कश्मीर की सूफियाना विरासत के सजग प्रहरी: मुनीर अहमद मीर के सुरों में है भाईचारा

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 03-04-2026
Vigilant Guardian of Kashmir's Sufi Heritage: Brotherhood Resonates in the Melodies of Munir Ahmed Mir
Vigilant Guardian of Kashmir's Sufi Heritage: Brotherhood Resonates in the Melodies of Munir Ahmed Mir

 

दानिश अली/ श्रीनगर

कश्मीर की वादियों में जब केसर की खुशबू घुलती है तो हवाओं में एक खास तरह की रूहानियत महसूस होती है। यह रूहानियत सिर्फ कुदरत की देन नहीं है। इसमें सदियों पुरानी उस तहजीब का भी हिस्सा है जिसे हम सूफियाना रवायत कहते हैं। इसी रवायत को अपने सीने से लगाए एक शख्स आज भी कश्मीर की गंगा-जमुनी तहजीब को सुरों से सींच रहा है। उनका नाम है मुनीर अहमद मीर। मुनीर साहब सिर्फ एक गायक नहीं हैं। वे उस दौर की जिंदा मिसाल हैं जब कश्मीर में अजान और कीर्तन की आवाजें एक साथ गूंजकर इंसानियत का मुकम्मल राग बनाती थीं।

कश्मीर का संगीत हमेशा से ही दिलों को जोड़ने का जरिया रहा है। मुनीर अहमद मीर इसी विरासत के सच्चे सिपाही हैं। वे मानते हैं कि संगीत का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं होना चाहिए। उनके लिए संगीत समाज में भाईचारा और सांस्कृतिक एकता कायम करने का सबसे बड़ा हथियार है। मुनीर साहब पिछले कई दशकों से कश्मीरी, हिंदी और फारसी भाषाओं में अपनी गायकी का जादू बिखेर रहे हैं। उनकी आवाज में वो कशिश है जो सुनने वाले को कश्मीर की उन गलियों में ले जाती है जहां कभी प्यार और इखलास का बसेरा था।

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पुरखों की विरासत और 120 साल पुराना हारमोनियम

मुनीर अहमद मीर के संगीत की जड़ें उनके परिवार के गहरे संस्कारों में छिपी हैं। उन्हें संगीत की शुरुआती तालीम अपने वालिद शफी मोहम्मद मीर से मिली। उनके पिता एक बेहद नेक दिल इंसान और संगीत के पारखी थे। मुनीर साहब बचपन से ही अपने पिता के साथ संगीत की महफिलों में जाया करते थे। वहीं बैठकर उन्होंने सुरों के उतार-चढ़ाव को बारीकी से समझा। उनके घर में संगीत की यह लौ पीढ़ियों से जल रही है।

संगीत के प्रति उनके परिवार के लगाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके पास एक प्राचीन हारमोनियम है। यह हारमोनियम लगभग 120साल पुराना है। यह उनके दादा के जमाने का है और आज भी उनके घर में पूरी हिफाजत के साथ रखा गया है। यह सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं है बल्कि उनके खानदान की संगीत यात्रा का गवाह है। मुनीर साहब जब इसे छूते हैं तो उन्हें अपने बुजुर्गों की दुआएं महसूस होती हैं।

गुरु-शिष्य परंपरा की अनूठी मिसाल

मुनीर अहमद मीर ने संगीत की औपचारिक शिक्षा 'इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट्स' से प्राप्त की। यहां उन्हें पंडित पृथ्वी नाथ रैना के रूप में एक महान गुरु मिले। मुनीर साहब बड़े फख्र के साथ अपने उस्ताद का जिक्र करते हैं। वे कहते हैं कि पंडित जी ने कभी भी मजहब को ज्ञान के रास्ते में दीवार नहीं बनने दिया। गुरु और शिष्य का रिश्ता हमेशा प्यार और सम्मान की बुनियाद पर टिका रहा।

यही वह असली गुरु-शिष्य परंपरा है जिसकी मिसाल आज के दौर में कम ही मिलती है। मुनीर साहब का मानना है कि ज्ञान वही है जो इंसान को विनम्र बनाए। उन्होंने अपने गुरु से न सिर्फ राग और ताल सीखी बल्कि जीवन जीने का सलीका भी सीखा। उनके मुताबिक एक सच्चा कलाकार वही है जो अपने गुरु के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहे। उनके उस्ताद ने उन्हें सिखाया कि कला का कोई धर्म नहीं होता। कला खुद में एक इबादत है।

दिग्गजों के साथ सफर और मिली उपलब्धियां

अपने लंबे और गौरवशाली करियर में मुनीर साहब ने कश्मीर के कई दिग्गज कलाकारों के साथ काम किया। उन्होंने गुलाम हसन सूफी, राज बेगम, नसीमा अख्तर और शम्मा देवी जैसे बड़े नामों के साथ सुर मिलाए। शुरुआत में उन्होंने इन कलाकारों के साथ कोरस में गाया। यहीं से उन्होंने संगीत की बारीकियों को जज्ब किया। बाद में उन्हें विश्व प्रसिद्ध संतूर वादक पंडित भजन सोपोरी का सान्निध्य मिला। पंडित सोपोरी ने उन्हें कंपोजिशन और संगीत की बारीकियों की तकनीकी समझ दी।

मुनीर अहमद मीर की कला को समय-समय पर सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर सराहा गया है। साल 2023में उन्हें प्रतिष्ठित 'हारमनी अवार्ड' से सम्मानित किया गया। इसके बाद साल 2024में उन्हें राज्य स्तर पर बड़ा सम्मान मिला। दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में सोपोरी एकेडमी ऑफ म्यूजिक एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स ने भी उन्हें सम्मानित किया। लेकिन मुनीर साहब की सादगी देखिए। वे कहते हैं कि अवार्ड से ज्यादा उनके लिए लोगों का प्यार मायने रखता है। उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान वह तालियां हैं जो उनके गाने के बाद सभागार में गूंजती हैं। वे मानते हैं कि श्रोताओं की दाद ही एक कलाकार की असली पूंजी होती है।

कश्मीर की बदलती फिज़ा और अमन की अपील

कश्मीर के वर्तमान हालातों पर मुनीर अहमद मीर की सोच बहुत स्पष्ट और भावुक है। वे उस दौर को याद करते हैं जब कश्मीर में मजहबी सद्भाव अपने चरम पर था। वे कहते हैं कि वक्त के साथ कश्मीर की आबोहवा बदली है और आपसी रिश्तों में कुछ दूरियां आई हैं। लेकिन वे निराश नहीं हैं। वे चाहते हैं कि पुरानी रवायतों को फिर से जिंदा किया जाए। उनका सपना है कि कश्मीर के पुराने मंदिरों के कपाट फिर से खुलें और उनकी मरम्मत हो।

उनका मानना है कि जब लोग एक-दूसरे के धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों का सम्मान करेंगे तो दूरियां खुद-ब-खुद खत्म हो जाएंगी। हाल के वर्षों में कश्मीर में हुए कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उन्हें नई उम्मीद दी है। वे कहते हैं कि जब अलग-अलग धर्मों के लोग एक साथ मिलकर संगीत सुनते हैं तो नफरत की दीवारें गिरने लगती हैं। मुनीर साहब अपनी गायकी के जरिए इसी एकता का संदेश घर-घर पहुंचाना चाहते हैं।

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नई पीढ़ी को सलाह: अपनी जड़ों से जुड़ें

आज के दौर में संगीत के बदलते स्वरूप पर मुनीर साहब थोड़ी चिंता जाहिर करते हैं। वे कहते हैं कि पहले का संगीत रूह को सुकून देने वाला और स्थायी होता था। आज का संगीत शोर-शराबे से भरा और क्षणिक है। आज के गाने जितनी जल्दी मशहूर होते हैं उतनी ही जल्दी लोग उन्हें भूल भी जाते हैं। वे नई पीढ़ी के कलाकारों को अपनी जड़ों से जुड़ने की सलाह देते हैं।

उनका कहना है कि कश्मीरी संगीत की अपनी एक पहचान है। नई पीढ़ी को इसे सीखना और सहेजना चाहिए। वे आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे संस्थानों के कमजोर होते प्रभाव पर भी दुख जताते हैं। वे याद करते हैं कि कैसे इन संस्थानों ने कभी नए कलाकारों को तराशने का काम किया था। आज के दौर में मंचों की कमी की वजह से प्रतिभाएं दबकर रह जाती हैं। मुनीर साहब चाहते हैं कि सरकार और समाज मिलकर ऐसा माहौल बनाएं जहां शास्त्रीय और पारंपरिक संगीत फल-फूल सके।

संगीत: नफरत को मिटाने वाली ताकत

मुनीर अहमद मीर की बातचीत का सार यही है कि संगीत एक ईश्वरीय शक्ति है। यह दिलों को जोड़ने का सबसे सरल रास्ता है। वे आज भी पूरी शिद्दत के साथ रियाज करते हैं और अपने शिष्यों को संगीत सिखाते हैं। उनका मानना है कि जब तक दुनिया में संगीत है तब तक इंसानियत की उम्मीद जिंदा है। वे एक ऐसे कश्मीर का सपना देखते हैं जहां हर तरफ खुशहाली हो और संगीत की तान में सिर्फ और सिर्फ मोहब्बत का पैगाम हो।

अंत में मुनीर साहब बस इतना ही कहते हैं कि जो कुछ भी उन्होंने आज तक पाया है वह उनके गुरुओं और बुजुर्गों की दुआओं का फल है। उनका सफर अभी जारी है और वे आखिरी सांस तक कश्मीर की इस सूफियाना रवायत की खिदमत करते रहना चाहते हैं। उनकी आवाज आज भी कश्मीर की वादियों में उम्मीद का दीया जलाए हुए है। यह दीया है भाईचारे का, एकता का और अटूट विश्वास का।