खून का रिश्ता नहीं, इंसानियत ने बनाया मुस्लिम दंपति को माता पिता

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 27-08-2026
Muslim couple raised two Hindu orphan brothers for 20 years and got the elder son married.
Muslim couple raised two Hindu orphan brothers for 20 years and got the elder son married.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  

कर्नाटक के बेलगावी जिले से सामने आई एक कहानी उस रिश्ते की है, जिसे खून से नहीं बल्कि इंसानियत, जिम्मेदारी और भरोसे ने बनाया। यहां एक मुस्लिम दंपति ने करीब दो दशक तक दो हिंदू अनाथ भाइयों को अपने पांच बच्चों के साथ पाला-पोसा, उनकी पढ़ाई-लिखाई कराई और उन्हें अपने परिवार का हिस्सा बनाकर रखा। जब बड़े बेटे की शादी की उम्र आई तो यही दंपति उसके माता-पिता बनकर दुल्हन तलाशने निकला और आखिरकार 8 फरवरी 2026 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उसकी शादी भी कराई।

यह कहानी है बेलगावी के सेवानिवृत्त KSRTC ड्राइवर मेहबूब हसन नाइकवाड़ी और उनकी पत्नी नूरजहां की। करीब 20 साल पहले उन्होंने अपने करीबी दोस्त शिवानंद कडय्या पुजेरी के दो छोटे बेटों सोमशेखर और वसंत को अपने घर में जगह दी थी। उस वक्त सोमशेखर सिर्फ चार साल और वसंत महज दो साल के थे। माता-पिता के निधन के बाद दोनों बच्चे बेसहारा हो गए थे। नाइकवाड़ी दंपति ने उस समय यह नहीं देखा कि बच्चे हिंदू हैं और वे मुस्लिम। उन्होंने सिर्फ यह देखा कि दो छोटे बच्चों को एक परिवार की जरूरत है।
 
दोस्त के बच्चों के लिए खोले घर के दरवाजे

इस कहानी की शुरुआत करीब दो दशक पहले हुई। मेहबूब हसन नाइकवाड़ी और शिवानंद कडय्या पुजेरी दोनों परिवहन क्षेत्र से जुड़े हुए थे और उनके परिवार एक ही इलाके में रहते थे। दोनों परिवारों के बीच करीबी दोस्ती थी। शिवानंद और उनकी पत्नी की मौत के बाद उनके दोनों छोटे बेटे अचानक माता-पिता से वंचित हो गए। रिश्तेदारों की तलाश की गई ताकि कोई उनकी जिम्मेदारी उठा सके, लेकिन रिपोर्टों के मुताबिक तत्काल परिवार का कोई सदस्य आगे नहीं आया। ऐसे समय में मेहबूब और नूरजहां ने वह फैसला लिया जिसने आने वाले करीब 20 वर्षों की कहानी बदल दी। उन्होंने दोनों भाइयों को अपने घर ले आए।
 
यह फैसला आसान नहीं था। नाइकवाड़ी दंपति के पहले से ही पांच बच्चे थे चार बेटे और एक बेटी। इसके बावजूद उन्होंने सोमशेखर और वसंत को अलग नहीं माना। दोनों भाइयों को उसी घर में अपने बच्चों के साथ पाला गया। इस तरह सात बच्चे एक ही परिवार में बड़े हुए। उनके लिए घर में किसी तरह का भेदभाव नहीं था। खाने से लेकर पढ़ाई और रोजमर्रा की जरूरतों तक, दोनों भाइयों की जिम्मेदारी उसी तरह उठाई गई जैसे नाइकवाड़ी दंपति अपने जैविक बच्चों की उठाते थे।
 
बाद की एक रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि दोनों बच्चों की मां शीला ने अपनी मृत्यु से पहले नूरजहां से अपने बच्चों की जिम्मेदारी लेने का अनुरोध किया था और नूरजहां ने उनकी देखभाल करने का वादा किया था। हालांकि, बाद की विभिन्न रिपोर्टों में बच्चों के माता-पिता की मृत्यु से जुड़ी परिस्थितियों के विवरण में कुछ अंतर मिलता है।
 
 
सिर्फ छत नहीं दी, भविष्य भी बनाया

मेहबूब और नूरजहां ने दोनों भाइयों को सिर्फ अपने घर में जगह नहीं दी, बल्कि उनके भविष्य की जिम्मेदारी भी उठाई। दोनों की पढ़ाई पर ध्यान दिया गया और उन्हें उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ बड़ा होने दिया गया। सोमशेखर ने BSc की पढ़ाई पूरी की, जबकि छोटे भाई वसंत ने प्री-यूनिवर्सिटी शिक्षा हासिल की। बाद में दोनों भाइयों को बेलगावी स्थित एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग कंपनी Aequs में रोजगार भी मिला। करीब दो दशक पहले जिन दो बच्चों के सिर से माता-पिता का साया उठ गया था, वे अब शिक्षित और आत्मनिर्भर युवा बन चुके थे। और इस सफर में उनके साथ खड़ा था वही परिवार, जिसने कभी यह नहीं पूछा था कि वे किस धर्म से हैं।
 
‘हमें कभी नहीं लगा कि हम इस घर के बाहर के हैं’

सोमशेखर और वसंत के लिए नाइकवाड़ी परिवार सिर्फ वह घर नहीं था जहां उन्हें रहने की जगह मिली थी। वह उनका परिवार बन चुका था। बाद की रिपोर्टों में सोमशेखर ने कहा कि उन्हें और उनके भाई को कभी यह महसूस नहीं हुआ कि वे इस परिवार में बाहरी हैं। उनकी पढ़ाई, जरूरतों और जीवन के महत्वपूर्ण फैसलों में नाइकवाड़ी परिवार ने उसी तरह साथ दिया, जैसे अपने बच्चों के साथ देता था।
 
यही इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण बात है। यहां दोनों बच्चों को परिवार में शामिल करने का मतलब उनकी धार्मिक पहचान को बदलना नहीं था। वे हिंदू और लिंगायत परंपराओं के साथ बड़े हुए और नाइकवाड़ी दंपति ने उनकी उस पहचान का सम्मान किया। यानी परिवार ने उन्हें अपनाया, लेकिन उनकी पहचान नहीं छीनी। फिर आया वह दिन, जब माता-पिता ने बेटे के लिए दुल्हन तलाशनी शुरू की
 
समय बीतता गया और सोमशेखर विवाह योग्य उम्र तक पहुंच गए। तब मेहबूब और नूरजहां ने एक बार फिर अपनी जिम्मेदारी निभाई। उन्होंने अपने पारिवारिक मित्रों के साथ महाराष्ट्र के गडहिंग्लज तालुका के तनवाड़ गांव का दौरा किया और सोमशेखर के लिए उपयुक्त रिश्ता तलाशना शुरू किया। आखिरकार उनकी मुलाकात पूनम के परिवार से हुई। पूनम एक वीरशैव लिंगायत परिवार से आती हैं। रिश्ता तय हुआ और फिर शादी की तैयारियां शुरू हो गईं। इस बार भी मेहबूब और नूरजहां ने खुद को सिर्फ पालक माता-पिता तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने वही भूमिका निभाई, जो किसी बेटे की शादी में उसके माता-पिता निभाते हैं।
 
8 फरवरी 2026: जब दो समुदाय एक शादी में साथ आए

8 फरवरी 2026 को हुक्केरी में सोमशेखर और पूनम की शादी हुई। शादी वीरशैव लिंगायत परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार संपन्न हुई। नाइकवाड़ी दंपति ने दूल्हे के माता-पिता की भूमिका निभाई। उन्होंने मेहमानों का स्वागत किया और शादी की व्यवस्थाओं में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। इस शादी की खास बात सिर्फ यह नहीं थी कि एक मुस्लिम दंपति ने हिंदू युवक की शादी कराई। खास बात यह थी कि दोनों समुदायों के लोग इस रिश्ते और खुशी में साथ खड़े थे। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी शादी के आयोजन और व्यवस्थाओं में सहयोग किया, जबकि हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोगों ने समारोह में शामिल होकर नवविवाहित जोड़े को आशीर्वाद दिया।
 
जिस बच्चे को कभी माता-पिता की जरूरत थी, उसी बच्चे की शादी में वही मुस्लिम दंपति उसके माता-पिता बनकर खड़ा था।
 
‘मुझे ऐसा लगता है कि सभी इंसान एक जैसे हैं’

मेहबूब हसन नाइकवाड़ी के लिए यह कोई असाधारण काम नहीं था। शादी के बाद पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि वह सभी इंसानों को एक-दूसरे का भाई-बहन मानते हैं। उनके लिए सोमशेखर और वसंत उनके अपने बच्चों से अलग नहीं हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि दोनों बच्चे बड़े हुए, पढ़े-लिखे, नौकरी हासिल की और अपने पैरों पर खड़े हुए। मेहबूब ने यह भी कहा कि अगर उन्होंने इन बच्चों के लिए अपना कर्तव्य निभाया है तो यही उनके लिए संतोष की बात है। और अब उनकी नजर छोटे बेटे वसंत की शादी पर है। यानी जिस तरह उन्होंने सोमशेखर के लिए रिश्ता खोजा, उसी तरह अब वह वसंत के लिए भी जीवनसाथी तलाशने की तैयारी में हैं।
 
दोनों धर्मों के बीच नहीं, एक परिवार के भीतर पले बच्चे

इस कहानी की खूबसूरती यह है कि इसमें किसी को अपनी धार्मिक पहचान छोड़नी नहीं पड़ी। सोमशेखर और वसंत हिंदू और लिंगायत पहचान के साथ बड़े हुए। उनके पालन-पोषण में नाइकवाड़ी परिवार ने उनकी परंपराओं का सम्मान किया। जब सोमशेखर की शादी हुई तो विवाह भी उन्हीं परंपराओं के अनुसार हुआ। दूसरी तरफ मुस्लिम परिवार के सदस्यों और समुदाय के लोगों ने इस खुशी में अपनी भूमिका निभाई। इस तरह यह शादी सिर्फ दो लोगों का विवाह समारोह नहीं रही, बल्कि साझी इंसानियत और सामाजिक सौहार्द की एक तस्वीर बन गई।
 
समाज के लिए मिसाल क्यों है यह परिवार?

बेलगावी जिला किसान संघ के अध्यक्ष बसवप्रभु वंतामुरी ने नाइकवाड़ी परिवार की इस पहल की सराहना की और इसे समाज के लिए एक उदाहरण बताया। ऐसे समय में जब धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों के बीच दूरी और तनाव की बातें अक्सर सामने आती हैं, नाइकवाड़ी परिवार की करीब दो दशक लंबी यात्रा एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती है। यह तस्वीर बताती है कि सामाजिक सद्भाव हमेशा बड़े मंचों से दिए गए भाषणों से पैदा नहीं होता। कई बार यह एक घर के भीतर शुरू होता है। किसी भूखे बच्चे को खाना खिलाने से। किसी बच्चे की फीस भरने से। उसकी पढ़ाई की चिंता करने से। उसकी जरूरत के वक्त उसके साथ खड़े होने से।
 
और फिर एक दिन उसकी शादी में उसके माता-पिता की तरह खड़े होकर उसे विदा करने से। यह सिर्फ ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ की कहानी नहीं है. नाइकवाड़ी परिवार की कहानी को सिर्फ हिंदू-मुस्लिम एकता के एक उदाहरण के रूप में देखना शायद इसके सबसे महत्वपूर्ण पहलू को छोटा कर देगा। यह कहानी बताती है कि परिवार केवल खून के रिश्तों से नहीं बनता।
 
मेहबूब और नूरजहां ने दोनों बच्चों को अपने घर में जगह दी, उन्हें पढ़ाया, उनकी जरूरतों का ख्याल रखा और उनकी धार्मिक पहचान का सम्मान किया। उन्होंने यह नहीं कहा कि परिवार का हिस्सा बनने के लिए बच्चों को अपनी पहचान बदलनी होगी। इसके बजाय उन्होंने अपने परिवार का दायरा इतना बड़ा कर लिया कि उसमें दो और बच्चे आसानी से समा गए।
 
करीब 20 साल का रिश्ता, एक दिन का नहीं

आज जब हम इस कहानी को देखते हैं तो अक्सर शादी का दृश्य सबसे ज्यादा आकर्षित करता है एक मुस्लिम दंपति हिंदू बेटे की शादी में उसके माता-पिता की भूमिका निभा रहा है। लेकिन इस कहानी का असली महत्व 8 फरवरी 2026 की शादी से कहीं पहले शुरू हो चुका था। असल कहानी उन करीब 20 वर्षों में है, जब नाइकवाड़ी दंपति ने दोनों भाइयों को अपने पांच बच्चों के साथ पाला। असल कहानी उन वर्षों की है जब उन्होंने उनकी पढ़ाई की चिंता की। असल कहानी उस समय की है जब उन्होंने उन्हें रोजगार हासिल करने के लिए आगे बढ़ते देखा। और असल कहानी उस विश्वास की है, जिसने बच्चों को कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वे इस घर में किसी दूसरे परिवार से आए हैं। शादी तो उस रिश्ते का सिर्फ एक खूबसूरत पड़ाव थी।
 
वसंत की शादी का अब इंतजार

सोमशेखर की शादी के बाद नाइकवाड़ी परिवार की जिम्मेदारी अभी पूरी नहीं हुई है। मेहबूब और नूरजहां अब वसंत की शादी की तैयारी के बारे में सोच रहे हैं। यानी जिस घर में करीब दो दशक पहले सात बच्चे एक साथ बड़े हुए थे, वहां अब एक और बेटे की शादी की तैयारियां होंगी। शायद उस दिन भी धर्म से ज्यादा महत्वपूर्ण वही रिश्ता होगा जो इतने वर्षों में बना है माता-पिता और बेटे का।
 
इंसानियत की वह भाषा, जिसे किसी अनुवाद की जरूरत नहीं

आज धार्मिक पहचान अक्सर लोगों के बीच अंतर बताने के लिए इस्तेमाल की जाती है। लेकिन बेलगावी का नाइकवाड़ी परिवार एक दूसरी संभावना दिखाता है। यह परिवार यह नहीं कहता कि धर्मों के बीच अंतर नहीं हैं। बल्कि उनकी जिंदगी यह दिखाती है कि अंतर होते हुए भी एक-दूसरे की जिम्मेदारी उठाई जा सकती है। एक मुस्लिम दंपति ने दो हिंदू बच्चों को उनके धर्म और परंपराओं के साथ पाला।
 
उन्होंने उन्हें शिक्षा दी। उन्हें रोजगार तक पहुंचते देखा। उनकी जिंदगी के महत्वपूर्ण फैसलों में साथ दिया। और जब बड़े बेटे की शादी का समय आया तो उसी की धार्मिक परंपरा के अनुसार विवाह कराया। मेहबूब का संदेश बेहद सरल है “सभी इंसान एक जैसे हैं।” शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सार है। क्योंकि समाज में बदलाव हमेशा बड़े नारों से नहीं आता। कभी-कभी वह एक छोटे से घर में शुरू होता है, जहां किसी अनाथ बच्चे के लिए दरवाजा खुलता है और उससे कहा जाता है “अब तुम हमारे बच्चे हो।”
 
और करीब 20 साल बाद वही बच्चा शादी के मंडप में खड़ा होता है, तो उसके पास सिर्फ एक दूल्हा होने की खुशी नहीं होती। उसके पीछे एक ऐसा परिवार खड़ा होता है, जिसने साबित किया कि रिश्तों की सबसे मजबूत बुनियाद खून नहीं, इंसानियत भी हो सकती है।