Solid roofs, undeniable reality: Muslim families in UP received housing benefits exceeding their population share.
मधुकर पांडेय / लखनऊ
देश के विभिन्न हिस्सों में उत्तर प्रदेश को लेकर जो छवि अक्सर प्रस्तुत की जाती है, वह ज़मीनी सच्चाई से पूरी तरह मेल नहीं खाती। खासतौर पर अल्पसंख्यक समुदाय, विशेषकर मुस्लिम समाज को लेकर यह धारणा बनाई जाती रही है कि सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें सीमित रूप से मिलता है। लेकिन प्रधानमंत्री आवास योजना के आंकड़े और लाभार्थियों की वास्तविक कहानियां इस धारणा को पूरी तरह खारिज करती हैं। उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “सबका साथ–सबका विकास” के संकल्प को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में जिस तरह लागू किया गया है, उसका सबसे ठोस प्रमाण प्रधानमंत्री आवास योजना बनकर सामने आई है। यह योजना राज्य के लाखों मुस्लिम परिवारों के लिए सिर्फ एक सरकारी सहायता नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन की नींव साबित हुई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2017 से जनवरी 2026 तक के करीब साढ़े आठ वर्षों में उत्तर प्रदेश में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण और शहरी दोनों) के तहत लगभग 60 से 62 लाख परिवारों को पक्के आवास उपलब्ध कराए गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सार्वजनिक दावा है कि इनमें से करीब 21 लाख आवास मुस्लिम परिवारों को मिले हैं। भले ही आधिकारिक रूप से धर्म-आधारित ब्रेकअप उपलब्ध न हो, लेकिन मुख्यमंत्री के इस बयान के आधार पर यदि विश्लेषण किया जाए तो योजना में मुस्लिम लाभार्थियों की हिस्सेदारी 30 से 35 प्रतिशत के बीच बैठती है। यह आंकड़ा इसलिए भी अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 18 से 19 प्रतिशत है।
यदि इसे डेटा मैप के रूप में देखा जाए, तो उत्तर प्रदेश का सामाजिक-आर्थिक मानचित्र साफ संकेत देता है कि जिन जिलों में गरीबी, आवासहीनता और कच्चे मकानों की संख्या अधिक रही, वहां प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ भी उसी अनुपात में पहुंचा। यह चयन प्रक्रिया धर्म आधारित न होकर पूरी तरह गरीबी उन्मूलन और पात्रता मानकों पर आधारित रही। अनुमान के मुताबिक, यदि कुल 62 लाख लाभार्थियों पर 30–35 प्रतिशत लागू किया जाए, तो मुस्लिम लाभार्थियों की संख्या 18.6 लाख से 21.7 लाख के बीच बैठती है।
ग्रामीण-शहरी विभाजन के आंकड़े इस योजना की व्यापकता को और स्पष्ट करते हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 35 से 36 लाख घर बनाए गए हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में 17 से 19 लाख घर या तो पूर्ण हो चुके हैं या स्वीकृत किए जा चुके हैं। यदि इन आंकड़ों को जिला-स्तरीय डेटा मैप में रखा जाए, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध और पूर्वांचल के कई जिले उभरकर सामने आते हैं, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत अधिक है और वहां योजना के लाभार्थियों की संख्या भी उल्लेखनीय रही है।
मैजिक ब्रिक्स की रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी 2.0 के तहत कई जिलों में लाभार्थियों के खातों में पहली किस्त की राशि सीधे ट्रांसफर की गई। गाजियाबाद में 8,937, बरेली में 8,693 और लखनऊ में 8,568 परिवारों को पहली किस्त मिली। प्रतापगढ़ में 7,214, गोरखपुर में 7,142 और कुशीनगर में 6,231 परिवारों को योजना का लाभ मिला। इसी तरह बिजनौर (5,581), अलीगढ़ (5,382), लखीमपुर खीरी (5,100) और प्रयागराज (5,023) जैसे जिलों में भी हजारों परिवार लाभान्वित हुए। अयोध्या, मथुरा, देवरिया, महाराजगंज, बदायूं, मुरादाबाद, आगरा, बुलंदशहर, मऊ, उन्नाव, फर्रुखाबाद, वाराणसी और मिर्जापुर के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि योजना राज्य के हर हिस्से में समान रूप से पहुंची है।

यदि इन जिलों को एक सामाजिक-जनसांख्यिकीय मैप पर रखा जाए, तो साफ दिखाई देता है कि अलीगढ़, मुरादाबाद, बदायूं, लखनऊ, बुलंदशहर और आगरा जैसे जिलों में, जहां मुस्लिम आबादी अपेक्षाकृत अधिक है, वहां मुस्लिम परिवारों को सरकारी आवास बड़ी संख्या में मिले हैं। यह तथ्य इस बात को मजबूती देता है कि योजना का क्रियान्वयन ज़मीनी जरूरतों के अनुसार हुआ, न कि किसी धार्मिक भेदभाव के आधार पर।
प्रधानमंत्री आवास योजना की मानवीय तस्वीर फिरोजाबाद की शमा परवीन की कहानी में साफ झलकती है। अजमेरी गेट क्षेत्र की रहने वाली शमा परवीन वर्षों तक बिना पक्की छत के जीवन गुजार रही थीं। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्हें उनके घर की चाबी सौंपी, तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू थे। उन्होंने भावुक होकर कहा कि अब तक उनके सिर पर अपनी छत नहीं थी, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की वजह से उन्हें यह सपना पूरा होता दिख रहा है। उन्होंने प्रधानमंत्री को आशीर्वाद देते हुए कहा कि वे सौ साल जिएं। साथ ही उन्होंने सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं, खासकर मुफ्त अनाज वितरण की सराहना की और रसोई गैस की कीमत कम करने की गुजारिश भी रखी, जो आम गरीब परिवार की वास्तविक जरूरतों को दर्शाती है।
राजधानी लखनऊ में भी प्रधानमंत्री आवास योजना ने मुस्लिम परिवारों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया है। हुसैनाबाद की रहने वाली शबीना बी (45), एक गरीब मुस्लिम विधवा, वर्षों से कच्चे और किराए के मकानों में अपने बेटों के साथ जीवन गुजार रही थीं। प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी के तहत जब उन्हें लाभार्थी बनाया गया और पहली किस्त उनके खाते में पहुंची, तो उनके लिए यह किसी नई ज़िंदगी की शुरुआत जैसा था। शबीना बी कहती हैं कि योगी जी और मोदी जी के आशीर्वाद से अब उनका पक्का घर बन रहा है और पहली बार उन्हें अपने घर में सुरक्षित भविष्य की उम्मीद दिखाई दे रही है।
इसी तरह चिनहट क्षेत्र के मजदूर मोहम्मद इकबाल (38) के चार सदस्यीय परिवार को भी ग्रामीण प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला। वर्षों तक टूटी छत और बरसात के पानी के बीच जीवन बिताने के बाद अब उनका परिवार सुरक्षित और स्थायी आवास की ओर बढ़ रहा है। चरखारी से आईं लाभार्थी नेहा और शाहीन खातून की भावुक प्रतिक्रियाएं भी इस बात की गवाही देती हैं कि यह योजना सिर्फ ईंट-सीमेंट का ढांचा नहीं, बल्कि गरिमा और आत्मसम्मान का प्रतीक है।
प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी 2.0 के तहत प्रत्येक लाभार्थी को कुल 2.50 लाख रुपये की सहायता दी जा रही है। यह राशि तीन चरणों में सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती है—पहली किस्त 1 लाख रुपये, दूसरी किस्त 75 प्रतिशत निर्माण पूरा होने पर 1 लाख रुपये, और तीसरी किस्त मकान पूर्ण होने पर 50 हजार रुपये। इस व्यवस्था ने पारदर्शिता सुनिश्चित की है और भ्रष्टाचार की संभावनाओं को काफी हद तक कम किया है।
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कुल मिलाकर, यदि उत्तर प्रदेश के प्रधानमंत्री आवास योजना के आंकड़ों को सामाजिक, भौगोलिक और जनसांख्यिकीय डेटा मैप के रूप में देखा जाए, तो यह साफ दिखाई देता है कि मुस्लिम समुदाय की भागीदारी न सिर्फ महत्वपूर्ण रही है, बल्कि कई जिलों में उनकी हिस्सेदारी जनसंख्या अनुपात से भी अधिक रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी 2.0 अब केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के लाखों मुस्लिम और गरीब परिवारों के सपनों का सहारा बन चुकी है, जिसने यह साबित किया है कि विकास तब ही सार्थक है, जब वह बिना भेदभाव समाज के हर वर्ग तक पहुंचे।