अयोध्या के शरीफ चाचा: इंसानियत की बड़ी मिसाल

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 04-04-2026
The True Face of Humanity: The Untold Story of Ayodhya's Padma Shri Mohammad Sharif
The True Face of Humanity: The Untold Story of Ayodhya's Padma Shri Mohammad Sharif

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

अयोध्या की संकरी गलियों से निकलकर पूरी दुनिया को इंसानियत का असली अर्थ समझाने वाले मोहम्मद शरीफ (जिन्हें लोग प्यार से “शरीफ चाचा” कहते हैं) आज एक ऐसी मिसाल बन चुके हैं, जो धर्म, जाति और पहचान की सीमाओं से कहीं ऊपर है। एक साधारण साइकिल मैकेनिक से सामाजिक कार्यकर्ता बने इस व्यक्ति ने अपने जीवन के 25 से अधिक वर्षों को उन लोगों के नाम कर दिया, जिनका इस दुनिया में कोई अपना नहीं बचा था।

अयोध्या पुलिस लाइन क्षेत्र के मोहल्ला खिड़की अली बेग में स्थित उनके साधारण से घर तक पहुंचने वाली संकरी लेकिन साफ-सुथरी गली उनके सादगीपूर्ण जीवन की कहानी खुद बयां करती है। नीले रंग की दीवारों वाले इस घर पर लगी एक छोटी सी पट्टिका यह बताने के लिए काफी है कि यह किसी आम व्यक्ति का नहीं, बल्कि पद्म श्री सम्मान से नवाजे गए एक असाधारण इंसान का घर है।

एक पिता के दर्द से जन्मी सेवा की मिसाल

मोहम्मद शरीफ की जिंदगी में सबसे बड़ा मोड़ लगभग 28 साल पहले आया, जब उनका 25 वर्षीय बेटा मोहम्मद रईस सुल्तानपुर गया और फिर कभी वापस नहीं लौटा। हफ्तों की तलाश के बाद एक पुलिसकर्मी उनके घर आया और एक कमीज़ दिखाकर बताया कि वह उनके बेटे की है। यह जानकर परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा कि उनके बेटे की हत्या कर दी गई थी और उसकी लाश को लावारिस समझकर गोमती नदी में बहा दिया गया।

इस घटना ने शरीफ के जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्होंने उसी दिन प्रण लिया कि अब उनके शहर में कोई भी लावारिस शव बिना सम्मान के नहीं छोड़ा जाएगा। उन्होंने तय किया कि चाहे मृतक किसी भी धर्म का हो, उसका अंतिम संस्कार उसी धर्म के रीति-रिवाजों के अनुसार पूरे सम्मान के साथ किया जाएगा।

5,000 से ज्यादा अंतिम संस्कार—इंसानियत की मिसाल

आज तक शरीफ चाचा लगभग 5,500 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं, जिनमें करीब 3,000 हिंदू और 2,500 मुस्लिम शामिल हैं। वह यह सुनिश्चित करते हैं कि हर व्यक्ति को उसके धर्म के अनुसार अंतिम विदाई मिले—हिंदुओं के लिए दाह संस्कार और मुसलमानों के लिए दफन।

स्थानीय प्रशासन की एक व्यवस्था के तहत, यदि 72 घंटे तक किसी शव पर कोई दावा नहीं करता, तो उसे शरीफ को सौंप दिया जाता है। अंतिम संस्कार के लिए आवश्यक खर्च वह समाज से चंदा जुटाकर पूरा करते हैं। कई बार उन्हें रात के 2 बजे भी अस्पताल या पुलिस से कॉल आती है, और वे तुरंत मदद के लिए तैयार हो जाते हैं। उनके घर में हमेशा कफन और अन्य आवश्यक सामग्री तैयार रहती है।

समाज की उपेक्षा से सम्मान तक का सफर

आज भले ही उन्हें समाज में सम्मान और पहचान मिल रही हो, लेकिन यह सफर आसान नहीं था। करीब 15 साल पहले लोग उन्हें अछूत मानते थे, उनके साथ बैठकर खाना खाने से भी कतराते थे। कई लोग उन्हें “पागल” या “जल्लाद” कहकर ताना मारते थे। लेकिन शरीफ चाचा ने कभी हार नहीं मानी और अपने मिशन पर डटे रहे। उन्होंने शवों को श्मशान तक पहुंचाने के लिए ठेले खरीदे और खुद उन्हें खींचकर ले जाते थे। आज भी उनके पास उन लावारिस लोगों की तस्वीरों और रिकॉर्ड का एक बड़ा संग्रह है, जिनका उन्होंने अंतिम संस्कार किया।

 

 
 

 

 
 
 
 
 

 

 
 
 
 
 
 
 
 
 

 

 
 
 

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कोविड-19 के दौरान भी निभाई जिम्मेदारी

कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान जब डर और अफरातफरी का माहौल था, तब शरीफ चाचा ने फिर एक बार इंसानियत की मिसाल पेश की। उन्होंने 35 से अधिक कोविड पीड़ितों का अंतिम संस्कार किया, जिनके अपने भी उन्हें छोड़ चुके थे। उस समय स्थिति इतनी भयावह थी कि कई परिवार अपने मृत परिजनों को लेने तक नहीं आए।

पद्म श्री सम्मान और राष्ट्रीय पहचान

उनकी इस निस्वार्थ सेवा को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2020 में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया। हालांकि कोविड प्रतिबंधों के कारण उन्हें यह सम्मान बाद में राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में आयोजित समारोह में प्रदान किया गया। उस क्षण ने न केवल शरीफ चाचा को, बल्कि पूरे देश को यह याद दिलाया कि सच्ची इंसानियत किसी धर्म या पहचान की मोहताज नहीं होती।

आज भी जारी है संघर्ष

इतनी बड़ी उपलब्धियों और सम्मान के बावजूद, शरीफ चाचा और उनका परिवार आज भी आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहा है। उनके बेटे मोहम्मद सगीर, जो पेशे से ड्राइवर हैं, बताते हैं कि उनके पिता अब बूढ़े हो चुके हैं और उनके घुटनों में दर्द रहता है। पहले वे खुद ठेला खींचते थे और साइकिल से जाते थे, लेकिन अब उन्हें स्कूटी का सहारा लेना पड़ता है। कई बड़े नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने उन्हें आर्थिक मदद और घर देने का वादा किया, लेकिन अब तक वह वादे पूरे नहीं हुए हैं। शरीफ चाचा आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सरकार उनकी मदद करेगी।

इंसानियत का सबसे बड़ा संदेश

मोहम्मद शरीफ की कहानी हमें यह सिखाती है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने यह साबित किया कि सच्ची सेवा वही है, जिसमें कोई स्वार्थ नहीं होता। जब दुनिया मुंह मोड़ लेती है, तब भी अगर कोई खड़ा रहता है, तो वही असली इंसान होता है। उनकी जिंदगी एक प्रेरणा है—एक ऐसा उदाहरण, जो हमें यह याद दिलाता है कि करुणा, सहानुभूति और सेवा ही वह मूल्य हैं, जो इस दुनिया को बेहतर बना सकते हैं।