्ट हो गए थे। वे लगभग सत्रह महीने तक मजहब से एक तरह की दूरी बनाकर रहे। यह उनके जीवन का वह समय था जब वे खुद को और अपने विश्वास को नए सिरे से तलाश रहे थे। इस तलाश ने उन्हें इस्लाम की एक ऐसी आधुनिक व्याख्या तक पहुँचाया जिसमें रटने के बजाय सोचने और अंधभक्ति के बजाय सवाल करने पर ज़ोर था।

मशहूर इतिहासकार प्रोफेसर एस. इरफ़ान हबीब ने हाल ही में "दीन और दुनिया" पॉडकास्ट में मौलाना के जीवन के इन अनछुए पहलुओं पर रोशनी डाली। साक़िब सलीम के साथ हुई इस बातचीत में यह बात साफ तौर पर निकलकर आई कि मौलाना आज़ाद धर्म को इंसान की बेड़ी नहीं बनाना चाहते थे। उनका मानना था कि मजहब को इंसान पर इस कदर हावी नहीं होना चाहिए कि उसकी अपनी सोचने की क्षमता ही खत्म हो जाए। उनके लिए दीन का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं था। उनके लिए इसमें दुनियावी मसले और व्यावहारिक जीवन भी समान रूप से शामिल थे।

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मौलाना आज़ाद का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ विद्वत्ता रग-रग में बसी थी। उनके पिता मौलाना ख़ैरुद्दीन एक बड़े आलिम थे। उन्होंने अरब देशों में अपनी तालीम पूरी की थी। आज़ाद ने कभी किसी फॉर्मल स्कूल या कॉलेज का मुंह नहीं देखा। उनकी सारी शिक्षा घर पर ही हुई। यही वजह थी कि वे एक "सेल्फ मेड" विद्वान बने। बचपन से ही उनमें पढ़ने और चीज़ों की गहराई में जाने की ज़बरदस्त ललक थी। लेकिन इसी गहराई ने उन्हें परंपराओं पर सवाल उठाने के लिए मजबूर किया।

प्रोफेसर हबीब बताते हैं कि मौलाना के पिता वहाबियत के सख्त खिलाफ थे। वे चाहते थे कि उनका बेटा ऐसे शिक्षकों से पढ़े जो इस विचारधारा से कोसों दूर हों। पिता की इस कड़ाई और सावधानी ने आज़ाद को एक संतुलित नज़रिया दिया। हालांकि एक समय ऐसा आया जब आज़ाद के मन में विद्रोह उमड़ा। वे पारंपरिक धार्मिक ढांचे से करीब डेढ़ साल तक अलग रहे। जब वे वापस लौटे तो उनके पास एक नई सोच थी। उन्होंने कहा कि हाफ़िज़ वह है जो सिर्फ रटता है लेकिन आलिम वह है जो असल मायने में समझता है। वे चाहते थे कि हर मुसलमान कुरआन को सीधे समझे।

शिक्षा और विज्ञान को लेकर मौलाना के विचार क्रांतिकारी थे। वे सर सैयद अहमद ख़ान से काफी प्रभावित थे। उन्होंने अपने पिता से छिपकर सर सैयद की किताबें पढ़ीं क्योंकि उनके पिता सर सैयद को पसंद नहीं करते थे। मौलाना का मानना था कि कुरआन एक नैतिक और धार्मिक किताब है। यह जीवन जीने का रास्ता दिखाती है। लेकिन यह विज्ञान की किताब नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि विज्ञान को अलग से और आधुनिक तरीके से ही पढ़ा जाना चाहिए। धर्म का काम नैतिकता सिखाना है और विज्ञान का काम दुनिया को समझना है।

राजनीति में आने के बाद मौलाना के विचार सर सैयद से थोड़े अलग हो गए। वे सर सैयद की अंग्रेज़ों से नजदीकी और कांग्रेस से दूरी को सही नहीं मानते थे। मौलाना आज़ाद का सबसे बड़ा हथियार "संयुक्त राष्ट्रवाद" का सिद्धांत था। वे भारत को एक ऐसे गुलदस्ते की तरह देखते थे जहाँ हर फूल की अपनी खुशबू हो। उन्होंने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे का डटकर विरोध किया। प्रोफेसर हबीब कहते हैं कि मौलाना नाकाम नहीं हुए। उनकी कामयाबी यह है कि उन्होंने करोड़ों मुसलमानों को यह यकीन दिलाया कि भारत ही उनका घर है।

विभाजन के समय मौलाना आज़ाद ने मुस्लिम लीग की उस बात को सिरे से खारिज कर दिया कि वे ही मुसलमानों की एकमात्र आवाज़ हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि बड़ी संख्या में मुसलमान संयुक्त भारत के पक्ष में हैं। उन्होंने मुसलमानों से कहा कि वे इस मुल्क की साझा संस्कृति का हिस्सा बनें। डरे नहीं बल्कि अपनी पहचान के साथ यहाँ जिएं।

जब आज़ाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री बने तो उनके सामने पहाड़ जैसी चुनौतियां थीं। उन्हें एक ऐसा देश मिला जहाँ 85प्रतिशत लोग अनपढ़ थे। शिक्षा का कुल बजट सिर्फ एक लाख रुपये था। उनके पास सिर्फ शिक्षा नहीं बल्कि विज्ञान और संस्कृति मंत्रालय की भी जिम्मेदारी थी। वे जानते थे कि पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाए बिना देश आगे नहीं बढ़ सकता। उन्होंने संविधान सभा में लड़ाई लड़ी कि बजट का कम से कम दस प्रतिशत हिस्सा शिक्षा पर खर्च होना चाहिए।

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मौलाना आज़ाद का सबसे बड़ा संदेश "संतुलन" था। वे चाहते थे कि लोग दीन और दुनिया के बीच एक बैलेंस बनाकर चलें। धर्म को निजी आस्था तक रहना चाहिए। उसे सार्वजनिक प्रगति और रोजगार के आड़े नहीं आना चाहिए। उनके अनुसार शिक्षा और सामाजिक सद्भाव ही किसी भी समाज की असली ताकत है। आज के दौर में जब धर्म के नाम पर दूरियां बढ़ रही हैं मौलाना की सोच और भी प्रासंगिक हो गई है।

वे एक ऐसे भारत का सपना देखते थे जहाँ बराबरी हो। जहाँ किसी के साथ उसके मजहब की वजह से भेदभाव न हो। आज भारत में जो भी बड़ी शैक्षिक संस्थाएं हम देख रहे हैं उनमें कहीं न कहीं मौलाना की दूरदर्शिता छिपी है। वे सिर्फ एक धार्मिक नेता नहीं थे। वे एक महान दार्शनिक और राष्ट्र निर्माता थे। प्रोफेसर इरफान हबीब के साथ यह बातचीत हमें याद दिलाती है कि मौलाना आज़ाद की विरासत को संभालना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। उनकी सोच हमें एक बेहतर और जागरूक नागरिक बनने की प्रेरणा देती है।