मंजीत ठाकुर
आज की दुनिया बारूद के ढेर पर बैठी है. अगर हम वैश्विक मानचित्र पर नजर डालें, तो शांति के टापू कम और संघर्ष के अंगारे ज्यादा नजर आते हैं. रूस-यूक्रेन के अंतहीन मैदान हों, गाजा की मलबे में तब्दील होती गलियाँ हों, सूडान का रक्तरंजित गृहयुद्ध हो या म्यांमार की सुलगती सीमाएँ, मानवता आज अपनी ही बनाई घृणा की आग में झुलस रही है.
आधुनिक विज्ञान ने हमें विनाश के घातक हथियार तो दे दिए, लेकिन शांति से जीने का विवेक छीन लिया, ऐसे में 2500 वर्ष पूर्व वर्धमान महावीर द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत केवल ‘धार्मिक उपदेश’ नहीं, बल्कि वैश्विक अस्तित्व को बचाने के ‘रणनीतिक सूत्र’ प्रतीत होते हैं.
भगवान महावीर का दर्शन मुख्य रूप से तीन स्तंभों पर टिका है, जो आज के भू-राजनीतिक संकटों का सटीक उपचार प्रतीत होता है. महावीर की अहिंसा कायरता का नाम नहीं है, बल्कि यह विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है. उन्होंने कहा था, ‘अहिंसा परमो धर्मः’.
मौजूदा वक्त में रूस और यूक्रेन तथा अमेरिका-इजरायल-ईरान के बीच के संघर्ष मूलतः ‘अहं’ और ‘विस्तारवाद’ की उपज है. महावीर सिखाते हैं कि हिंसा केवल शरीर की नहीं होती, वह वाणी और विचार की भी होती है. जब तक एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के अस्तित्व को सहिष्णुता के साथ स्वीकार नहीं करेगा, तब तक युद्ध के बादल नहीं छंटेंगे. उनका सूत्र ‘जियो और जीने दो’ आज के ‘सर्वोत्तम की उत्तरजीविता यानी सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ के हिंसक सिद्धांत का मानवीय विकल्प है.
आज की दुनिया में सबसे बड़ा संघर्ष ‘विचारधारा’ का है. ‘मेरा सच ही एकमात्र सच है’ यह हठधर्मिता ही इजरायल-फिलीस्तीन जैसे दशकों पुराने संघर्षों की जड़ है. महावीर ने ‘अनेकांतवाद’ का सिद्धांत दिया, जिसका अर्थ है कि सत्य के कई पहलू हो सकते हैं.
यदि आज के राजनेता और राष्ट्रों के नेतृत्वकर्ता ‘अनेकांतवाद’ को अपना लें, तो वे समझेंगे कि विरोधी पक्ष का भी अपना एक सत्य हो सकता है. यह सिद्धांत ‘वैचारिक सहिष्णुता’ पैदा करता है. यदि हम दूसरे के दृष्टिकोण को स्थान देना शुरू कर दें, तो संवाद के द्वार खुलेंगे और युद्ध की विभीषिका स्वतः समाप्त होने लगेगी. अनेकांतवाद वास्तव में आधुनिक ‘लोकतंत्र’ और ‘बहुलवाद’ की रूह है.
Heartfelt greetings from @PujyaSwamiji on the auspicious occasion of Bhagwan #MahavirJayanti, the 24th Tirthankara of Jain Dharma. His message of truth, non-violence, and compassion is the true path of life—wherein lies peace and the welfare of humanity. #MahavirJayanti pic.twitter.com/hfjIURcOjb
— Parmarth Niketan (@ParmarthNiketan) March 31, 2026
इतिहास गवाह है कि अधिकांश युद्ध जमीन, तेल, पानी या खनिजों के कब्जे के लिए लड़े गए हैं. सूडान और मध्य अफ्रीका में चल रहे गृहयुद्धों के पीछे संसाधनों की अंधी दौड़ है. महावीर का ‘अपरिग्रह’ (सीमा से अधिक संग्रह न करना) का सिद्धांत आज के ‘कंज्यूमरिज्म’ (उपभोक्तावाद) पर करारा प्रहार है.
यदि मनुष्य और राष्ट्र अपनी जरूरतों को सीमित करना सीख लें, तो संसाधनों के लिए होने वाली मारकाट खत्म हो सकती है. अपरिग्रह केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं, बल्कि एक ‘इकोनॉमिक मॉडल’ है जो पारिस्थितिक संतुलन और वैश्विक न्याय की बात करता है.
आज दुनिया दो गुटों में बंटी है. एक तरफ नाटो जैसे सैन्य गठबंधन हैं, तो दूसरी तरफ उनके विरोधी. इस गुटबाजी ने शीत युद्ध के उस दौर को वापस ला दिया है जहाँ ‘परमाणु निवारण’ (न्यूक्लियर डेटरेंस) ही शांति का एकमात्र आधार माना जा रहा है. लेकिन क्या भय के आधार पर स्थापित शांति स्थायी हो सकती है?
आज के दौर में ऐसा प्रतीत होता है मानो तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में टुकड़ो-टुकड़ों में लड़ा जा रहा है. ईरान-अमेरिका-इजरायल तथा रूस-यूक्रेन समेत बड़े-छोटे युद्धों और गृहयुद्धों तथा नस्लीय लड़ाइयों को मिला लें इस वक्त पूरी दुनिया में 67 युद्ध हो रहे हैं.
म्यांमार से लेकर सीरिया तक, जहाँ भाई भाई के खून का प्यासा है, वहाँ महावीर का ‘आत्मौपम्य’ (स्वयं के समान दूसरों को समझना) का सिद्धांत प्रासंगिक है. जब हम दूसरे के दुख को अपना दुख समझने लगते हैं, तो हाथ की तलवार अपने आप गिर जाती है.
यह दौर सूचना युद्ध का है. आज नफरत फैलाने के लिए ‘डिजिटल हिंसा’ का सहारा लिया जा रहा है. महावीर की ‘सत्य’ और ‘अचौर्य’ की शिक्षाएँ हमें सिखाती हैं कि भ्रामक सूचनाओं के माध्यम से किसी की प्रतिष्ठा की चोरी करना भी हिंसा है.
भगवान महावीर ने राजपाट छोड़कर जंगलों में तपस्या इसलिए नहीं की थी कि वे दुनिया से भागना चाहते थे, बल्कि इसलिए की थी ताकि वे मनुष्य के भीतर छिपे ‘आंतरिक शत्रुओं’ यानी क्रोध, मान, माया और लोभ को जीत सकें. उन्होंने कहा था कि “हजारों योद्धाओं पर विजय पाना आसान है, लेकिन स्वयं पर विजय पाना ही असली जीत है.”

आज के दौर के ‘पुतिन’, ‘नेतन्याहू’ या अन्य वैश्विक नायकों को जिस जीत की तलाश है, वह लाशों के ढेर से होकर गुजरती है. लेकिन महावीर की जीत ‘हृदय परिवर्तन’ से शुरू होती है.
यदि वर्तमान विश्व को तृतीय विश्व युद्ध की विभीषिका से बचना है, तो उसे ‘संयुक्त राष्ट्र’ के चार्टर के साथ-साथ महावीर के ‘अनेकांतवाद’ के घोषणापत्र को भी अपनी मेज पर रखना होगा.
भगवान महावीर आज केवल जैन धर्म के तीर्थंकर नहीं, बल्कि एक वैश्विक नागरिक (ग्लोबल सिटीजन) के रूप में प्रासंगिक हैं. उनकी शिक्षाएँ उस ‘मरहम’ की तरह हैं जो युद्धग्रस्त दुनिया के घावों को भर सकती हैं. शांति सेनाओं से नहीं, बल्कि उस चेतना से आएगी जो यह स्वीकार करे कि ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ अर्थात सभी जीव एक-दूसरे के पूरक हैं.
( लेखक कई पुस्तकों के लेखक और आवाज द वाॅयस के एवी संपादक हैं)