मलिक असगर हाशमी
भारत में नीट परीक्षा में कथित धांधली को लेकर जब छात्रों का आंदोलन धीरे धीरे अपने अंतिम दौर में पहुंच रहा था। उसी समय पड़ोसी देश बांग्लादेश में एक फिल्म के पहले पोस्टर ने नई चर्चा छेड़ दी। यह फिल्म है 'ठिकाना बांग्लादेश'। यह सिर्फ एक स्पोर्ट्स ड्रामा नहीं है। यह 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान बनी स्वाधीन बांग्ला फुटबॉल टीम की ऐतिहासिक यात्रा को बड़े पर्दे पर लाने का प्रयास है। फिल्म का पोस्टर सामने आते ही बांग्लादेश में इतिहास, खेल और राष्ट्रवाद पर नई बहस शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि यह फिल्म दोनों पड़ोसी देशों भारत और बांग्लादेश के साझा इतिहास को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाएगी।
दिलचस्प बात यह है कि फिल्म के प्रचार अभियान की शुरुआत ऐसे समय हुई है जब हाल ही में भारत और बांग्लादेश के प्रधानमंत्रियों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को लेकर विस्तृत टेलीफोन वार्ता भी हुई थी। ऐसे माहौल में 1971 के साझा इतिहास पर आधारित यह फिल्म सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

फिल्म का पहला पोस्टर 25 जुलाई को जारी किया गया। यह तारीख संयोग नहीं बल्कि इतिहास से जुड़ी हुई है। 25 जुलाई 1971 को स्वाधीन बांग्ला फुटबॉल टीम ने भारत में 'नादिया फुटबॉल इलेवन' के खिलाफ ऐतिहासिक मुकाबला खेला था। यही वह दिन था जब पहली बार किसी बांग्लादेशी टीम ने विदेशी धरती पर लाल और हरे रंग का राष्ट्रीय ध्वज लेकर मैदान में प्रवेश किया। यह मैच केवल खेल प्रतियोगिता नहीं था बल्कि आजादी के संघर्ष का प्रतीक बन गया था।
निर्देशक अनाम बिस्वास की फिल्म इसी ऐतिहासिक अध्याय को केंद्र में रखकर बनाई गई है। फिल्म यह दिखाने का प्रयास करती है कि किस तरह फुटबॉल केवल खेल नहीं रहा, बल्कि मुक्ति संग्राम के दौरान दुनिया का ध्यान बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई की ओर आकर्षित करने का माध्यम बना।
पोस्टर में युद्धग्रस्त बांग्लादेश की पृष्ठभूमि दिखाई गई है। पानी से भरे इलाके के सामने एक फुटबॉलर की विशाल आकृति खड़ी है। उसके हाथ में फुटबॉल है और उसकी नजर दूर क्षितिज की ओर है। पीछे राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहा है। आसमान में लड़ाकू विमान दिखाई देते हैं। दूर गांवों से धुआं उठता नजर आता है। पूरा दृश्य संघर्ष, बलिदान और उम्मीद का संदेश देता है। पोस्टर का यही दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
फिल्म की शूटिंग करीब तीन वर्ष पहले शुरू हुई थी। यह बांग्लादेश सरकार के सहयोग से बनी परियोजना है। इसे 2019 और 20 वित्तीय वर्ष में सरकारी अनुदान मिला था। लंबे इंतजार और कई चुनौतियों के बाद अब फिल्म अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। निर्माताओं का कहना है कि यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा तो इसे इस वर्ष के अंत तक सिनेमाघरों में रिलीज किया जाएगा।
फिल्म में बांग्लादेश के कई लोकप्रिय कलाकार नजर आएंगे। प्रमुख भूमिकाओं में आरिफिन शुवो, नुसरत फारिया, रिजवान परवेज, खैरुल बसर, इरफान सज्जाद, आजाद अबुल कलाम और शताब्दी वदूद शामिल हैं। कलाकारों की यह टीम ऐतिहासिक घटनाओं को वास्तविकता के करीब ले जाने की कोशिश कर रही है।

अभिनेता रिजवान परवेज
पोस्टर जारी करते हुए निर्देशक अनाम बिस्वास ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कई उतार चढ़ाव और कठिनाइयों के बाद फिल्म लगभग पूरी हो चुकी है। उन्होंने कहा कि 25 जुलाई से दर्शकों के साथ संवाद शुरू किया जा रहा है क्योंकि 1971 में इसी दिन स्वाधीन बांग्ला फुटबॉल टीम की ऐतिहासिक यात्रा शुरू हुई थी। पहली बार लाल और हरे रंग का झंडा देश की सीमाओं से बाहर लहराया गया था। उनके अनुसार फिल्म उसी गौरवपूर्ण विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है।
फिल्म के अभिनेता रिजवान परवेज ने भी मीडिया से बातचीत में अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि फिल्म पूरी तरह स्वाधीन बांग्ला फुटबॉल टीम की कहानी पर आधारित है। हालांकि उन्होंने अपने किरदार के बारे में ज्यादा जानकारी देने से इनकार किया। उन्होंने बताया कि निर्देशक अनाम बिस्वास के साथ उनका पुराना कार्य संबंध है और उनके साथ काम करना हमेशा सहज और प्रेरणादायक रहा है।
रिजवान परवेज का कहना है कि अच्छे निर्देशक कलाकारों को केवल निर्देश नहीं देते बल्कि उनके भीतर मौजूद भावनाओं को समझते हैं। यही वजह है कि कठिन विषय पर आधारित फिल्म में भी कलाकार सहज होकर काम कर पाते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि फिल्म की शूटिंग 2022 में हुई थी। यदि आज वही किरदार निभाना होता तो शायद उनकी अभिनय शैली कुछ अलग होती क्योंकि पिछले तीन वर्षों में उनकी सोच और अनुभव दोनों में काफी बदलाव आया है।
उन्होंने दर्शकों से फिल्म देखने की अपील भी की और उम्मीद जताई कि उनका अभिनय लोगों को पसंद आएगा। उनके अनुसार यह केवल एक ऐतिहासिक फिल्म नहीं बल्कि भावनाओं और संघर्ष की कहानी है।
फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें युद्ध को केवल सैन्य संघर्ष के रूप में नहीं दिखाया गया है। इसमें यह बताया गया है कि कैसे एक फुटबॉल टीम ने खेल के माध्यम से दुनिया का ध्यान बांग्लादेश के स्वतंत्रता आंदोलन की ओर खींचा। उस समय टीम ने भारत के विभिन्न शहरों में मैच खेले। इन मुकाबलों से जुटाई गई राशि और अंतरराष्ट्रीय समर्थन ने मुक्ति संग्राम को नई ऊर्जा दी।
इतिहासकारों का मानना है कि स्वाधीन बांग्ला फुटबॉल टीम केवल खिलाड़ियों का समूह नहीं थी। वह स्वतंत्रता आंदोलन का सांस्कृतिक चेहरा भी थी। खिलाड़ियों ने मैदान पर उतरकर दुनिया को यह संदेश दिया कि बांग्लादेश अपनी पहचान और स्वतंत्र अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। यही कारण है कि आज भी उस टीम का नाम बांग्लादेश के इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है।
फिल्म का शीर्षक ठिकाना बांग्लादेश भी अपने आप में प्रतीकात्मक है। यह केवल एक भौगोलिक पहचान की बात नहीं करता बल्कि उस संघर्ष की याद दिलाता है जिसने एक नए राष्ट्र को जन्म दिया। निर्देशक का कहना है कि फिल्म का उद्देश्य इतिहास को दोहराना नहीं बल्कि उसे नई पीढ़ी के सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत करना है।
फिल्म के प्रचार अभियान की शुरुआत के साथ ही बांग्लादेश में दर्शकों की उत्सुकता बढ़ गई है। सोशल मीडिया पर पोस्टर को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। इतिहास और खेल में रुचि रखने वाले लोग इसे वर्ष की महत्वपूर्ण फिल्मों में गिन रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फिल्म अपने विषय के साथ न्याय कर पाती है तो यह केवल व्यावसायिक सफलता तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विमर्श का भी हिस्सा बनेगी।

सूत्रों के अनुसार फिल्म को दिसंबर में सिनेमाघरों में रिलीज करने की तैयारी है। रिलीज से पहले अलग अलग चरणों में प्रचार अभियान चलाया जाएगा। निर्माता चाहते हैं कि दर्शक फिल्म देखने से पहले उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझें जिस पर पूरी कहानी आधारित है।
ठिकाना बांग्लादेश एक ऐसी फिल्म है जो युद्ध, खेल, देशभक्ति और इतिहास को एक साथ जोड़ती है। यह बताती है कि कभी कभी मैदान में खेला गया एक फुटबॉल मैच भी इतिहास की दिशा बदलने वाले संघर्ष का हिस्सा बन जाता है। यही कारण है कि इस फिल्म को केवल मनोरंजन नहीं बल्कि बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम की एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में भी देखा जा रहा है।