अर्सला खान/ नई दिल्ली
समुद्र की अथाह गहराई में देश की सीमाओं की रक्षा करना और महफिल में शब्दों के जरिए दिलों को छू लेना, सुनने में थोड़ा अजीब लगता है। लेकिन कुछ लोग अपनी जिंदगी को एक ही दायरे में बांधकर नहीं रखते। वे हर चुनौती को पार करते हुए एक नई इबारत लिखते हैं। हम बात कर रहे हैं रियर एडमिरल (रिटायर्ड) खुर्रम शहजाद नूर की। भारतीय नौसेना के इस वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा समंदर की लहरों के बीच बिताया। लेकिन उनके भीतर एक ऐसा शायर भी सांस लेता रहा जिसने फौजी अनुशासन और साहित्यिक संवेदनशीलता का एक अनूठा संगम पेश किया।
हर चमकती हुई कहानी के पीछे कुछ अनकहे संघर्ष छिपे होते हैं। खुर्रम शहजाद नूर का जीवन भी कुछ ऐसा ही है। उनका पैतृक परिवार उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के नगीना से ताल्लुक रखता है। उनके पिता वहां एक इंटर कॉलेज में प्रिंसिपल थे। लेकिन उनके जीवन की शुरुआत बहुत आसान नहीं थी। वे एक प्रीमैच्योर बच्चे थे और करीब सात महीने में ही उनका जन्म हो गया था।
बचपन में उनका शरीर काफी कमजोर था। दूसरे बच्चों की तरह उनके लिए सामान्य शारीरिक गतिविधियां भी आसान नहीं थीं। उन्होंने आवाज द वाॅयस से बात करते हुए बताया-“ वह अपने भाई की तुलना में काफी देर से चलना सीख पाए। स्कूल के खेल के मैदान में जब वह फुटबॉल खेलने की कोशिश करते, तो थोड़ा दौड़ने के बाद ही हांफने लगते थे।“ उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह कमजोर बच्चा आगे चलकर भारतीय नौसेना की कठिन और बड़ी जिम्मेदारियां संभालेगा। लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक कमजोरी को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया।
आरती से जुड़ा अखबार का एक खूबसूरत किस्सा
जिंदगी में कुछ इत्तेफाक इतने खूबसूरत होते हैं कि वे हमेशा के लिए याद बन जाते हैं। खुर्रम शहजाद नूर की जिंदगी का एक ऐसा ही निजी और दिलचस्प पहलू उनकी पत्नी आरती से जुड़ा है। 'आवाज द वॉयस' की टीम से बातचीत में उन्होंने यह प्यारा सा किस्सा साझा किया।
उन्होंने बताया कि उस दौर में उनकी पत्नी के घर जो अखबार आता था, उसी अखबार में खुर्रम साहब की शायरी और विज्ञापन छपा करते थे। यानी जिस अखबार के जरिए उनके लिखे शब्द उनकी पत्नी के घर तक पहुंचते थे, वही अखबार उनकी जिंदगी की प्रेम कहानी का भी एक अहम हिस्सा बन गया। नौसेना की गंभीर और अनुशासित जिंदगी के बीच रिश्तों की यह गर्माहट उनके सफर को बेहद मानवीय बनाती है। ये रिश्ता इसलिए भी मजबूत रहां क्योकि खुर्रम साहब और उनकी पत्नि दोनों ही Non-Veg नहीं खाते थे.
नौसेना की वर्दी और तकनीकी महारत
समय के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई और मेहनत के दम पर भारतीय नौसेना का रास्ता चुना। उन्होंने लगभग 35 वर्षों तक देश की सेवा की। नौसेना में उनका मुख्य काम तकनीकी और शिक्षा से जुड़ा रहा। वे एंटी-सबमरीन वारफेयर के विशेषज्ञ रहे, जिसका मतलब है कि दुश्मन की पनडुब्बियों का समंदर के भीतर पता लगाना और उनसे निपटना।
उन्होंने प्रतिष्ठित डिफेंस सर्विसेज स्टाफ कॉलेज, वेलिंगटन से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया था। उनकी विशेषज्ञता का एक बड़ा हिस्सा SONAR तकनीक था। समंदर के भीतर ध्वनि तरंगों की मदद से पनडुब्बियों का पता लगाने वाली इस जटिल तकनीक को वे आम लोगों के लिए बहुत ही सरल भाषा में समझाने के लिए जाने जाते थे।
आकाशवाणी और विभिन्न रक्षा मंचों पर उन्होंने इसके बारे में खुलकर जानकारी दी। पदोन्नति पाते हुए वे भारतीय नौसेना में रियर एडमिरल के पद तक पहुंचे। नौसेना में शिक्षा और प्रशिक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
वर्दी के पीछे छिपा एक संवेदनशील शायर
नौसेना की जिंदगी पूरी तरह से अनुशासन और कड़े फैसलों पर टिकी होती है। लेकिन उस सख्त वर्दी के पीछे एक बेहद संवेदनशील शायर भी मौजूद था। जब वे किसी मुशायरे के मंच पर आते हैं, तो समंदर की रणनीति और पनडुब्बियों की बात करने वाला शख्स अचानक शब्दों और भावनाओं की दुनिया में उतर जाता है।
उनकी शायरी में जिंदगी, रिश्ते, मोहब्बत और इंसानियत की गहरी छाप दिखाई देती है। उनकी रचनाएं बहुत क्लिष्ट या कठिन शब्दों वाली नहीं होतीं, बल्कि वे सीधे दिल तक उतर जाती हैं।
रिश्तों की जटिलता को बयां करती उनकी रचना 'रिश्तों की डोर' लोगों के बीच काफी पसंद की जाती है। उनकी शायरी का मुख्य संदेश यही होता है कि जिंदगी की मुश्किलों के बावजूद हमेशा सकारात्मक रहना चाहिए।
शॉर्ट फिल्में और अंतर्मन का सफर
खुर्रम शहजाद नूर की रचनात्मकता सिर्फ मंचों तक सीमित नहीं है। वे शॉर्ट फिल्में भी बनाते हैं। इन फिल्मों के जरिए वे सामाजिक मुद्दों और मानवीय रिश्तों के ताने-बाने को पर्दे पर उतारने की कोशिश करते हैं।
उनकी प्रस्तुतियां जैसे 'अंतर्मन' उनके व्यक्तित्व के उस हिस्से को सामने लाती हैं जहां एक फौजी अधिकारी अपने अंदर की भावनाओं को तलाशता है।
हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं पर उनकी मजबूत पकड़ है। रक्षा मंत्रालय और नौसेना के राजभाषा कार्यक्रमों में उन्हें अक्सर अतिथि वक्ता के रूप में बुलाया जाता है। उनका जीवन यह साबित करता है कि फौजी अनुशासन और साहित्यिक प्रेम एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
इस कमजोरी की वजह से आर्मी में नहीं जाना चाहते थे खुर्रम
खुर्रम शहजाद नूर बचपन में अपनी शारीरिक कमजोरी की वजह से सेना में जाने के बारे में नहीं सोचते थे। वे सात महीने में पैदा हुए थे और बचपन में काफी कमजोर रहते थे, एक बार कि बात है जब खुर्रम physics की क्लास लेने जाते थे तो वहां एक करनल मिले, जिन्होंने खुर्रम से कहां कि तुम तो आर्मी के लायक हो, तुम्हें जाना चाहिए, फिर क्या था, जनाब को जाने का ख्याल आया. स्कूल में थोड़ा दौड़ने पर भी जल्दी थक जाते और हांफने लगते थे।
इसी वजह से उस समय शायद उन्हें खुद भी भरोसा नहीं था कि वे कभी सशस्त्र बलों का हिस्सा बन पाएंगे। लेकिन आगे चलकर उन्होंने अपनी शारीरिक सीमाओं को पीछे छोड़ा और भारतीय नौसेना में शामिल होकर रियर एडमिरल के पद तक पहुंचे।
एक जिंदगी और कई पहचान
रियर एडमिरल खुर्रम शहजाद नूर (रिटायर्ड) का सफर आज की युवा पीढ़ी के लिए एक बड़ी प्रेरणा है। एक ऐसा बच्चा जो कमजोर पैदा हुआ था, वह देश के शीर्ष सैन्य पद तक पहुंचा। और सेना से सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अपनी कला और साहित्य के जरिए समाज से अपना नाता बनाए रखा।
समुंदर की गहराइयों में सोनार की आवाज सुनने वाले और शब्दों के जरिए इंसानी दिलों को छूने वाले खुर्रम साहब यह बताते हैं कि इंसान की पहचान किसी एक दायरे में बंधकर नहीं रहती। अगर इरादे पक्के हों, तो इंसान एक ही जीवन में कई अलग-अलग भूमिकाओं को पूरी शिद्दत के साथ जी सकता है।